अकेली जिंदगी की दास्तां

दर्द कभी ना मिटने वाला दर्द फिर भी आस बाकी है कि कभी तो मिटेगा दर्द

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सभी मर्द एक जैसे आखिर क्यों

Posted On: 27 Jul, 2010 Others में

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आज कई दिनों तक अवसाद में रहने के बाद दिल ने कहा कि चलो जंक्शन पर चलते हैं. कम से कम यहॉ कुछ लोग तो होंगे जो मेरी बात, मेरे दर्द को जान सकेंगे और ये भी बताएंगे कि कैसे मैं अपने दर्द से मुक्ति पाऊं.


अभी कुछ दिन पहले ही मैंने इस ब्लॉग प्लेट्फॉर्म पर रजिस्टर किया और अपनी बात कही. अच्छा लगा ये जानकर कि कुछ लोग मेरी बात समझ रहे हैं. शायद उन्हें पता है कि लड़की होने का दर्द क्या है और तिस पर अकेली लड़की जिसे उसके अधिकांश लोगों ने त्याग दिया हो.


आज मैं जो कहने वाली हूं उसे मेरे सभी पढ़ने वाले जरूर ध्यान से पढ़ें साथ ही अपनी टिप्पणी से मुझे बताएं कि मैं सही हूं कि गलत.


मेरी नजर में औरत केवल भोग्या है. केवल पुरुषों के मनबहलाव के साधन के रूप में स्त्री का निर्माण किया गया है. विधाता ने स्त्री शरीर की रचना ऐसी बना ही रखी है कि वो चाह के भी कुछ नहीं कर सकती और अंततः उसे पुरुष की भोगवादी लालसा का शिकार हो जाना पड़्ता है.


हाय रे मजबूरी……….फिर भी इस स्थिति में उससे किसी विरोध की आवाज ना उठने की अपेक्षा की जाती है. यदि किसी स्त्री ने आवाज उठाने की चेष्टा की भी तो उसे चरित्रहीन, कुलटा, वेश्या आदि ना जाने किन किन उपाधियों से नवाजा जाता है.


मैं पूछती हूं कि क्या किसी स्त्री का स्वतंत्र होकर अकेले जीवनयापन करना गुनाह है?


जब पुरुष अकेले जीवन बिता सकता है और उस पर कोई लांक्षन नहीं लगाता तो यही बात स्त्री के लिए क्यूं नहीं हो सकती?


मुझे पूरा यकीं है आप मेरी बात मेरे प्रश्नों और मेरी जिज्ञासाओं का जवाब जरूर देंगे.

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86 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

ashutosh vajpayee के द्वारा
September 4, 2010

अनीता जी स्त्री मे असीम सहन शक्ति होती है और ये बात जग जाहिर है इन्सान की शक्ति ही उसकी कमजोरी बन जाती है. पर हम आप के बात से सहमत नहीं है लडको को लडकिय ही बिगड़ टी है वो क्यों उन्हें उतनी छूट देती है जो उन्हें सिर्फ एक पत्नी देती है..मे आप से इस मुद्दे पैर चाचा करना चाहता हूँ..

Ganesh Joshi के द्वारा
August 13, 2010

सताए कोई और दोषी  सभी मर्द  ………….लेखन की भी बड़ी कला है……… अनिता जी सुपर ब्लॉगर बनने के लिए…. बधाई………………..

    Ankul MAheshwari के द्वारा
    September 13, 2010

    sh eis asking some thing to you and you are just criticizing her, yes all man are the same. i am also a 23 years young man…….i says this…………..all male are the bastard one even i am too……………..

kanika Mehta के द्वारा
August 11, 2010

अनीता जी हो सकता हे नारी apki नज़र में आज भी भोग की वास्तु हो, पर सभी नारियौं पर ये लागु नहीं होता और जहाँ तक सभी मर्दों का सवाल हे तो मेरे पापा भी एक मर्द हे और उन्होंने मुझे अपनी पहचान बनाने और खुद को साबित करने का होसला दिया हे. उनसे मेने सिखा हे की इंसान वो होता हे जो वो खुद को समझाता हे. अप किन परिस्थिति में ये सब बोल रही हे वो में नहीं जानती पर ये जरुर कहूँगी की समाज में नारिया इसलिए शोषित नहीं की उन्हें मर्दों से खतरा हे पर वो शोषित हे क्यूंकि वो खुद की दुश्मन हे. पुरुष प्रधान इसलिए हे क्यूंकि हमने उनकी प्रधानता को स्वीकार किया हे हम औरतें कभी एकजुट हो ही नहीं पिएँ. गलत हम हे खुद को भोग हमने बनाया हे आपके विचार अच्छे हैं उन्हें गलत राह में मत घुमाइए आपका उदेश जो भी हो पर समाज को नारी ke uthan की jarurat हे और उसके लिए नारियौं को ही जुड़ना होगा. और खुद को साबित करना hoga

    ashutosh vajpayee के द्वारा
    September 4, 2010

    कनिका जी हम आप के विचार से सहमत है.

Amit Sharma के द्वारा
August 10, 2010

उसको नहीं मिलती नहीं कोई मंजिल .. जिसको खुद पे भरोसा नहीं है.. जिस दिन अपने आप से प्यार करना सीख जाओगी उस दिन कोई किसी से कोई सिकायत नहीं होगी.

Raj के द्वारा
August 9, 2010

ना स्याही के हैं दुश्मन, ना सफेदी के हैं दोस्त हमको बस आइना दिखाना है दिखा देते हैं। अनिता जी, समाज के ठेकेदरों ने सचमुच स्त्री को भोग्या बना रखा है, खासकर ऐसी स्त्री जो अकेली हो। ज़रुरत है तो इसे सुधारने की। हालाँकि ये ज़रुर है कि पुराने समय से ऐसा चलता है लेकिन आखिर कब तक? अब इसको बदलने का समय आ गया है, और चुँकि आपने आवाज उठाई है तो कुछ अवहेलनाएँ भी मिलेंगी। सब लोग एक जैसे नहीं है सब की सोच अलग है।लेकिन आप अपनी आवाज़ को ऐसे ही बरक़रार रखियेगा। हम आपसे सहमत हैं। आपकी अगली लेख का इंतजार रहेगा। ढेर सारी सुभ कामनाओं सहित, राज

tarun के द्वारा
August 8, 2010

अनीता जी, समाज के बन्धनो (पढ़े पुरुषो के बनाये हुए नियमो) से विद्रोह करने वाली न तो आप पहली महिला है, न आखिरी. जो भी इन नियमो के खिलाफ गया है, उसको समाज के ताने सुनने ही पड़े है, चाहे वो स्त्री हो या पुरुष. बुरा मत मानियेगा लेकिन आपके ब्लॉग से ऐसा लगता है की या तो आप की कोई पारिवारिक विविशता है जिससे आप नौकरी करने को बाध्य है या आपकी उम्र कुछ ज्यादा हो गयी है और आपको लगता है की अब शादी करने की उम्र नहीं रही. ये भी हो सकता है की आप किसी पुरुष के द्वारा चोट खायी हुई हो या उन कुछ लोगो में से एक हो सकती है जो समाज को बदलने की चाहत रखती हो. हलाकि मेरा मन ये कहता है की आप आखिरी श्रेणी की नहीं हो सकती, क्योकि तब आपको समाज की कोई परवाह नहीं होती. खैर ये आपकी जिंदगी है और आपको अपनी जिंदगी अपने तरीके से जीने ( और बर्बाद करने) का हक़ है. मेरी शुभकामनाये आपके साथ है.

Ramesh bajpai के द्वारा
August 6, 2010

आज कई दिनों तक अवसाद में रहने के बाद दिल ने कहा कि चलो जंक्शन पर चलते हैं. कम से कम यहॉ कुछ लोग तो होंगे जो मेरी बात, मेरे दर्द को जान सकेंगे और ये भी बताएंगे कि कैसे मैं अपने दर्द से मुक्ति पाऊं. बिटिया अनीता तुम्हारी रचना पर बहुत बाते हो चुकी है मै अपने शहर से बाहर था सो ब्लॉग पर आ ही नहीं पाया रही दर्द की बात तो आप अपने को खाली न रक्खे और कल को छोड़ कर आज को भरपूर जीने की कोशिस करे .यहाँ बहुत अच्छे लोग है आपका दर्द जानेगे भी और उसे दूर करने का तरीका भी बतायेगे

suchi के द्वारा
August 6, 2010

Anita ji aap pareshan no ho, aapka dhnayad jo aapne purusho ki vastvikta ko samaj ke samne lane ka prayas kiya. Aapne jo kaha sahi hain lekin iska karan samaj ka dar hain, purush apne man ka karte hain aur samaj ke dar se sara dosh mahilao par madh dete hain. Lakin aapke prayas se ve is bat ko jarur swikar karenke ki ve samaj ke akle insan nahi hain jo aisa kar rahe hain, ye to vagyanik prabhav hain jo jaisa purusho par lagu hota hain vaise hi mahilao par bhi lagu hota hain, aur jis din ve is bat ko swikar kar lange us din se hi purush bhi kush rahega aur mahila bhi.

sanjana के द्वारा
August 4, 2010

यार आपने तो पूरे पुरुष समाज को ही आईना दिखा दिया आपने बिल्कुल सही पहचाना इन मर्दों को .आप के हौसले को सलाम .आपकी प्रतिकिया देख कर लगा की ये बात इन मर्दों को कितनी बुरी लगी .पर सच तो सच है सभी मर्द एक जैसे…………………………………………………. आप को सलाम मेरी दोस्त ……………….

    rohit के द्वारा
    August 4, 2010

    तो आप ने मिस anita का समर्थन किया हैं पर आपने सारी प्रतिक्रियाएं नहीं देखी किसी भी लड़की ने अनीता जी का साथ नहीं दिया . लगता है की दुनिया में अनीता जी के बाद सबसे दुखी आप ही है |खुश रहिये और दुनिया में ख़ुशी बिखेरिये | जहा में सब अच्छा लगेगा

    sanju के द्वारा
    August 4, 2010

    आप दोनों अगर किसी मुद्दे को समझ नहीं प् रही हैं तो कृपया करके जन जागरण के इस मंच के असली मकसद को फनाह करने का काम बंद कीजिये ! जन जागरण का मकसद है “बेहतर न्याय लायेगा बदलाव” न की आप लोगों का entertainment , इस लिए आप कोई ऐसा कदम उठाइये जिस से किसी को न्याय मिल सके! मज्जे लुटने हैं तो facebook,twitter,orkut , hi5, linkland , अगएरा वगेइरा बहुत social sites हैं , वहां जाइए न मस्त लड़के मिलेंगे एक से एक बढकर ! बुरा लगा , लगना भी चाहिए ताकि ये जो सब इस मंच पर आकर मस्ती कर रहे हैं इनको भी पता चले की ये सब लोग भी जागरण के मकसद के रस्ते में रूकावट पैदा कर रहे हैं .

    PRASHANT JAISWAL के द्वारा
    August 4, 2010

    बातो के अर्थ को समझे संजना जी कबतक आप लोग सच से मुह मोड़ती रहेंगी|

    sanjana के द्वारा
    August 4, 2010

    प्रशांत जैसवाल जी ,संजू जी आप लोगो को बहुत बुरा लगा की हम लोगो ने अपने दिल की बात यहाँ लिखी ,ये कहा लिखा है कि जागरण पर अपने दिल कि न लिखे आप जैसे लोग ही तो औरतों को सामान अधिकार नहीं देना चाहते और बात करते है जागरण की, तो ये सब का प्लेटफॉर्म है हम सब का ओके हम हमेशा जागरण पर अपनी बाते लिखते रहेगे .

    Anita Paul के द्वारा
    August 5, 2010

    वाकई संजना आप बिलकुल सही कह रही हैं. आपने देखा सच बोलने का नतीजा. सारे पुरुष एकजुट होकर इसका विरोध करने लगे. “ये करते हैं आधुनिक बनने की बातें केवल बातें लेकिन बात जब करने की आती है तो इनमें से अधिकांश अपनी खोल में छुप जाना ही पसन्द करते हैं.” इनकी मर्दांनगी शायद स्त्रियों को दबा के रखने में है नहीं तो इनकी पोल खुलने में देर नहीं लगने वाली. लेकिन गर्व तब होता है जब आप जैसी लड़कियां खुल के इनका विरोध करने की हिम्मत जुटा पाती हैं. एक और बात कहना चाहुंगी मुझे लग रहा है ये मंच केवल पुरुष प्रधान हो चला है. हमें अपनी भागीदारी बढ़ा के इस रिवाज को खत्म करना होगा.

    Anita Paul के द्वारा
    August 5, 2010

    संजू जी, शायद आप स्त्री स्वतंत्रता के दिली तौर पे विरोधी हैं. आप कहीं से भी नहीं चाहते कि हम भी खुली हवा में सांस लें और इंसानों की तरह जिएं. मैं कई दिन इस मंच पे नहीं आई और आप ने तो हद से ज्यादा विरोध दर्शा दिया. आप कुतर्क करने की बजाए जवाब देने में ज्यादा भरोसा करें तो शायद वाकई मेरी कुछ मदद कर सकें. आपका अतिशय विरोध केवल आपके फ्रस्ट्रेशन को दर्शाता है.

    ashutosh vajpayee के द्वारा
    September 4, 2010

    माफ़ी चाहता हूँ पर इसी दुनिया मे राम और रावन हुए है और माँ सीता और शूपनखा भी इस दुनिया मई हुयें है..मई ये नहीं कहता की अनीता जी वो शूप्नाखा है.पैर इस दुनिया मई राम और रावन जैसे इन्सान आज भी है..पता नहीं किस मोड़ पैर हमें कोन मिल जाये…

kajalkumar के द्वारा
August 4, 2010

53 प्रतिक्रियाएं !

    Anita Paul के द्वारा
    August 5, 2010

    ये मेरे लिए भी सरप्राइजिंग है. ये सब आप लोगों के प्यार और विश्वास का नतीजा है.

atul के द्वारा
August 4, 2010

मै जागरण जंक्शन पर नया हूँ ,आपका ब्लॉग पढ़ा अच्छा लगा परन्तु एक बात समझ में नहीं आई कि भारत में इतने कमजोर सोच वाली नारियां कैसे पैदा होने लगीं | जबकि यहाँ कि धरती पर ही दुर्गा ,काली, लक्ष्मीबाई ,सती सावित्री और इंदिरा गाँधी जैसी नारियों ने जन्म लिया है जिन्होंने इतिहास रच दिया | आजकल यह प्रचलन हो गया है कि अपनी कमजोरियों को छुपाने के लिए दूसरों पर दोष मढ़ा जाय | मर्द और औरत एक दूसरे के पूरक है ,इसे इस नजरिये से देखने कि जरुरत है | जहाँ स्त्री पुरुष के बिना अधूरी लगाती है, वहीँ पुरुष भी तो स्त्री के बिना अधूरा है | यह तो प्रकृति का नियम है | जहाँ तक रही भोग कि बात तो इसकी जरुरत दोनों को बराबर पड़ती है और यह आवश्यकता भी है| कुछ मानसिक अस्वस्थ लोगों के कमेंट्स पर ध्यान न देकर आप अपनी राह खुद बनाइये | आप आगे चलेंगी तभी न पीछे कारवां दिखेगा |मेरी टिपण्णी पर गौर कीजियेगा | किसी ने सच ही कहा है – मंजिलें उन्ही को मिलती हैं जिनके सपनों में जान होती है | पंख से कुछ नहीं होता हौसलों से उड़ान होती है || हौसला रखिये ,आगे बढिए मनं की भड़ास जरुर निकालिए लेकिन अपने को कमजोर न समझिये | आगे आपकी मर्जी………….. अतुल आज़ाद

sudhir singh के द्वारा
August 3, 2010

18िव सदी मॆ जी रही हो लगता है.

    Anita Paul के द्वारा
    August 5, 2010

    आप लोग चाहते हैं कि आज भी नारी 18वीं सदी में जिए . वैसे कमेंट के लिए आपका आभार.

RASHID - Proud to be an INDIAN के द्वारा
August 2, 2010

अनीता जी, हफ्ते की टॉप bloger होने पर मेरी तरफ से भी बधाई स्वीकार कीजिये !!! राशिद :)

    Anita Paul के द्वारा
    August 5, 2010

    हफ्ते की टॉप ब्लॉगर होने पर बधाई के लिए आपका बहुत बहुत आभार राशिद जी…

sangeeta के द्वारा
August 1, 2010

अनीता जी मेरी सलाह है की आप शादी कर लीजिये सारी परेशानी दूर हो जाएगी …………..

    Anita Paul के द्वारा
    August 5, 2010

    आपका आभार संगीता जी, लेकिन शादी अभी नहीं कर सकती…. हॉ कोई बेहतर लाइफ पार्टनर मिला तो जरूर सोचुंगी.

Tufail A. Siddequi के द्वारा
July 31, 2010

१- हर सिक्के के दो पहलू होते है. २- दोनों को एक-दूसरे की समान जरुरत है. ३- जैसा नजरिया होगा, वैसा ही दिखेगा. ४- ये आप पर निर्भर करता है की चावल में से कंकर निकालना है या फिर कंकर में से चावल. ५- पुरुषों के बिना स्त्रियों के महत्व पर भी प्रकाश डालिए. ६- अपनी तकदीर बनाना अपने खुद के हाथ में होता है. ७- इश्वर भी उनकी मदद करता है, जो अपनी मदद खुद करते है. ८- परीक्षा पास करना एक कला है, ये भी सत्य है. कई बार पढ़ाकू फेल हो जाते है और ‘कला’ जानने वाला टॉप कर जाता है.

    sid के द्वारा
    December 20, 2010

    good one….

R K KHURANA के द्वारा
July 31, 2010

प्रिय अनीता जी, आपको सप्ताह का ब्लागर बनाए पर मेरी और से बधाई ! राम कृष्ण खुराना

    Anita Paul के द्वारा
    August 5, 2010

    आदरणीय चाचा जी, बधाई के लिए आपका आभार. बस आपकी कृपा और मार्गदर्शन मिला करे तो मेरे जैसी नई ब्लॉगर के लिए बेहतर रहेगा.

brijdangayach के द्वारा
July 31, 2010

Anitaji aapney jo likha sayad aap ki nazaron meay thick ho parantu asia nahin mard aakhir meay mard hi bann kar rahega chhayein kitne hi tuffan aayein asie hi aurat hai pahaley zaroor aurat ko koi kuch kah detya tha per ab samay plat gaya mard ke aagey aurat kaam meie sabse tej hai tabhi mahilaon ko desh aur duniya meie highest post per navzagaya ho sakta hai aapko kisi ne dard diya aur aap ek writtr hain kyun bhulrahin jo duiya ko raha dikhati usko khud andkar se bahar rahana chaiye aur dusron ko ujala dena chhaiye aap khud mahan hai ki apne dil ki baat sab ke saamney kholi aur sab aapko hi mardo se upper battrahe phir bhi aap mardo ko shaque ke dayrey meie la rah yeh uchit nahi ladki ko maa, bahen, beti, bahu, ka darja bhi duniya meie mila jahan mard hotey hain kanoon meie sab ki baat bolney wale jis din apko ab koi dookh dey khl kar rakh dijey uss ka naam aur kaam,pahaley aurat ke upper attayachr hotey thhey bahut kam naari ke baat sunijaati thi per pahaley naari ko amman milta naari ka roop hi bharat maa hai aur mard apni uss maa ke agey natmasatak ho jata hai isley har mard ko aisa na samjiye bahut si naari akeli jeevan vitati apne kaam ke silsiley meie bhiout of station ati hain aur ladkiyan ab apne ghar se doorr hi padney jati hainaaj ki naari jab awaz utati tab uski awaz akley nahin balki puri nari jati ki awaz hoti hai naari jab chand per mardon ke saath jati tab bhi usko samman milta haiaap ko dukhi nahi hona chhaie bas jo koi karan asia aapke vichar meie ho hatta kar sukh se zindagi bitaey

satyamkumar के द्वारा
July 31, 2010

अनीता जी आपने जो लिखा है वो आपका अनुभव है मगर सभी मर्द एक जैसे नही होते है .आज दुनिया में लड़कियों को लडकों के samaan darjaa diya जा raha है ,Aur ladkiyan usa ka faydaa bhi utha rahi है मगर jab ladkiyo को इसकी वजह se koi nuksaan hhai to uske lie ladkiyahi jimmedar है . Traino में लड़कियों के lie alag se hota है उसमे mardo के baitpar ladkiya aaptiya karti है मगर जनरल dibbe में jab kisi ladki को jagah नही milti तो लडकिय लडको से ladne को taiho jati है .har chij के lie मर्द hi jimmedar नही hote है .jaisa लडकिय ka vyavhar hoga vahi usako उसका फल milegaa

http://jarjspjava.jagranjunction.com के द्वारा
July 30, 2010

I guess, now it s chance for anita ji herself to reply, coz many gentlemans and ladies have commented here as their reply on the topic mentioned above, and also gave as many suggestions as possible. now we want to know what impact you got on your mind, and what kind of solution you have for the men you met in your life. I guess you must gave them an answer so that they learnt the point you still have not give up, instead become more strong than before. hope, you have got solution to energise yourself. -with regards and thanks Nikhil Singh http://jarjspjava.jagranjunction.com

prashant jaiswal के द्वारा
July 30, 2010

यह बात सत्य है की अधुरा ज्ञान एक विष की बहती होता है जो खुद को और दुसरो को प्रभावित करता है और यह भी की विष कभी अच्छा प्रभाव नहीं डालता| कहते है न की हर सिक्के के दो पहलू होते है इसी प्रकार एक इन्शान के भी दो पहलू होते है चाहे वह औरत हो या मर्द | और अपने मर्दों का केवल एक रूप होता है और यह बहुत दुःख की बात है की आपको केवल मर्द केवल भयानक रूप से ही रूबरू होना पड़ा| आशा करता हु की भविष्य आपको मर्द के उस रूप से भी रूबरू कराये जो दिल प्यार और सुकून देता है| और रही बात स्त्री के अकेले रहने की तो बिलकुल आप चाहे हो तो अकेले रह सकती है पर क्या आप अकेले अपनी रक्षा कर सकती है क्या आप अकेले जिंदिगी बिता सकती है| एक जानवर को उसके जीविकोपार्जन की सभी वस्तुए दे कर एक घर में बंद करा दे केवल दो दिन के बाद देखे वोभी मर जायेगा जबकि उसीके सह को साथ रक् दिया जाये तो वह जादा दें तक जिंदा रह सकता है| मेरे कहने का ये तात्पर्य नहीं की आप एक घर में बाद हो जाये पर आपको जीवन की गाड़ी चलने के लिए दुसरे पहिया की जरुरत पड़ेगी| और अगर अपने मनुष्य योनी में जन्म लिया है तो आपको समाज में रहना ही पड़ेगा और समाज में रहना है तो उसके बनाये नियम पर भी चलना होगा| जनता हूँ की स्त्री के लिए समाज के द्वारा बनाये गए नियम कठिन है पर चलना तो है| नितिन जी की बात से मई कुछ हद तक सहमत हूँ क्योकि इस दुनिया में प्रकृति के द्वारा हर छेत्र की सीमा है और जो भी इस सीम को पर किया है उसे इसके द्वारा दिया गया दंड सहना ही पड़ता है चाहे वो हँस के सहे या रो के, सहना तो पड़ेगा ही | मैंने जो कोसिस की आपकी जिग्यासाओ का प्रतिउत्तर देने की उससे कुछ हद तक आप संतुस्ट होगी आशा से……………….

    Dharmendra Ahlawat के द्वारा
    August 5, 2010

    Itna jyada mat samjha pagal ho jayega aur unko koi phark nahi padega

anjani के द्वारा
July 30, 2010

क्या  कभी आप ने खुद को  तौला है,स्व आकलन कीजिये उत्तर स्वयं ही मिल जायेगा,,,,,,,,,,,,,,,,,, सभी मर्द एक जैसे आखिर क्यों??????????????????????

Jack के द्वारा
July 30, 2010

अनिता जी, बहुत बहुत बधाई सप्ताह में सबसे अधिक पढी गई आप . आपके आने के बाद तो दो चार महिला ब्लोगरों को छोड सब गायब हो गई है, अनुराधा जी, रजिया, जैसीए ब्लोगरो नदारद दिख रही है लगता है आप अगली ब्लोगस्टार बनना चाहते है ,,, लेकिन यहां भी एक ही बात खराब है अगर मान ले कि एक आम के पेड के अधिकतर फल सडे है तो क्या जो फल सही है उन्हें भी सडा मान लेना चाहिए,,,,एक तालाब की गंदी मछली सारे तालाब को गंदा तो कर देती है लेकिन फिर भी तलाब में मछलियां रहती ही है.

pankaj के द्वारा
July 30, 2010

अनीता आप अपने दुःख को इतना बङा करके देख रही है की आप ने पूरे के पूरे मर्द जाति को ही निशाने पर लाकर खङाकर दिया.ये सही नहीं है आप अपने विचारो में परिवर्तन लाये जिदगी अच्छी लगेगी हम सभी की शुभ कामनाये आप के साथ है …………….

samta gupta kota के द्वारा
July 30, 2010

अनीता जी,अगर आपकी नज़र में औरत सिर्फ भोग्या है तो वो भोग्या है, वैसे नए जमाने में औरत सामान्यतः खुद भोग्या बनने को तैयार है और उसकी कीमत भी पुरुष से वसूलने में पीछे नहीं है,वैसे अगर आप खुद अपनी ‘दुकान’ खोलकर बैठेंगे तो ग्राहक तो आएंगे ही,किसी लड़की को उसके अपनों द्वारा त्याग देने में कहीं न कहीं उस लड़की की भी गलती हो सकती है,हम जब एक उंगली किसी की तरफ उठाते हैं तो तीन उंगलियाँ खुद हमें लक्ष्य करती हैं,जब हम परम्पराओं को तोड़ते हैं तो हमें इतना मज़बूत होना चाहिए कि कोई हमारा फायदा न उठा सके, या तो हम अपनों की ‘बरगद की छांव’ का सुख भोगें या तपती धूप को झेलने की कुव्वत रखें फिर शिकायत किससे और कैसी? हमने अगर ‘बरगद की छांव’को खुद त्यागा है तो उसमे उसकी गलती नहीं है,

    sanju के द्वारा
    August 3, 2010

    बहुत बहुत धन्यवाद जी आपका , आपने जो लिखा है बस कमाल लिखा है जी ,मैंने भी यही कहने की कोसिस की थी की घर के दरवाजे खुले छोड़ोगे तो चोर तो घुसेंगे ही ! वैसे एक बात और कहना चाहूँगा की ज्यादातर लोग किस की बातें ज्यादा करते हैं ?मेरे हिसाब से या तो अछे की या तो बुरे की ! अब आप अंदाजा लगा सकतें हैं यहाँ ये ब्लॉग अछे के लिए पढ़ा जा रहा है या बुरे होने की वजह से !बस एक टिपन्नी और चाहूँगा आप से ! छा गए गुरु आप तो !

    Anita Paul के द्वारा
    August 5, 2010

    समता जी, और कभी भी भोग्या बनने की बात नहीं करती बल्कि उसे जबर्दस्ती भोग्या पुरुष बना देता है. अगर ऐसा नहीं तो फिर किसी नारी के लिए पुरुष की मर्जी या उसके बनाए रिवाजों पर चलने की बाध्यता क्यूं? आपने देखा होगा इन पुरुषों की लोलुप नजरों को स्त्री की शरीर की तरफ ऐसे तकते हैं जैसे अभी खा जाएंगे. अपनी इस बेशर्मी पर पर्दा डालने के लिए उसी स्त्री को कलंकित करने से भी नहीं चूकते ये.

    Anita Paul के द्वारा
    August 5, 2010

    संजू जी, आप चोर को दोषी क्यूं नहीं ठहराते जिसकी बुद्धि चोरी के सिवा कुछ नहीं सुझाती, ऐसे तो कहेंगे कि धन होगा तो चोर लगेंगे ही. ये आपका नहीं बल्कि आपकी बुद्धि का दोष है जो आप स्त्री विरोध के सिवा कुछ नहीं सोच पा रहे हैं, जरा विचार कीजिए कि ये कहना कहॉ तक उचित है कि हमने किसी की संपत्ति इसलिए हड़पी क्योंकि उसके पास संपत्ति है. क्या ये सीधे-सीधे आचरण और संस्कार हीनता का मामला नहीं?

dr.divya के द्वारा
July 30, 2010

अनीता जी आप अपनी सोच में सकारात्मक परिवर्तन लाये .तब आप को दुनिया और इसके लोग अच्छे लगेगे ……………………….

    Anita Paul के द्वारा
    August 5, 2010

    डा. दिव्या या दिव्य कहूं आपको. वैसे आपका नजरिया बुरा नहीं है जिन्दगी के प्रति. आपका आभार

    डॉ दिव्या के द्वारा
    August 9, 2010

    आप एक नारी हैं और नारी होने के नाते मैं आप का सम्मान भी करती हू .आप के जीवन में बहुत दुःख हैं ये आप की पोस्ट से पता लगता है .ये सच है की एक अकेली महिला का जीवन कठिन होता है पर दुःख किसके जीवन में नहीं होता …………यहाँ आप अपने दुखो को लोगो के साथ शेयर करती हैं .आप मुझको ये बताइए की कोई आप के दुःख को समझ पता है .आप के लेख पर कमेन्ट देख कर लगा की कोई भी आप को समझना नहीं चाहता सब को ये लगता है की आप यहाँ दूसरो की सहानभूति लेने आई है और आप कमेन्ट इस लिए पा रही हैं .मैं आप से पूछना चाहती हु क्या ये सही है ?????क्यों की मुझको ये नहीं लगता की कोई भी नारी ये काम करेगी की अपने दुःख को सार्वजानिक इस लिए करेगी की उस को टॉप ब्लागेर ऑफ़ वीक चुना जाये …….इस लिए मेरी आप से गुजारिश है की आप इन बात का जबाब मुझे जरुर दे क्युकी मेरी नजर में नारी कमजोरी का प्रतिक नहीं है ………………  

Prabhakar Shastry के द्वारा
July 30, 2010

Dear Anita, Many congratulations for being the most viewed blogger! I must admit that your blog leaves an impression on readers. Keep writing, we love your blogs. Cheers!

    Anita Paul के द्वारा
    July 30, 2010

    Dear Prabhak ji…………………many many thanks for your support and comment.

    Anita Paul के द्वारा
    July 30, 2010

    Sorry Prabhak* Prabhakar ji

allrounder के द्वारा
July 29, 2010

अनीता जी, सबसे पहले तो आपका इस मंच पर स्वागत करना चाहूँगा, उसके बाद प्रशंशा करना चाहूँगा आपके साहस की जो आपने इतनी निर्भीकता से अपनी बात को रखा ! अब बात आपकी समस्या कि आपने पुरुषों के जिन अवगुणों का वर्णन किया है, आप जरा अपने दिल पर हाथ रख कर बताएं क्या ऐसे पुरुषों के संपर्क मैं आकर धोखा खाने से पहले आप उनकी इन फितरतों से बिलकुल बाकिफ नहीं थीं ? यदि आपका जवाव हाँ है तो मैं कहना चाहूँगा कि कहीं न कहीं आप भी अपनी इस दशा के लिए उत्तरदाई हैं ! और यदि आपका जवाव न है तो मैं कहना चाहूँगा कि आप बड़ी नादान हैं ! बहरहाल जो भी हो अब आप पुरानी बातें बिसरा कर एक नई जिन्दगी कि शुरुआत करें हम सब आपके साथ हैं !

    Anita Paul के द्वारा
    July 30, 2010

    आलराउंडर जी, सबसे पहले तो आपका शुक्रिया अदा करती हूं जो आपने मुझे इतना वेटेज दिया. आप इस प्लेट्फॉर्म पर काफी प्रतिष्ठित हैं और यह केवल आपकी काबिलियत की वजह से है. लेकिन मैं अपने जवाब में यही कहूंगी कि आज तक मैं जितने पुरुषों के संपर्क में आयी हूं उनमें से अधिकांश की फितरत या यूं कहूं कि मूल प्रवृत्ति एक जैसी ही रही है यानी वही भूखे भेड़ियों जैसी. क्या ये फितरत मेरे मनमस्तिष्क पर नकारात्मक प्रभाव डालने के लिए काफी नहीं?

Nitin Sinha के द्वारा
July 29, 2010

अनीता जी! आपने अपने ब्लॉग में लिखा है कि मेरी नजर में औरत केवल भोग्या है. केवल पुरुषों के मनबहलाव के साधन के रूप में स्त्री का निर्माण किया गया है लेकिन मेरी नज़र में ये बिलकुल सही नहीं है क्यूंकि मनोरंजन के लिए मशीनो का निर्माण हुआ है स्त्रिओं का नहीं| हाँ स्त्री, मनुषों में एक सुन्दर प्रजाति है यदि वो अपनी हद में रहे| और यदि वो अपनी सीमा रेखा को पर करती है तो उसको उसका नुकसान खुद उठाना पड़ेगा | और अगर वो समाज में अकेले ही रहना चाहती है तो रहे सकती है, क्यूंकि बहुत सी औरते है जो अकेले ही अपना जीवन बिता रही है तथा उन पर चरित्रहीन, कुलटा, वेश्या आदि कि उपाधियों से नवाज़ा नहीं जाता है अगर वो बाकई में सही है तो | और अगर कहीं पर धुआ उड़ता है तो मतलब सीधा है कि कहीं न कहीं चिंगारी भी होगी | और रही बात कि सारे मर्द एक जैसे ही होते है तो ये भी गलत है अगर आपने मर्दों को अनुभव के आधार पर explain किया है तो शायद आपकी पसंद में ही कोई कमी रही होगी क्यूंकि समाज में दो ही तरह के लोग है एक दूजे कि मदत के लिए जिसमे एक स्त्री और दूसरा पुरुष है (तीसरे की में बात ही नहीं करता……….) जिसमे कुछ लोग गलत भी होते है चाहे वो स्त्री हो या फिर पुरुष| और इसी कारण पुरुष स्त्री को और स्त्री पुरुष को दोषी ठएराती है | बल्कि समाज में दोनों कि अपनी एक महत्वता है शायद इसी कारण स्त्री और पुरुष दोनों एक दुसरे के बिना अधूरे है| आपको अपनी सोंच को बदलना होगा क्यूंकि अकेले स्त्री का कोई अस्तिव ही नहीं है| आपके लेख के लिए बधाई all the best………..

    Anita Paul के द्वारा
    July 30, 2010

    नितिन जी, आपने कमेंट में लिखा है कि “हाँ स्त्री, मनुषों में एक सुन्दर प्रजाति है यदि वो अपनी हद में रहे| और यदि वो अपनी सीमा रेखा को पर करती है तो उसको उसका नुकसान खुद उठाना पड़ेगा” यानी आप की नजर में स्त्री की हद तय करने का अधिकार पुरुष को है. आखिरकार आपने वही बात कही जिससे ये साबित हो जाता है कि पुरुष अपने अहंकार को छोड़ नहीं सकता और स्त्री का नियंता होने का भाव कायम रखना चाहता है. मैं पूछती हूं कि आखिर स्त्री के लिए ये दास्य भाव का दृष्टिकोण कब बदलेगा. खैर, मुझे तो अभी कोई उम्मीद नहीं नजर आती……………

sanju के द्वारा
July 28, 2010

मैं यही कहना चाहुंगी कि “सारे मर्द” अन्दर से एक ही तरह के मिले मुझे इसलिए मेरा अनुभव तो बार-बार चीख के यही कहेगा. कोशिश तो कर रही हूं पॉजिटिव सोचने के लिए लेकिन उन अनुभवों को कहॉ दफ्न कर दूं कैसे हटा दूं उन मानसिक आघातों को? aapki baaton se aap presaan kuch kam aur confuse kuch jyada lagti hain. main ye to nahin janta ki aap zindagi ki kon si stage per hain ,lekin ye jan na jaroor chahta hun ki ” father , brother , 1 or more Boy Friend, and 1 husband ” in mardon ke alava kya aapne aur bhi mardon ko dil se jana hai ya janne ki kosis ki hai? kya aapki maa, bahan ya koi aur aaurat se kabhi dil ki baat nhin hue?kya vo log aapke ekelepan ke zimevaar nhin hain? aise kon se aaghaat hain jo aap ko sirf mardon ne hi diye hain aapki koi bhagidaari nahin rahi unmein.agar nhin bhool sakti or kuch kar guzarne ki tamanna hai to uthao aawaz , aadhi adhuri baatein blog mein post karne se kya fayda. “Whatever we do, we must remember our aim at every moment. If you dream to fly with eagles, don’t waste time in swimming with ducks.”

    Nikhil के द्वारा
    July 29, 2010

    fantastic answer sanju ji.

    Anita Paul के द्वारा
    July 29, 2010

    संजू जी, सबसे पहले तो आपका आभार जो आपने टिप्पणी की. मुझे पूरा यकीं है कि आपने मेरी पोस्ट को उस दृष्टिकोण से नहीं पढ़ा जिसकी मुझे उम्मीद थी. खैर मैं आपको थोड़ा डिटेल में बता रही हूं कि मेरी परेशानी क्या है. पुरुष हर बात का प्रतिदान चाहता है जबकि नारी केवल समर्पण नारी प्रेम में प्रेम के लिए पड़ती है जबकि पुरुष के उद्देश्य अस्पष्ट होते हैं. पुरुष त्याग, समर्पण, कुरबानी और प्रेम की बड़ी-बड़ी बातें करता है. जबकि नारी वास्तविक रूप में इन शब्दों को जी रही होती है. मेरा दर्द यही है और मुझे पुरुषों से सिर्फ यही मिला अभी तक.

    Anita Paul के द्वारा
    July 29, 2010

    निखिल जी, समझाएंगे मुझे कि कैसे संजू जी का उत्तर फैंटास्टिक हो गया? मुझे तो ये समझ में ही नहीं आ सका कि वो आखिर कहना क्या चाहते हैं.

    sanju के द्वारा
    July 29, 2010

    thanks anita g and nikhil g for the reply coz v can give a lot of views from continous reply. anita g aap nikhil g ka nazriya change karne ki kosis mat kiziye.unko achha lga unhone likha. ab mudde ki baat ye hai ki aapne btaya nhin ki jab jab aapki barbadi hue keval purus hi badnam hue, kya aapke sosan ke time par aapki help ke liye koi aaurat nhin thi?jaise ki maa/bahan /bhabhi/ saas/devrani/jethani/nand? kya aap hamesa se apne decision ekele leti rhi hain? agar haan to galti aap ki hai na ki puruson ki. agar ghar ke darvaaje khule chhodo ge to chor to avasya hi ghusenge. ek blog hai jo maine likha hai mere padosi/dost/sab kuch ka dard dekh kar : “jan jagran for justice” pad kar dekho yahaan ek ladki hai /uski maa hai/ uski 11 bahan hain sab nari hain lekin sab zimevaar nhin hain mere dost ki barbaadi ki, sirf uski biwi jo ek hi ladki hai. aap kya samjhti hain jan jagran help karega ?

RASHID के द्वारा
July 28, 2010

अनीता जी, एक अँधेरा होता है तो लाख सितारे होते है, हाँ यह ज़रूर है की अँधेरा नुमाया ज्यादा होता है,, इस ही तरह अभी भी दुनिया अच्छे लोग ( मर्द या औरत ) ज्यादा है, बुरे कम हैं बस उनको ढूँढने की ज़रुरत है !! वैसे कॉलेज में मेरी बेस्ट फ्रेंड का नाम भी अनीता था, लेकिन वह बेहद खुश रहती थी और हर वक़्त कुछ न कुछ जोकिंग किया करती थी,, आप भी खुश रहा करे और अच्छा सोंचा करे … राशिद

    Anita Paul के द्वारा
    July 28, 2010

    राशिद जी आदाब, इस तरह हंसाने के लिए शुक्रिया. वैसे मैं आपकी उस दोस्त की तरह खुश रहने की कोशिश करुंगी.

    RASHID के द्वारा
    July 28, 2010

    ज़रूर अनीता जी ऊपर वाला आप को हमेशा खुश रखे और आपको अच्छे दोस्त [ मेंरी तरह के :) ] मिले जो आपको खूब हसाए !!! राशिद http://rashid.jagranjunction.com

    Anita Paul के द्वारा
    July 30, 2010

    राशिद जी आपका बहुत बहुत शुक्रिया. शायद आप मुझे समझ पा रहे हैं ऐसा मैं सोचती हूं.

    RASHID - Proud to be an INDIAN के द्वारा
    July 30, 2010

    बिलकुल अनीता जी क्या आप मुझ से दोस्ती करेंगी ???

    Anita Paul के द्वारा
    August 5, 2010

    राशिद जी बेहद खुशी हुई कि इस मंच पर आप जैसे लोग भी हैं जो एक लड़की की भावना को ठेस नहीं पहुंचाते. आपका ये व्यक्तित्व जाहिर करता है कि आप मानवता के सच्चे पुजारी हैं. मैं कई दिनों से गंभीर रूप से बीमार होने की वजह से मेरे ब्लॉग पर आए कमेंट्स का जवाब नहीं दे पाई आज तबियत कुछ सही है तो फिर अपने सबसे प्यारे मंच जागरण जंक्शन पर आई हूं. एक बार पुनः आपको धन्यवाद.

    Rashid के द्वारा
    August 5, 2010

    अपना ख्याल रखिये और खुश रहिये, आपके दोस्तों को आप की फ़िक्र है और आपके articles का इंतज़ार!! उम्मीद है मेरे लेख भी आपको पसंद आये होगे आप के कमेंट्स का इंतज़ार है ! राशिद http://rashid.jagranjunction.com

jalal के द्वारा
July 28, 2010

लडकी होना दुःख की बात नहीं . यह तो कुदरत की बनाई हुई एक बेमिसाल हस्ती है . स्त्री की हर जगह इज्ज़त है. स्त्री माँ है, बहन है, बीवी है, बेटी है . क्या लोग इनकी इज्ज़त नहीं करते. बेशक इज्ज़त करते हैं. उसमें जो गुण हैं उसका मुकाबला तो पुरुष भी नहीं कर सकता. इसलिए अपने आपको को गिरा हुआ न समझें. आप भी एक अनमोल नगीना हैं. एक लड़के के दिल में लड़की के लिए कितनी चाहत होती है शायद लड़की जान न पाए (शादी से पहले) लेकिन इसका मतलब यह नहीं की उसे कोई दिल से नहीं चाहता. लड़के तो मरते हैं एक अच्छी लड़की तलाशने के लिए जिसके साथ अपनी ज़िन्दगी गुज़ार सकें. कई बार तो पीट भी जाते हैं. अच्छा है लड़कियों के साथ कम से कम ऐसा तो नहीं होता. औरत मर्द दोनों एक दुसरे के लिए ही बने हैं ताकि ज़िन्दगी को सही तरीके से जी सकें. मर्द सिर्फ पति कहलवाने के लिए नहीं है, बल्कि वोह औरत को दिलो जान से भी ज्यादा प्यार करता है, हर बात पूरी करने की कोशिश करता है, और हर आफत से बचाने की भरसक कोशिश करता है. औरत से भी वोह उसी तरह सहयोग की उम्मीद करता है. लोग तो जानवरों से भी दोस्ती करते हैं. आदमी और औरत की दोस्ती तो दुनिया में सबसे पुरानी है. इसमें स्वतंत्र और परतंत्र की कोई बात ही नहीं. हाँ बात रही अकेले रहने की तो इसमें कोई बुराई नहीं. लेकिन यह समाज है इसमें सभी को योगदान देना पड़ता है. अकेले रह कर अगर मज़बूत इरादों से सही से अपनी ज़िन्दगी को चला सकें तो कुछ भी नहीं . लेकिन यह भी याद रखें की रिश्ते नाते आदमियों के लिए ही बनाये गए हैं. रिश्तों से कुछ नुक्सान नहीं होता. यह तो एक को दूसरों से जोड़कर रखता है. चाहे पति पत्नी का ही रिश्ता क्यूँ न हो. उसके बीच भी तो दोस्ती ही होती है. हाँ कभी कभी रिश्तों में परेशानियां होती हैं. अजी कभी कभी तो लोग खाते हुए भी मर जाते हैं इसका मतलब यह तो नहीं की खाना ही गलत है. मेरी राय तो येही है की आप दिल से दबे हुए कुचले हुए के अहसाह निकल दीजिये. और सब से मिलजुल कर रहने की कोशिश करें जो समाज के लिए भी अच्छा है और आपके लिए भी .

    Anita Paul के द्वारा
    July 28, 2010

    जलाल जी, धन्यवाद आपकी टिप्पणी के लिए. समाज में रह के समाज को समझना तो जरूरी है ही. अच्छे-बुरे दोनों तरह के लोग दुनियां में हैं लेकिन क्या करूं मेरा साबिका ज्यादातर ऐसे लोगों से ही पड़ा अभी तक, जिन्होंने मेरा फायदा अन्य उपायों से लेने की चेष्टा की. सचमुच दुखद अनुभव, एक भयानक त्रासदी जिससे निजात पाना थोड़ा तो मुश्किल होता ही है.

rachna varma के द्वारा
July 28, 2010

पहले तो आप अकेलेपन की पीड़ा से बाहर निकलिए और अपने आप को पहचानिए अपने अन्दर आत्मविश्वास पैदा कीजिये की बहुत काबिलियत है आप के अन्दर उन सभी गुणों को पहचानिए अपनी पहचान बनाइये और थोड़ी धार्मिक किताबो को पढिये मन को एकाग्र कीजिये व्यस्त रहिये सिर्फ अपने बारे में मत सोचिये देश .,दुनियां की भी चिंता कीजिये

    Anita Paul के द्वारा
    July 28, 2010

    रचना जी, आपने लिखा है की ” सिर्फ अपने बारे में मत सोचिये देश, दुनियां की भी चिंता कीजिये ” शायद आप सही कह रही हैं. आपको धन्यवाद आपकी इस कीमती सलाह के लिए.

roshni के द्वारा
July 27, 2010

अनीता जी सबसे पहले तो आप नारी को खुद ही भोग्य की वास्तु न माने.. आज नारी इस वाक्य से कही ऊपर जा चुकी है.. और आज का पुरष वर्ग उसे पूरा सम्मान देता है… खुद को जितना कमजोर मानेगी उतना ही भीतर से टूट जाएगी…. आज बहुत सी औरते अकेली रहती है.. समाज उन्हें पूरी इज्ज़त देता है … कुछ अपवाद छोड़ कर आज नारी को पूरी आजादी है.. आपने दुःख से उभर कर उससे लड़ना सीखे.. जो हालत आपके प्रतिकूल है उन्हें अपने अनुकूल बनाने का प्रयत्न करे… अपने दुःख के साथ बहे नहीं…. बल्कि दुःख को हमेशा के लिए बहा दे … शारीरक निर्बलता कोई मायने नहीं रखती अगर आपके इरादे मजबूत हो .. मै तो आपसे यही कहुगी के आपके जो भी हालत रहे आप उनसे हारे नहीं बल्कि लड़े ताकि इस जीवन को सार्थक बना सके … ये जीवन एक बार मिलता है .. इसे अपने हाथों से ख़त्म न करके उन दुखद पलों को मिटा दे जो आपको दर्द देती है … और कुछ ऐसा करे जिससे आप दुरी औरतों के लिए मिसाल बन सके ……….. लड़े अपने हक के लिए ………..

    Anita Paul के द्वारा
    July 28, 2010

    प्रिय बहन रोशनी, एक नारी होने के कारण शायद आप मेरी भावनाओं को ज्यादा समझ सकेंगी ये उम्मीद है मुझे. आपकी सलाह पे अमल करने की कोशिश करूंगी…………..साथ ही ये अपेक्षा भी रखुंगी आपसे कि आप समय-समय पे अपनी एडवाइस जरूर देंगी.

chaatak के द्वारा
July 27, 2010

अनीता जी, स्त्री का अकेले रहना कोई गुनाह नहीं, कमजोर स्त्री का अकेले रहना गुनाह है| रह गई मर्दों की दुनिया में एक ही प्रजाति पाई जाती है हाँ नामर्दों की कई प्रजातियाँ होती हैं शायद आपका पाला मर्दों से नहीं पड़ा वर्ना अकेले रहने का ख्याल ही दिल से निकल जाता| मर्द एक ऐसा गधा टाइप का प्राणी होता है जो न काटता है न दुलत्ती मारता है वो आपके आगे पीछे एक मशहूर वफादार प्राणी की तरह दुम (जो दिखती ही नहीं) हिलाता चलता है| बैल की तरह मेहनत करके आपके हर नाज़-नखरे उठाता है और आप झूठा प्यार भी दिखाएँ तो सच्चा ऐतबार करता है अगर कुंवारा हो तो कई बार धोखे खाकर भी नारी के गुण गाता नहीं अघाता हाँ जान कीट्ज़ (एक अंग्रेज कवि) की तरह निकला तो प्रेमिका की यादों को दिल से लगाए उसकी बेवफाई के गीत लिखते-लिखते जवानी में ही इह-लोक से कूच कर जाता है| ये सभी बाते तो आपका ध्यान बंटाने के लिए थी| मुद्दे की बात ये है कि अपनी समस्याओं से सभी को खुद लड़ना होगा आपको भी| यदि आप चरित्रवान हैं तो इसका सर्टिफिकेट आपको किसी से नहीं चाहिए कहने दीजिये जो लोग कहते हैं थक कर चुप हो जायेंगे अपना ख्याल रखिये अगर कोई मर्यादा लांघने की कोशिश करे तो भीड़-भाड़ वाला इलाका देख कर एक आध तमाचा चला दो बाकी काम उपरोक्त गधे मर्द कर देंगे| ऐसे बात न बने तो सादे कागज़ पर कार्बन लगा कर तीन चार प्रतियों में अपनी व्यथा लिखकर एक कोतवाली में, एक जिलाधिकारी को, और एक सीधे राज्य के मुख्या मंत्री को भेज दो अगर २४ घंटे के अन्दर आपका काम न हो तो आप शिकायत पत्र की एक कापी जागरण जंक्शन पर स्कैन करके डाल दो फिर आगे उसे लिंक करके सभी जगहों पर पहुंचाना हमारा काम होगा| ये अपने अधिवक्ता मिश्र जी हैं न मार्गदर्शन करने के लिए| आपने पढ़ाई क्या सिर्फ पैसा कमाने के लिए की है एप्लीकेशन लिखना क्या अचार डालने के लिए सिखाया गया था या मजबूरी का रोना रोने के लिए| अपना लोकतांत्रिक हक़, अपने कलम की ताकत को पहचानो ! जागो नारी जागो ! (बुरा मत मानिएगा मैं ऐसा ही हूँ)

    Anita Paul के द्वारा
    July 28, 2010

    चातक जी, मर्द एक ऐसा गधा टाइप का प्राणी होता है जो न काटता है न दुलत्ती मारता है वो आपके आगे पीछे एक मशहूर वफादार प्राणी की तरह दुम (जो दिखती ही नहीं) हिलाता चलता है. इस एक लाइन ने मुझे हंसा दिया. आपको धन्यवाद अपना कीमती समय देने के लिए. वाकई आपके बातें प्रभावित करती हैं.

    Soni garg के द्वारा
    July 28, 2010

    वाह चातक जी क्या जवाब दिया है सही कहा है एप्लीकेशन लिखना क्या आचार डालने के लिए सिखाया गया था ! और हाँ अनीता जी चातक जी तो ऐसे ही है लेकिन करते बड़ी प्रभावशाली बात है ! और रोना रोने से कुछ नहीं होने वाला…… हो सकता है, आपके साथ मर्दों को लेकर बहुत अच्छे अनुभव न रहे हो लेकिन रोने से क्या फायदा अपनी कमजोरियां छोड़ो और ताकत को पहचानो और तबियत से बजाओ उसकी …….अगर आपको अपने upar विश्वाश है तो कोई भी काम मुश्किल नहीं होता बस थक कर हार मत मानलेना !

    Anita Paul के द्वारा
    July 30, 2010

    सोनी जी, जवाब देने के लिए आप को धन्यवाद. वैसे चातक जी जैसे लोग कम ही होते हैं जो वाकई अपनी बातों से ही लग जाते हैं कि वे नारी के सम्मान के लिए कितने प्रतिबद्ध हैं. शायद आपने सही कहा कि हमें अपनी ताकत पहचाननी होगी. यहॉ मैं आपसे एक लडकी होने के नाते एक प्रश्न कर रही हूं जवाब जरूर दीजिएगा: क्या नारी का हद पुरुष तय करे ऐसा होना चाहिए या नारी को उसकी हद स्वयं निर्धारित करने का अधिकार होना चाहिए.

R K KHURANA के द्वारा
July 27, 2010

प्रिय अनीता जी, आपने कहा है की ‘मेरी नजर में औरत केवल भोग्या है. केवल पुरुषों के मनबहलाव के साधन के रूप में स्त्री का निर्माण किया गया है. !’ मैं आपकी इस बात से बिलकुल भी सहमत नहीं हूँ ! आप “भोग्य” शब्द का प्रयोग क्यों कर रही है ! क्या नारी को पुरुष की चाह नहीं होती ? क्या नारी माँ बनकर अपने आप को पूरण नहीं मानती ? मैं मानता हूँ कुछ परिस्तिथियों में नारी के साथ अत्याचार हुए है लेकिन आज की नारी में अंतर आ गया है ! आपकी रचनायों से लगता है की आपको पुरुष जाती से बहुत दुःख मिला है या आपने केवल ऐसी परिस्तिथियों को ही देखा/भोगा है ! परन्तु सिक्के के दुसरे पहलु पर भी विचार कीजिये ! दुनिया रंगीन नज़र आयगी ! khurana

    Anita Paul के द्वारा
    July 28, 2010

    आदरणीय खुराना जी, टिप्पणी के लिए धन्यवाद. मेरा यही मानना है कि जब नारी समर्पण करती है तभी उसे उसका प्रतिदान मिलता है. यह समर्पण किसी भी रूप में हो सकता है. उसे हर वक्त पुरुष की आज्ञाकारिणी बन के ही रहना होता है तभी जाके वह कुछ पाने की आशा रख पाती है. नारी कितनी भी सशक्त हो लेकिन उसे अन्ततः दास्यभाव स्वीकार करना ही पड़ता है. शायद यही उसकी नियति है.

Nikhil के द्वारा
July 27, 2010

मैं आपसे सहमति नहीं रखता. आपके शब्दों में निराशा झलकती है. मैंने अपने आस-पास के हिंदुस्तान और हिंदुस्तान के जिन जगहों पर गया हूँ, औरत द्वारा उठाये गए हर अत्याचार की आवाज़ में पुरुषों की भागीदारी पर संदेह नहीं कर पाया. आप को अगर दुःख पहुंचा है, तो हम सब आपके साथ हैं. आपकी पीड़ा समझ नहीं सकते लेकिन बाँट सकते हैं.

    Anita Paul के द्वारा
    July 28, 2010

    प्रिय निखिल, मुझे बहुत अच्छा लगा कि आपने इस मुद्दे पर पूरा एक ब्लॉग “युवा और कुछ जानवर-२,( सभी मर्द एक जैसे आखिर क्यूँ?, का जवाब)” ही जंक्शन पर डाल दिया है. आपका ब्लॉग फीचर देख के और भी खुशी हुई. जागरण जंक्शन मंच को भी मैं धन्यवाद देना चाहुंगी जो उन्होंने अपनी बात कह सकने के लिए एक बेहतर मंच सुलभ किया है. आप के विचार अच्छे हैं लेकिन मेरे अनुभवों ने कुछ अलग ही बना दिया है मुझको. कोशिश करुंगी आपकी विचारधारा के अनुसार सोचने के. आपका धन्यवाद

    paku के द्वारा
    August 6, 2010

    lage raheye Anita Ji mard bahut naalayak ho gaye hi…………………….inko samjhana jaruri hi………..,

K M Mishra के द्वारा
July 27, 2010

सभी मर्द एक जैसे नहीं होते हैं । कुछ मूर्ख और कायर भी होते हैं । अभी आपकी मुलाकात सब से नहीं हुयी है । निराश न हों । समय एक सा नहीं रहता है । सकारात्मक सोचिये ।

    Anita Paul के द्वारा
    July 28, 2010

    मिश्रा जी, आभार………लेकिन मैं यही कहना चाहुंगी कि सारे मर्द अन्दर से एक ही तरह के मिले मुझे इसलिए मेरा अनुभव तो बार-बार चीख के यही कहेगा. कोशिश तो कर रही हूं पॉजिटिव सोचने के लिए लेकिन उन अनुभवों को कहॉ दफ्न कर दूं कैसे हटा दूं उन मानसिक आघातों को? आपके उत्तर का इंतजार रहेगा

Deepak Jain के द्वारा
July 27, 2010

अनीता जी चलो आपने ये काम तो बहुत अच्छा किया की अपने दर्दे दिल के हालात जागरण ब्लॉग के जरिये बयाँ कर दिए क्यूंकि कहते हैं दर्द बाँटने से कम होता है और आपकी बातों से ऐसा लगता है किसी ने आपके साथ धोखा किया है पर मै एक बात साफ़ कर देना चाहता हूँ की इसमें गलती सिर्फ उस मर्द की ही नहीं है जिसके साथ आपका वास्ता पड़ा है काफी हद तक आप भी कसूरवार हैं और मर्द ही नहीं आज औरते भी कुछ कम नहीं और एक बात और आपने कहा है – \\"यदि किसी स्त्री ने आवाज उठाने की चेष्टा की भी तो उसे चरित्रहीन, कुलटा, वेश्या आदि ना जाने किन किन उपाधियों से नवाजा जाता है.\\" आप शायद ये भूल रही हैं की हमारे देश में स्त्रियों को दुर्गा सरस्वती सीता , लक्ष्मी के नाम से भी नवाजा जाता है बस जरुरत है तो उन जैसा बनने की शायद मेरे विचारों से अआप्को और तकलीफ पहुंची होगी पर मेरा मकसद किसी को तकलीफ पहुँचाना नहीं एक बार आप अपने बारे में सोच के देखिये और मुझे बताइए आप कहाँ तक सही हैं दीपक जैन रायगढ़

    Anita Paul के द्वारा
    July 28, 2010

    दीपक जी सबसे पहले तो आपका आभार जो आपने मेरी पोस्ट पर अपना मूल्यवान समय दिया. मैं अपनी तमाम बातों अनुभवों को आप से बांटना चाहुंगी. समय-समय पर मेरे सारे अनुभव इस ब्लॉग के माध्यम से आपके सामने आते रहेंगे और मेरी प्रतीक्षा आपके कमेंट के लिए होगी. बहुत शुक्रिया

Manish Malhotra के द्वारा
July 27, 2010

अनीता जी मैं भी एक मर्द हूँ आप सरे मर्द पर ये आरोप नहीं लगा सकती की सभी मर्द एक जैसे होते है हाँ माना की कुछ लोग हैं जो ऐसी गन्दी हरकत करते है उनके कारण महिलाओं को इस समस्याओं का सामना करना पड़ता है परन्तु मेरा मानना है कि ऐसे मर्द को चोराहे पर नंगा करके मारना चाहिए आपकी इस समस्या को मैं समझ सकता हूँ

    Anita Paul के द्वारा
    July 28, 2010

    शुक्रिया मलहोत्रा जी


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