अकेली जिंदगी की दास्तां

दर्द कभी ना मिटने वाला दर्द फिर भी आस बाकी है कि कभी तो मिटेगा दर्द

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Anita Paul


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जब वो खुद पर रोती होगी, कुछ तकलीफ तो होती होगी

Posted On: 8 Nov, 2013  
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जो अपना गम छुपाओगे…

Posted On: 30 Oct, 2013  
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जागती रातों में बेबाक सी उस नजर ने मुझे देखा

Posted On: 25 Oct, 2013  
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नर रूपी भेड़िये की फितरत है यह तो

Posted On: 22 Jan, 2013  
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हर बार स्त्री ही दोषी क्यों ठहराई जाती है ?

Posted On: 23 Aug, 2012  
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“वह किसी और की हो गई” स्त्री के अपमान का ज्वलंत नमूना

Posted On: 30 Jun, 2012  
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जब आपने सोच पर काबू कर लिया तो बदलाव की गुंजाइश कहां !!

Posted On: 16 Jan, 2012  
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मर्दों की वासना को प्रेम समझती बेचारी नारी

Posted On: 14 Sep, 2011  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

प्रिय संपादक महोदया, आपने लिखा की आज हर आदमी/लड़के दरिन्दे होते हैं और वो सिर्फ वासनामय प्यार करते हैं लड़कियों से औरतो से. मैंने मान लिया. मगर मैंने सिर्फ इतना पूछना चाहूँगा की कृपया आप बताये की आज कल कौन सी औरत शरीफ हैं? अगर कोई लड़की किसी लड़के को समझ नहीं पाती तो लड़के क्या समझ पायेंगे? दुनिया में हर लड़के एक जैसे नहीं होते ठीक उसी तरह जैसे हाथो की उंगलियाँ एक बराबर नहीं होती. कई बार ऐसी लडकियां मिल जाती हैं जो सिर्फ अपने जिस्म को समाज में उछलकर, इस्तेमाल से अपनी परवरिश करती हैं, इनमे मज़बूरी वाली कम और पॉकेट मणि इकठ्ठा करने वाली ज्यादा हैं. आज पैसे ने इस कदर उन्हें बिगाड़ दिया है की आज वो भी यही समझती हैं की जो भी है बस यही है आसान तरीका पैसे कमाने का क्योकि इस कदर तो पैसे मिलने से रहे. मैंने एक लड़की से प्यार किया है और कई बार करीब आया, खूब मन भी किया उससे शारीरिक सम्बन्ध बनाने का मगर यह सोंचकर की उसकी ज़िन्दगी हमारी शादी से पहले खराब न हो जाए छोड़ दिया. हमारे बीच हर तीसरे दिन लड़ाई झगडे हो जाते हैं और मुझे वजह साफ़ साफ़ पता चल रहा था मगर चुप था. मगर एक दिन रहानहीं गया और पूछ ही लिया की आज बता दो अपने मन की बात जिसकी वजह हमारा झगडा है, क्योकि शुरुआत तुमसे ही होती है. उसने देर तो लगाई बताने में मगर कह दिया की आपसे पहले मैंने एक और लड़के से प्यार किया था और अपनी जिस्म तक उससे सौंप चुकी थी. सुन के झटका तो ज़रूर लगा मगर एक गलती तो इंसान भी माफ़ कर देता है हम तो फिर भी इंसान हैं. फिर उससे मैंने आगे की बातें नहीं पूछी की क्या-क्या हुआ. अब आप ही बताओ की उस लड़की को क्या ट्रीट करू किस तरह से करू ताकि मुझे पता चल जाए की हाँ अब वो जो पहले थी अब वो नहीं है. बाकी मुझे भी मालूम है की मेरे दिल में उसके लिए क्या है कितना प्रेम है. अगर मुमकिन हो तो इसका जवाब ज़रूर दीजियेगा मुझे इंतज़ार रहेगा. 

के द्वारा:

आदरणीय अनीता जी पर्दा और प्रदर्शन दोनों का अपना महत्त्व है न पर्दा पिछड़ेपन का प्रतीक है और न ही प्रदर्शन आधुनिकता का, पता नहीं कैसे आप ये मान बैठीं हैं कि कपडे पहनने से ही अक्ल आती है, मैं नारी उत्थान के विरुद्ध नहीं हूँ परन्तु नारी मुक्ति क्या है और किस से है ये मेरी समझ में नहीं आता, पता नहीं ये नारी संगठन किस तरह कि आधुनिकता के समर्थक हैं. आपने कभी ये तो नहीं लिखा कि नारी शिक्षा का प्रसार हो नारियों को शिक्षा में अलग से आरक्षण मिले. आपने और नारी संगठनों ने कभी भी मुस्लिम औरतों के उत्थान कि बात नहीं कि कि उन्हें भी तलाक के बाद मैन्टीनेन्स मिले केवल मेहर कि रकम से क्या होता है. पता नहीं मर्दों के किस छदमजाल जाल कि आप बातें करतीं हैं. आप भी अरविन्द केजरीवाल कि तरह केवल आरोप लगाती हैं लेकिन तर्कों पर बात नहीं करतीं. कृपया कुछ अच्छा साहित्य पढ़िए आपके मनोविज्ञान के लिए अच्छा रहेगा, मर्दों के खिलाफ दुष्प्रचार करके आप अपने आप को ही कष्ट पहुंचा रहीं हैं

के द्वारा: munish munish

धन्यभाग हमारे अनीता जी कि आप हमारे ब्लॉग पर पधारीं…सबसे पहले तो मैं बता दूँ कि “आसमान पे है ख़ुदा और ज़मीं पे हम…” सो बात सिर्फ ख़ुदा (कुदरत) के बनाये हुए नियमों की है..जिन्हे मनुष्य होने के नाते सामाजिकता का जामा पहनाना हमारी मजबूरी है.. वर्ना सचाई तो ये है कि विपरीत लिंग के लिए मनुष्यों के भी ठीक वही भाव होते हैं जो पशुओं के .परन्तु विडम्बना ये है कि आज तक “खुशवंत सिंह ” के सिवा किसी ने इसे स्वीकार करने का साहस नहीं किया…..लेकिन समाज के नियमों को ईमानदारी से निभाने वाले पुरुषों को उनकी शराफत के खिलाफ उकसाना क्या स्त्री का कर्तव्य है…?? माना कि कोई बहुत शक्तिशाली है, तो इसका ये मतलब तो नहीं कि सामने आते हुए साँड़ से भिड़ जाये ,जिसे कुदरत ने उससे भी ताकतवर बनाया है ,उसी प्रकार जब आधी आबादी को अपने “वीकर जेंडर ” होने का पता है तो खामखा इठलाने की क्या ज़रूरत है…सोबर तरीके से रह कर भी अपना काम किया जा सकता है..मेरा पूछना सिर्फ यही है कि ” क्लीवेज” दिखा कर स्त्री खुद को क्या सिद्ध करना चाहती है…क्या शरीर प्रदर्शन ही स्त्री की सार्थकता है..शालीन रहना मर्दों की हुक्म -परस्ती कैसे हो गया ये मेरी समझ में नहीं आया…अपने दायरे में रहना और रिज़र्व रहना तो ऊर्जा का संरक्षण है, इससे कोई भी इंसान चाहे वो पुरुष हो या महिला अपनी ऊर्जा को बेहतर सकारात्मक कार्यों में लगा सकता है और समाज को कुछ दे कर जा सकता है बजाय इसके कि चार दिन की ज़िन्दगी में खेले, खाये,एक्सपोज़ करके एक दूसरे को चैलेन्ज दे और ले , नकाब (सांकेतिक )को संरक्षण न समझ कर अपमान समझने जैसी बातों में उलझ कर काम करने के उपयोगी घंटों को छोटा कर दे…..मेरे ख्याल से स्त्री हो या पुरुष ,सार्थकता तभी है जब वो अपने कार्यों से समाज को कुछ दे….. ये बात जिसकी भी समझ में आ जाये वो स्त्री हो या पुरुष क्या फर्क पड़ता है..आज स्त्री और पुरुष अलग न हो कर एक दूसरे के प्रति compatible हैं..हमेशा औरत होने के काम्प्लेक्स में न रह कर ऊर्जा को रचनात्मक कार्यों में लगाया जाना चाहिए, लेकिन अगले इंसान की सोच का क्या पता …इसलिए क्यों न हम अपने लिए सुरक्षात्मक आवरण ले कर चलें ताकि अपने हिस्से का काम कर सकें…एक बहुत विवादित बात कहने का दुस्साहस कर रही हूँ……अगर ज्योति सिंह ने (दिल्ली गैंग रेप विक्टिम ) नाइट शो में अपने बॉय फ्रेंड के साथ मूवी देखने जैसा tabooed काम न किया होता तो आज फ़िज़िओथेरेपिस्ट के रूप में कुछ सकारात्मक काम कर रही होती…….जिन नराधम पापियों ने ये अति घृणित अमानवीय कृत्य किया उनके लिए तो कोई भी सजा कम होगी लेकि उनके सामने ऑब्जेक्ट बन कर जाने वाली भले ही “निर्भया” कहलायी , लेकिन मुझे वो सिर्फ परिस्थिति का शिकार लगती है…निर्भयता का कोई काम उसने किया हो ऐसा मुझे तो नहीं लगता…. आज PETA के कार्यकर्त्ता नंगे हो कर पत्ते पहन कर घूमते हैं लेकिन उनकी सराहना होती है क्योंकि उनका नंगा होना किसी को उकसाता नहीं है वरन समाज को एक सन्देश देता है……मल्लिका शेहरावत के चुस्त कपड़ों को वल्गर कहा जाता है न क़ि सानिया मिर्ज़ा की चुस्त टी-शर्ट को.......क्योंकि दोनों का मोटिव अलग है....शेष आप स्वतन्त्र सोच रखने की अधिकारी हैं.. मैडम क्यूरी के हिस्से में भी जागती रातें आयी होंगी जब उन्होंने यूरेनियम की खोज की....कोई और जागती रातों में क्या करता है ये उसका अपना दायरा है..मेरा इसमें कोई दखल नहीं है............

के द्वारा: sinsera sinsera

परम आदरणीय मुनीश जी, आप मेरे ब्लॉग पर आए और अपनी चिर-परिचित शैली में व्यंग्य बाण भी चलाए तथा सरिता जी के आलेख का लिंक भी शेयर किया जिसके लिए हम आपके आभारी हैं। आपको ये जानकर दुःख होगा कि मेरी नजर में सरिता जी उन स्त्रियों में शुमार होती हैं जिन्होंने मर्दों की गुलामी को ही नियति मान लिया है और इसीलिए ‘निकलो न बेनकाब’ की हिमायत करती हैं। हैरत होती है जब कोई स्त्री खुद ही अपने लिए परदे की तरफदारी करती हो लेकिन इसे दुर्भाग्य कहना ज्यादा सही है कि मर्दों के छ्द्मजाल को औरतों ने सच मान रखा है। क्या कर सकते हम ऐसी स्त्रियों के लिए, कैसे उन्हें इस भ्रम से मुक्त कराएं ताकि परंपरा, प्राकृतिक संरचना और संस्कृति सरंक्षण के नाम पर आए दिन होने वाले मर्दों के अत्याचार से उन्हें मुक्ति मिल सके। इससे भी ज्यादा चिंतनीय विषय यह है कि स्त्री समाज स्वयं को मर्द से अलग और स्वतंत्र अस्तित्व का कैसे समझे? आशा है हमारे ये बात आपको जरूर सोचने को विवश करेगी क्योंकि आप खुद भी स्त्री को गुलाम समझने की मानसिकता से ग्रसित हैं। धन्यवाद आपका

के द्वारा: Anita Paul Anita Paul

के द्वारा: yatindranathchaturvedi yatindranathchaturvedi

के द्वारा: Anita Paul Anita Paul

के द्वारा: yatindrapandey yatindrapandey

यदि सिर्फ़ औरत को ही समाज दोषी मानता अनीता जी, तो सलाखों के पीछे दबोचे जा चुके कांडा के प्रति पुरुष समाज की हमदर्दी दिखाई दे रही होती, उसे गालियाँ नहीं मिलतीं. जो जैसा होता है, समाज उसे उसी नज़र से देखता है. गीतिका का दोष इस मायने के साथ है कि एक पढ़ी लिखी वयस्क बालिका होने के बावज़ूद उसने खुद को फ़िसल जाने दिया, एक ऐसे दलदल की ओर, जो दूर से ही दिखाई दे रहा था, कि उसमें गिरने के बाद वज़ूद का समाप्त होना तो तय है ही. ज़िन्दगी रहे न रहे, इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ने वाला था. उस दरिन्दे द्वारा शोषित अन्य लड़कियाँ भी वज़ूद व आत्मसम्मान के मामले में खुद को ज़िन्दा लाश ही पा रही होंगी. अभिव्यक्ति में निरपेक्षता झलकना एक आवश्यक तत्व है. धन्यवाद !

के द्वारा:

के द्वारा: rajuahuja rajuahuja

सत्य वचन अनीता जी .......... यही बात मेरी भी समझ में नहीं आती की जब कोई फैसला किसी मर्द से जुड़ा होता है तो उसी से पूंछा जाता है की वह क्या चाहता है.....जबकि यदि कोई फैसला किसी स्त्री से जुड़ा हो तो ज़्यादातर उसके माँ-बाप ही वह फैसला लेते हैं और शादी के बाद उसका पति....बूढी औरतों के फैसले उनके बेटे....आखिर ऐसा क्यों? स्त्री कोई धन-दौलत या संपत्ति नहीं है की सदैव उसका कोई मालिक होना चाहिए वह भी एक जीवित इंसान है और उसकी अपनी मर्ज़ी भी होती है तथा हमें उसका सम्मान करना चाहिए, इसके आलावा स्त्रियों को भी अपनी जिंदगी के फैसले स्वयं करने के लिए आवाज़ उठानी ही चाहिए.... एक प्रमुख बिंदु पर लेख लिखने के लिए आपका आभार http://panditsameerkhan.jagranjunction.com/

के द्वारा: Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" Anil Kumar "Pandit Sameer Khan"

सार्थक लेख, सच ही कहा गया कि महिलाओं की अपनी पहचान नहीं होती। बचपन में फलां की बेटी, विवाह के बाद फलां की पत्नी, बच्चे होने पर फलां की मां के रूप में ही महिला जानी जाती हैं। इसके बावजूद कई महिलाओं से ही उनके पति व घर के अन्य लोगों की पहचान होती है। एवरेस्ट फतह करने वाली बछेंद्री पाल को शायद ही फलां की पत्नी कहा जाता हो। हां इतना जरूर है कि उसके नाम से ही घर के अन्य सदस्यों की पहचान होती है। महिलाएं ही अक्सर मोहल्ले की दूसरी महिलाओं की पहचान उसके नाम से न कर बच्चों आदि से करती हैं। इसलिए समाज में चाहे महिला हो या पुरुष, दोनों को ही अपनी सोच बदलनी होगी।  

के द्वारा:

आर एन शाही जी बेहतरीन जवाब............ आज कल लिखने वाली महिलाएं पुरुष समाज के प्रभुत्व के ऊपर ज्यादा लिखती है... जैसे केवल और केवल पुरुष ही महिलाओं को परेशान करते है... देखा गया कि समाज में खुद महिलाओं ने भी खुद महिलाओं पर कम अत्याचार नहीं किये..... अभी किछ दिन पहले मैं जागरण जंक्शन में लेख पढ़ रहा था.... " महिलाओं को क्यों पसंद आते है अधेढ़ पुरुष" ...जबकि ऐसे कई पुरुष जो कि पहले से शादी शुदा है... महिलाएं उनको क्यों पसंद करती हैं....दूसरी महिला का घर क्यों बर्बाद क्यों करती जबकि उन्हें पता होता है... शादी शुदा पुरुष केवल वासना के लिए उन्हें पाना चाहते हैं... महिलाओं के अपने भी स्वार्थ होते ऐसे संबंधो में.... सारे पुरुष एक जैसे नहीं होते.....

के द्वारा:

आपकी बातें पूरी तरह से गलत भी नहीं है ..और सत्य भी नहीं है.... आपने अपने लेख में सारे महिला समाज को एक तरफ और पुरुष समाज को एक तरफ रखा है.... जबकि सब जगह एक जैसा नहीं... महिला को सही प्रेम को समझने की कोशिश करनी चाहिए है.... सही कहा आपने वास्तविक प्रेम समर्पण में है... क्या सभी महिलाएं अपनी पति की प्रति समर्पण का भाव रखती है.????... क्या वो डिमांडिंग नहीं होती ????...या अपने पति से आशा नहीं रखती कि उसका पति उसके लिए कुछ करे..या बहुत कुछ करें ..... समाज में महिलाआयें भी उतनी ही दोषी जितने पुरुष संबंधो के प्रति... आप कुछ भी कहें मगर सही पुरुषों को चुनने में दिखा खाती है... वो हमेशा से follow up का शिकार होती हैं... कोई बहुत अधिक फ्लर्टी आदमी उनके पीछा पड़े रहे तो उसे प्रेम समझती है....

के द्वारा:

के द्वारा: anandpravin anandpravin

क्षमा करें रिया जी, आप अपने दिल से पूछिये, आपका प्रतिवाद वहां से नहीं, बल्कि दिमाग़ से आ रहा है, मात्र एक नारी के समर्थन के प्रयासों के तहत । हमारा और अनीता जी का यह प्यारा सा विवाद बहुत पुराना है । अफ़सोस कि हम अभी तक उन्हें ही नहीं समझा पाए, तबतक आप से भी दो-चार होने की नौबत आ गई । अब तो मेरा भगवान ही मालिक है । माना कि नारी भावुक होती है, और प्यार भरी बातें उसे कमज़ोर भी करती हैं । परन्तु इस आधार पर ये मान लेना कि मर्द का प्यार सिर्फ़ एक दिखावा है, और वस्तुत: उसकी एकमात्र मंशा नारी को कमज़ोर कर उसका भावनात्मक शोषण करना है, मेरे विचार से एकतरफ़ा और अन्यायपूर्ण सोच ही कही जाएगी । यदि सचमुच मर्द ज़ात की यही सोच आज भी होती, तो शायद आप और अनीता जी दोनों ही आज इस तरह के सार्वजनिक मंच पर पुरुषों से बहस नहीं कर पातीं । जहांतक कपट और भावनात्मक शोषण की बात है, तो अकेले पुरुष को ही इसके लिये दोषी कैसे मान सकती हैं आप लोग ? हर काल में हर प्रकार की मानसिकता वाले पुरुष और महिला दोनों ही अस्तित्व में रहे हैं । आज की छोड़िये, हम त्रेता की बात करें, जब समाज पूर्णतया पुरुष प्रधान हुआ करता था । क्या कैकेयी और मन्थरा जैसे चरित्र अस्तित्व में नहीं आए ? राजा दशरथ द्वारा रणक्षेत्र में दिये गए दोनों वरदान को कपटपूर्वक तत्काल न मांग कर कैकेयी ने भविष्य के अनुकूल समय के लिये क्यों सहेज कर रख लिया ? और मांगे भी तो ऐसे वरदान जिसने उस पूरे युग को ही चपेट में ले लिया । कैकेयी से भी बड़ा भावनात्मक शोषण करने वाला यदि कोई ऐतिहासिक-पौराणिक पुरुष चरित्र आपके ज़ेहन में हो, तो मुझे भी कृपया अवश्य बताने का कष्ट करेंगी । पछाड़ खाकर गिरे दशरथ के करुण विलाप पर प्राणप्रिया पत्नी होकर भी कैकेयी को ज़रा भी दया नहीं आई । क्या वे बिल्कुल वही कैकेयी थीं, जिन्होंने रणक्षेत्र में रथ के पहिये से निकल चुके कील के स्थान पर अपनी उंगली लगाकर भी दशरथ की तथाकथित प्राणरक्षा की थी ? उसी प्रिय पति को पुत्र-वियोग में क्यों मर जाने दिया ? और इस तथ्य के आधार पर क्यों नहीं माना जाना चाहिये कि उन्होंने रणक्षेत्र में दशरथ की प्राणरक्षा के लिये नहीं बल्कि उनके साथ खुद भी घिरी होने के कारण अपनी प्राणरक्षा हेतु वह कथित वीरांगना वाला ढोंग किया था ? अब इससे बड़ा प्रमाण मैं आप को क्या दूं महोदया, कि नारी का प्यार सिर्फ़ और सिर्फ़ अपने स्वार्थ के लिये होता है ?

के द्वारा:

अनीता जी, इस मर्दवादी मकड़जाल से अधिक खुशी मुझे आपकी मंच पर बहुत दिनों बाद दर्ज की गई उपस्थिति से हुई है । आप आती हैं तो जैसे गर्मियों में ठंडी बयार, और इन सर्दियों में वातानुकूलन के हीटर जैसी अनुभूति होती है । उसपर आपकी सधी-सुघड़ भाषा में अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करने का अंदाज़ तो बस अभिभूत कर देता है । अब इसे मर्दों वाली लच्छेदार बातें समझ कर झिड़क मत दीजियेगा, वरना सचमुच बड़ी मायूसी होगी । मर्द बेचारों की यही तो कमज़ोरियां हैं, जो उसे नारी के सामने घुटने टेकने पर मजबूर करती आई हैं, और आप हैं कि उनके ग़ुलामों वाले भाव को भी कपट समझती आई हैं । आप नारी स्वतन्त्रता की आवाज़ बुलन्द करती रहिये, रास्तों को झंडों और बैनर्स से पाट दीजिये, हम तो उसे अदा और नज़ाक़त का ही नाम देंगे, मजबूरी जो ठहरी ! लेकिन इतना ज़रूर याद रखियेगा अनीता जी, कि - 'हद के अन्दर हो नज़ाक़त तो अदा होती है … हद से बढ़ जाए तो आप अपनी सज़ा होती है' । आपकी लेखनी का एक दीवाना …

के द्वारा:

अनीता जी आप सारा आरोप पुरुषों पर ही क्यों लगाती है ये मैं आज तक नहीं समझ पाया . खैर अगर आप ऐसी लड़की को जानती हैं जिसने किसी पुरुष को अपना सब कुछ देने के बाद उससे धोखा खाया तो मैं भी ऐसे पुरुषों को जानता हूँ जिनकी पत्नियाँ अपने बच्चों की देखभाल से ज्यादा अपने कैरियर की फ़िक्र करती हैं,और घर पर कम ही रहती हैं और बिचारे पापा आफिस और बच्चों दोनों की देखभाल करते हैं. वही औरत जब घर पर होती है तो पति के आफिस जाने के बाद किसी गैर को घर में बुला के उसके साथ मौज मस्ती करती है. आपकी जानकारी के लिए मैं बता दूं कि ये बात मुझसे उस औरत की लड़की ने बताई थी. और ये भी कहा था कि उसकी मम्मी के ना रहने पर उसको कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन पापा से दूर वो नहीं रह पाती . क्योंकि जब वो बड़ी हो रही थी तो जो समस्याएं एक बेटी माँ के साथ बांटती है वो उसे पापा के साथ बांटना पड़ा था (आप स्वयं एक महिला हैं इसलिए आप उस समस्या को समझ सकती हैं) खैर जिस लड़की की बात आपने की क्या यहाँ उसकी गलती नहीं थी उसने क्यों किसी से शारीरिक सम्बन्ध बनाया ? मतलब वासना का कुछ भाग तो उसमें भी रहा होगा ना........ वैसे ताली एक हाथ से तो बजती नहीं तो आप उसे निर्दोष कैसे कह सकती हैं? फिल्म जूली में एक महिला को प्यार में धोखा खाके वेश्या बनते दिखाया गया है लेकिन क्या उस फिल्म में नेहा धूपिया द्वारा क्रमशः यश टोंक तथा संजय कपूर द्वारा सम्बन्ध स्थापित करना सही था? कहा जाता है दूध का जला छाछ भी फूंक कर पीता है फिर एक बार धोखा खाने के बाद दूसरे से चक्कर कहाँ तक उचित था?(फिल्म का थीम काफी अच्छा है.)

के द्वारा:

बहुत सोचा कि लिखूं या ना लिखूं लेकिन दिल ने कहा कि आज लिख ही डालूं मन की बात. कई बार पहले भी सोची थी कि लिख ही देनी चाहिए लेकिन जंक्शन के लोगों के विचार इतने अच्छे लगे कि मुझे ना लिखने में ही भलाई नजर आई. फिर भी आज मैं सारा संकोच छोड़ कर एक सच लिख रहा हूं जिससे आपकी विचार धरा में कुछ अंतर आ सके. (जब आप लिखने में नहीं मानी तो हम बिना टिप्पड़ी दिए कैसे मान जाएँ हम क्या कम हैं) अनीता जी, आपको नहीं लगता की आपकी सोच कुए के मेंडक के समान है जिसे सिर्फ कुआ ही पूरी दुनिया नजर आता है......हो सकता है जागरण के ही नहीं सारी दुनिया के पुरुषों की सोच रुदिवादी हो जैसा आप समझती हैं परन्तु आपकी सोच भी कुछ ख़ास विस्तार नहीं पा सकी है पता नहीं आप किस दुनिया में जीती हैं ...... परन्तु यकीं मानिए ये दुनियाँ कहीं ज्यादा खूबसूरत है सिर्फ नजरिया बदलने की जरूरत है .......

के द्वारा: munish munish

अनीता जी आपके पुरुषो के प्रति विचार पड़कर मुझे एक बड़ा आश्चर्य हुआ कि आप कैसे एकतरफा नजर रखकर लिख लेती है, मानना पड़ेगा आपकी इस कला और ज्ञान को, वाकई आपने तो अपनी और से आदमी की जैसी छवि पेश की है उससे तो लगता है की दुनिया के सभी मर्द एक जैसे होते है, एकदम वासना और शैतानियत के पुजारी. पहले हमें यहाँ यह समझ लेना आवश्यक है की असल में वासना, प्रेम और स्वार्थ में क्या सम्बन्ध है. जिसे हम सभी अक्सर प्रेम समझते है, वो अक्सर वासना और स्वार्थ का ही मिला जुला रूप है, बस उनकी प्रतिशतता का अंतर भर है. जिसे पहचाने के लिए एक निष्पक्ष नजर चाहिए. प्रकृति ने पुरुष और स्त्री को शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक रूप से अलग अलग प्रकार का बनाया है. यदि कुछ गुण पुरुष में है तो स्त्री में कुछ अन्य गुण है, जैसे पुरुष की शारीरिक रचना स्त्री से मजबूत और शक्तिशाली होती है किन्तु भावनात्मक और सहनशक्ति के मामले में स्त्री पुरुष को मात दे देती है. प्रेम और वासना के सम्बन्ध में यदि बात करे तो पुरुष अक्सर स्त्री से प्रेम उसके ब्राह्य सोंदर्य से प्रेरित होकर करता है, जिसे अक्सर वासना की संज्ञा दी जाती है किन्तु वाही वासना आगे चलकर गहन प्रेम में भी परिवर्तित हो जाती है. जैसा की आपने देखा ही होगा एशिया के अधिकतर देशो में अरेंज मेरिज का प्रचालन है. उसमे अक्सर मर्द जब लड़की को पसंद करते है तो वह उसकी शारीरिक संरचना पर अधिक ध्यान देते है और विवाह के कुछ समय तक उनके प्रेम में वासना की ही प्रधानता रहती है, किन्तु जैसे जैसे समय बीतता जाता है उनके बीच प्रेम अपनी गहनता लेने लगता है. तब उनके लिए शारीरिक आव्शय्क्ताये इतनी मायने नहीं रखती जितनी की भावनाए. इसी प्रकार यदि हम स्त्री के प्रेम की परिभाषा पर एक नजर डाले तो विवाह से पहले वह और उसका परिवार भावी दुल्हे के किन किन गुणों पर ध्यान देते है, वहा पर स्त्री का अपने भावी पति के चुनाव में उसकी आर्थिक दशा और उसकी भावनात्मक स्थिति प्राथमिक होती हई. यहाँ पर स्त्री के प्रेम में स्वार्थ का सम्मिश्रण अधिक मात्र में पाया जाता है किनती विवाह के पश्चात जैसे जैसे पति पत्नी भावनात्मक और शारीरिक रूप से एक दुसरे को सही प्रकार से समझ लेते है तब उनके प्रेम की गहनता में पहले की अपेक्षा अधिक परिपक्वता आ जाती है. http://singh.jagranjunction.com

के द्वारा: Amar Singh Amar Singh

आदरणीय अनीता जी ,.सादर अभिवादन पहले तो आपको लिखने के लिए साधुवाद ................आप यह क्यों नहीं समझ पा रही हैं कि सब एक जैसे नहीं हो सकते कभी नहीं हो सकते ,....आप एक या कुछ मर्दों के आचरण के आधार पर पूरे समाज को क्यों कठघरे में खड़ा कर रही हैं ,....आप को क्या लगता है सभी नारिया सावित्री की प्रतिमूर्ति हैं ,..कदापि नहीं......................................... अच्छाई और बुराई दोनों ही सर्वव्यापी है,...सबसे दिलचस्प तो यह है कि बुरा इंसान भी अच्छा काम कर देता है और निहायत अच्छा इंसान भी घोर पाप कर देता है ,...सब कुछ परिस्थिति और तात्कालिक मानसिकता पर निर्भर करता है ,..अंत में एक बात जरूर कहूँगा ....जब भी आप कुछ लिखना चाहे,... एक बार परम आदरणीय श्री रमेश बाजपेई जी के वात्सल्य को जरूर याद करियेगा,...हार्दिक शुभकामनाओ सहित http://santo1979.jagranjunction.com/

के द्वारा: Santosh Kumar Santosh Kumar

प्रिय अनीता जी सदा की भांति इस बार भी आपके पोस्ट पर हाज़िर हूँ, आजके युग में, कोई किसी से कम नहीं है, अगर आपने अपनी किसी साथी की कथा सुने है तो मई भी अपने एक साथी के साथ हुई.... वो माध्यम परिवार से था, और किसी बड़ी ही सुन्दर लड़की के साथ उसका अफ्फैर काफी समय से चल रहा था और इसी बीच एक काफी धनि घर का लड़ता उस लड़की में ....., और कुछ समय के बाद मेरा मित्र अपना टूटा हुआ दिल ले कर घूम रहा था, पर मई उसके लिए सारी लड़कियों को दोषी नहीं मानता, जैसा की आदरणीय निशा जी ने कहा है, की पांचो उँगलियाँ बराबर नहीं होती, उसी तरह न सरे मर्द और न ही सारी महिलाएं .... वैसे ये आपका फवोरित टोपिक है और इस लिए ..... http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

के द्वारा: abodhbaalak abodhbaalak

अनीता जी , सादर अभिवादन ! आपके साहस की प्रसंशा करता हूँ जो इतनी बेबाकी के साथ यह विचार प्रस्तुत किये ,परन्तु मैं श्री रुद्रनाथ त्रिपाठी एडवोकेट के विचारों से सहमत हूँ | आप कहती हैं कि- "जिस दिन उसे ये एहसास हो गया कि आज तक वह केवल पुरुष पर विश्वास करने के कारण ही इतनी यंत्रणा भोगती रही है उसी दिन से उसका कायाकल्प होने लगेगा|" यह सत्य नहीं है | आपकी मित्र के साथ घटित एक अपवाद हो सकता है ,इसके लिए पूरे पुरुष समाज को दोषी ठहराना उचित नहीं है | आज नारी जागरूक है , कोई भी अनैतिक कृत्य दोनों की सहमती के बिना संभव नहीं ,इसे नारी का प्रेम में समर्पण और पुरुष का स्वार्थ मान लेना उचित नहीं | आप अपनी मित्र की बात करती हैं , प्रतिदिन ऐसी घटनाएँ भी सुनने -पढने को मिल जाती हैं ,जिसमें कोई नारी अपने अबोध बच्चों को छोड़कर दुसरे पुरुष के साथ चली जाती है या फिर अपने प्रेमी के साथ मिलकर पति की हत्या कर देती है | कृपया इसे अन्यथा न लें परन्तु यह सत्य है | आपके अनुसार पुरुष पर अविश्वाश से नारी को यंत्रणाओं से मुक्ति मिलेगी और उसका कायाकल्प हो जायेगा | वास्तव में ऐसा होने पर नारी का कायाकल्प ही हो जायेगा क्योंकि तब वह नारी नहीं रहेगी | एक-दुसरे का विश्वास ही नर-नारी के संवंधों को पूर्णता प्रदान करता है | यदि नारी माँ है तो बच्चे के पिता के सहयोग से, यदि बहन है तो पुरुष भाई के सम्बन्ध से और यदि पत्नी है तो पुरुष पति के पवित्र बंधन से | यदि कोई नासमझी में क्षणिक आनंद के लिए अपना चारित्रिक हनन करता है तो इसके लिए पूरे पुरुष समाज या स्त्री जाति को कलंकित मान लेना उचित नहीं है | अनीता जी क्षमा करें, संकीर्णताओं से बहार निकलें |

के द्वारा: naturecure naturecure

aapke vichaaron se sahamat toh nahi huaa jaa saktaa. manushya ki prakriti itani adhik anishchit hoti hai ki kisi ek manushya ke bhi baare main nischit rup se yah nahi kahaa ja saktaa ki vah pratyek sthiti main amuk prakaar se hi aacharan karegaa , yah vyakti se vyakti, yahan tak ki ek hi vyakti ke maamle main bhi alag -2 paristhiti main badal saktaa hai, fir kisi samuh yahan tak ki lagbhag aadhi aabadi ke baare main koi bhi sarvamaanya raay kaise banaayi ja sakati hai. maaf kiziyegaa kintu main aapko do udaaharon se spasht karanaa chahtaa hun , kyaa aapke mun main apne pitaa ke prati bhi yahi khayaalaat hain jo aapne purushon ke baare main upar likhen hain, aur dusaraa yah ki aapne apne hee ek blog ( kitani khatarnaak ho sakti hai swatantra khayaalaton waali ladaki) main yah maana hai ki sabhi striyaan bhi doodh ki dhuli nahi hoti hain. manushya swabhaav ke maamle main koi bhi sarwamaanya raay kabhi bhi nahi banaayi jaa sakti hai. rahi baat ladkiyon ki toh, aaj kaa koi bhi thodaa bhi samajhdaar vyakti yah jaanataa hai ki ladkiyaan (vishesh taur par tathaakathit romance yaa prem ke maamle main) apne hiton ko sarvapramukh praathmiktaa deti hain. ek ladake ko ( kuchh maamle main toh ek se zyaada bhi) ko tab tak bewkuf banaaye rakhati hain jab tak ki usase better koi option na mil jaaye yaa fir maata pitaa dahez ke dum par naa khoz den, fir usake saath furrrrrrrrrrrr. तमाम ऐसी स्त्रियां हैं जो पुरुष को आज भी भगवान की तरह पूजती हैं और उन पर आंख बंद करके विश्वास करती हैं. उन्हें यदि समझाने की कोशिश भी जाए तो वे नहीं समझने वाली बल्कि वे आप पर ही तोहमत लगाना शुरू कर देंगी. aapki yah line aaj se 100 yaa hazaar varsh purva sahi thi kintu tab purush bhi aise nahi huaa karte honge. samaaj ke har varg main naitik giraavat aayi hai aur iskaa apvaad striyaan bhi nahi hain.

के द्वारा:

आपने एक बहुत सुन्दर शब्द का इस्तेमाल किया है'पुरुषोचित गुणों से युक्त स्त्रियाँ'....स्त्री के शक्ति उसका अंग दिखाते वस्त्र पहनना नहीं है,यदि ऐसा होता तो 'पोल डांसर्स' नारी सशक्तिकरण की सबसे बड़ी संस्थाएं होती,नंगई और शालीनता में जमीन आसमान का फर्क होता है,देवियाँ जो पूजी जाती हैं,अपनी स्त्रियोचित गुणों और भद्र उपस्थिति के कारण,स्त्री या पुरुष कोई भी हो,शालीनता के अभाव में सम्मान का हकदार नहीं होता है,और न ही होना चाहिए,अंग दिखाते वस्त्र पहनने पर सबसे पहली ऊँगली तो खुद घर में माँ,बहने उठाती हैं,कम कपडे पहनकर बाहर जाने पर सबसे पहली प्रतिक्रिया स्त्री की ही मिलती है,कोई भी माता यह नहीं चाहती कि उसकी बेटी सार्वजनिक रूप से अपना बदन दिखाते हुए कपडे पहन कर घर से बाहर निकले,लेकिन 'नारी सशक्तिकरण' के नाम पर सब जायज है? आपकी जो भ्रान्ति है कि 'स्त्री एक संपूर्ण रचना है जिसमें विचलन की गुंजाइश शून्य होती है.अमूमन स्त्री की बनावट और उसकी प्रकृति उसे संसार में सर्वोत्तम सिद्ध करती है.'यह स्पष्ट तौर पर तर्क विहीन तथ्य है जिसे सिर्फ मनोभावों से आप प्रतिमान के रूप में स्थापित करना चाहती हैं,पुरुष के अभाव में स्त्री मातृत्व सुख नहीं प्राप्त कर सकती और इस प्रकार स्त्री की सम्पूर्णता अपूर्ण रह जाती है,हकीकत में स्त्री और पुरुष दोनों ही एक दुसरे के बिना अपूर्ण हैं,एवं इसे कोई तर्क खंडित नहीं कर सकता,मैं आपको एक सलाह देना चाहूँगा कि नकारात्मक सोच के दायरे से बाहर आयें,जिंदगी में बहुत कुछ सकारात्मक भी है.हर स्त्री का पिता एक पुरुष तथा हर पुरुष की माता एक स्त्री ही होती है,और हर माता अपनी संतान को बिना लिंग-भेद किये उचित संस्कार देने की चेष्टा करती है,यह हमारी आपकी गलती है कि उन संस्कारों को नारी-पुरुष संघर्ष की आड़ में पूरी तरह मटियामेट करते रहते हैं.आप इमानदारी से बताइए अंग दिखाते कपडे पहनने पर माताएं,बहनें या सहेलियां कभी टोकती भी नहीं,कपड़ों को लेकर मजाक भी नहीं करती क्या?तो फिर पुरुषों को ही दोषी क्यूँ ठहरा रही हैं आप.

के द्वारा: rahulpriyadarshi rahulpriyadarshi

अनीता जी, आपने कूटनीतिक विशेषज्ञों के अंदाज़ में अपना मत प्रकट किया है, जो मात्र एक व्यक्तिगत और काल्पनिक शंकाओं पर आधारित विचार है । यदि अन्ना कांग्रेस द्वारा संचालित आंदोलनकर्त्ता हैं, तो मानना पड़ेगा कि कांग्रेस को अब कदाचित सद्बुद्धि आ गई है, और गांधी के रामराज्य को चरितार्थ करने के लिये कांग्रेस अब कटिबद्ध हो चुकी है । भले ही इसका श्रेय वह मनमोहन को न देकर राहुल को देना चाहती हो, उनकी ताजपोशी के बाद । कांग्रेस की शह पर अन्ना देश में चुनाव सुधार का विगुल बजा रहे हैं, ग्रामसभा की सहमति के बिना किसी कानून निर्माण में सांसद द्वारा संसद में समर्थन पर प्रतिबंध लगाने का कानून पारित कराना चाहते हैं, जनप्रतिनिधि से असंतुष्ट होने पर जनता को राइट टू रिकाल तथा राइट टू रिजेक्ट जैसे कनूनी हथियारों से लैस कराना चाह रहे हैं, फ़िर तो मानना पड़ेगा कि देश को अपने नेतृत्व में अंग्रेज़ी सत्ता से स्वतंत्रता दिलाकर कालान्तर में खुद देश लूटने वाले मवालियों का गिरोह जैसी छवि स्थापित कर लेने वाली कांग्रेस का अब हृदय परिवर्त्तन हो चुका है, तथा थोड़ी तिकड़मों के साथ ही सही, वह अब देश का उद्धार करने को तत्पर हो चुकी है । वाह अनीता जी, क्या कल्पना है ? हमें आपकी कल्पना अत्यन्त प्रिय होगी, यदि राहुल गांधी अपने नेतृत्व में अन्ना का लोकपाल विधेयक अक्षरश: लागू करवा दें, तथा एक-एक राजनेता द्वारा विदेशों में ज़मा किया गया कालाधन अपने देश में लाकर सरकारी खज़ाने में ज़मा करा देने की महती कृपा करें । फ़िर तो उनके जैसा लोकप्रिय प्रधानमंत्री 'न भूतो, न भविष्यति !' फ़िर भी आपको बहुत-बहुत धन्यवाद । क्या करें, अपना तो दिल ही कुछ ऐसा है ।

के द्वारा:

अनीता जी सादर नमस्कार, बहुत वैचारिक मुद्दा उठाया है आपने. राजनीति के इस खेल में इस प्रकार के प्रपंच जो अक्सर हमें देखने को मिलते है, जिसमे अगर कभी जनता किसी जन सामान्य मुद्दे पर बडचढ़ कर हिस्सा लेती है और बात में वह मुद्दा राजनीति का एक हिस्सा बन जाता है और जनता राजनितिज्ञो के हाथो मात्र एक कठपुतली बन स्वयं को छला महसूस करती है. इन सब में यदि देखा जाए तो यहाँ लोगो की किसी भी व्यक्ति विशेष पर एका एक अंध भक्ति का ही नतीजा है. जैसे भारत के लोगो की पुरानी आदत रही है की वह सदा ही बड़ी से बड़ी समस्याओ के खिलाफ तब तक आवाज नहीं उठाते जब तक उन्हें कोई ऐसा व्यक्ति नहीं मिल जाता जो उनकी आवाज को शासक वर्ग तक पंहुचा सके और यही निर्भरता यहाँ लोगो को अपाहिज बना देती है जिस कारण से वह बार बार छले जाते है, क्योकि वाही व्यक्ति जो आज अपने राजनेतिक योग्यता के सहारे जनता की आवाज शासको तक पहुचता है व्ही कल उन्ही ताकतवर शासक वर्ग के हाथो किसी न किसी कारणवश या तो मजबूर हो जाता है या बिक जाता है और जनता का आत्मनिर्भर, भीरु और दुसरे व्यक्ति पर आश्रित होने के कारण वह सदा गुलामी की जंजीरों में बंधी रहती है. अन्ना हजारे और रामदेव के सम्बन्ध में यहाँ यह बात भी साफ़ दिखती है की जब रामदेव जी ने काला धन को लेकर आन्दोलन किया तो उनके पीछे भी जनता का अपार सहयोग था किन्तु सरकारी दबाव के चलते जब रामदेव और बालकृष्ण पर सरकारी गाज गिरी तब कही न कही स्वयं को सरकारी प्रकोप से बचाने के लिए रामदेव जी ने अपने हाथ आन्दोलन से पीछे खीच लिए, और जनता जो कल रामदेव जी को समर्थन कर रही थी वह चुपचाप उनकी दयनीय स्थिति का मात्र तमाशा देखने लगी. यह भी खूब है. नारा तो लागाते है तुम संगर्ष करो हम तुम्हारे साथ है किन्तु जब प्रतिक्रिया स्वरुप सरकारी प्रकोप आंदोलनकारियो और उनके नेता पर गिरता है तब सभी एकाएक चुप्पी साध लेने में अपनी भलाई समजते है. अन्ना जी के आन्दोलन पर भी यही बात लागू होती है जैसे सरकार ने अन्ना का अनशन तुडवाया और उनकी ३ शर्ते मानने के लिए आश्वाशन दिया है किन्तु उसे पूर्ण करने की कोई समय सीमा तय नहीं है. यदि यहाँ भी सरकार यह तीन मुद्दे सालो तक लटका दे और अन्ना और उसकी टीम किसी भी कारण से चुप्पी साध ले तब उनके समर्थक उन पर अंध श्रधा के चलते चुप रहना ही उचित समझेंगे क्योकि उन्हें तो सदा की भाति किसी न किसी के कंधे का सहारा लेने की आदत पद चुकी है. और नतीजतन समस्याए घटने के बजाई पहले से भी अधिक विकराल रूप धारण कर लेंगी. http://singh.jagranjunction.com/2011/08/31/%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%9F%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A4-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%87-%E0%A4%AA%E0%A4%B0-%E0%A4%A7/

के द्वारा: Amar Singh Amar Singh

भरोदिया जी,सन्तोष भाई जी,अनीता जी  ,  सादर प्रणाम.    पूरी या अधूरी सहमती के लिए धन्यवाद.   अनीता जी ,आप विरोधीभाषी अभिव्यक्ति में निपुण हैं. आप  यह भी कहतीं हैं कि मैने दिखावे को देखा वहीं आप यह भी कहती हैं कि मै जरा आँखे खोलू. मैने जो दिखा वो देखा हां मेरे पास दिव्यदृष्टि नहीं है कि जो न दिखे उसे देख लूँ वो भी पलट के......!  आपको भ्रष्टाचार कोई मुद्दा ही नही दिखता,और आंखे मै खोलूं..! लाभ चाहे कांग्रेस ले जाये या भा.ज.पा. हमे तो प्रभावी लोकपाल चाहिये. यदि जनता को बरगलाना इतना ही आसान था तो अन्ना के समानान्तर/विरोध में थोड़ी भीड़ कोई राजनैतिक दल ला देता या अभी भी ला के देख ले . मै पुन: यही कहुंगा कि मनमोहन सिंह को प्रधान मंत्री पद से हटाना उनके लिए मुक्ति ही होगी और  समय समय बलि चढ़ने से निज़ात मिलेगी.     अनीता जी के मूल लेख पर अनुच्छेदवार मेरी टिप्पणी अभी भी अनुत्तरित है......  (आशा है अनीता जी उस पर अपनी दिव्य दृष्टि डालते हुए स्पष्ट करेंगी, धन्यवाद)

के द्वारा:

अनीता जी पहली बार आपने डिप्रेशन वाले विचारों से हट कर कुछ लिखा इसके लिए आपको हार्दिक बधाई भ्रष्टाचार को समाप्त करने की अन्ना की मांग एकदम सही है लेकिन अब अन्ना की कुछ मांगे गलत हैं. अन्ना द्वारा न्यायपालिका को लोकपाल के दायरे में लाने की मांग गलत है क्योंकि न्यायपालिका कई दोषियों को सजा देने का काम भी karti है तो ऐसे में हो सकता है कोई सज़ा प्राप्त व्यक्ति बदले की भावना से किसी न्यायधीश पर भरष्ट होने का गलत आरोप लगा दे……………. तो ऐसे में जज कैसे निष्पक्ष होकर न्याय कर पायेगा…….. इसलिए सज़ा तो गलत या झूठा आरोप लगाने वाले को भी कड़ी से कड़ी मिलनी चाहिए.वरना न्याय व्यवस्था चरमरा जायेगी… और इससे हो सकता है उन लोगों को भी नुकसान हो जो अपने पर हुए अन्याय के लिए इन्साफ मांगने न्यायलय की शरण में जाते हैं…… तब उन्हें एहसास होगा की अन्ना का समर्थन करके उन्होंने कितनी बड़ी गलती की थी …………………. प्रधान मंत्री को कई बार देश हित में कई अजीबो गरीब तरह के फैसले भी करने पड़ते है ऐसे में अगर प्रधानमंत्री लोकपाल जांच में फंसा तो देश का तो बंटाधार हो जाएगा ……….. जो भी बात प्रधानमन्त्री बोलता है तो वो देश के 121 करोड़ लोगो की और से बोलता है,ऐसे में लोकपाल के दायरे में उसे रखने की बात सरासर गलत है एक आम आदमी जब अपने घर के दो चार सदस्यों की समस्या सुलझाने में पागल होने लगता है, तो प्रधानमत्री किस सूझ बूझ से निर्णय लेता होगा ये तो वही जानता है. जहाँ तक बात विपक्ष के शोर शराबे की है तो सत्ता तो विपक्ष की भी आएगी, तो विपक्ष (जो उस वक्त सत्ता में होगा) कैसे निर्भीक होकर काम करेगा ??????????? फिर चाहे वो भाजपा हो या कोई और……….. हाँ जजों की संपत्ति की जांच के लिए क़ानून बनाया जा सकता है जो उनपर रिश्वतखोरी का आरोप लगने, या उनके कदाचार साबित होने पर उन्हें अपदस्थ करने में सक्षम हो……….. खैर मैं ज्यादा क्या लिखूं क्योंकि कुछ लोगों को बुरा लग सकता है. वैसे भारत में जब तक कोई चीज़ खुद के सिर पर ना गिरे लोगों को कुछ एहसास नहीं होता …………. लेकिन इतना ज़रूर कहूँगा की संविधान से ऊपर कोई नहीं है ना तो प्रधानमंत्री, ना न्यायपालिका, ना लोकपाल और ना ही अन्ना हजारे इस बात की क्या गारंटी है की लोकपाल ढूध का धुला होगा । रही बात भ्रष्टाचार की ,तो उसके पक्ष में मैं भी नहीं हूँ, और हाँ मैंने ये कहना चाहा है कि सज़ा का प्रावधान गलत या झूठी शिकायत करने वाले के लिए भी होना चाहिए

के द्वारा: ajaykumar2623 ajaykumar2623

श्री अजय सिंह जी, आपने आंदोलन के दिखावे को ही देखा और सच से मुंह मोड़ लिया. जरा आंखें खोलिए जनाब तब जाकर अन्ना एंड टीम किस तरह साजिश में साथ है ये बात समझ में आएगी. मीडिया और कांग्रेस की जुगलबंदी से एक ऐसे मुद्दे को मुद्दा बना दिया गया जो कहीं से भी मुद्दा नहीं था. जनता को भावनात्मक रूप से मूर्ख बना उसका दोहन किया जा रहा है. लोग पागल होकर अन्ना-अन्ना चिल्ला रहे हैं. लाभ आखिरकार कांग्रेस को मिलेगा. कांग्रेस का प्रयोग सफल हुआ. अब भी जनता को राजनैतिक आंदोलनों में बड़ी संख्या में इकट्ठा किया जा सकता है साथ ही कांग्रेस अपने मंतव्यों को जनता पर थोपने में सफल हो सकती है बिना इस बात को सामने लाए कि सारा आंदोलन उसके छुपे उद्देश्यों के लिए संगठित किया गया था. बहुत शीघ्र अन्ना पुनः आंदोलन करेंगे और कठपुतली मनमोहन जी की बलि चढ़ेगी साथ युवराज सत्तारूढ़ होंगे तब शायद आपकी भी आंखें खुलें.

के द्वारा: Anita Paul Anita Paul

अजय भाई जी ,भरोदिया भाई जी ,..आपके विचारों से असहमत नहीं हुआ जा सकता ,..लेकिन जिस तरह से कांग्रेसी जूनियर टीम एक्टिव हुई है ,...कुछ शंका जरूर पैदा करता है ,...जब आदमी के पास आगे जाने की ललक आसमान पर हो और रास्ता ना हो तो ....चोर दरवाजा ढूढते ही है ,... क्या कोई इस बात से इनकार कर सकता है कि दिसम्बर २०१० की रामलीला मैदान की रैली में रामदेव जी ,..अन्ना जी ,.अरविन्द जी ,.आदि सभी आन्दोलनकारी एक मंच पर थे,.. जिसको किसी भी मीडिया ने नहीं दिखाया...क्यों ???....रामदेव भले ही छछूंदर का मन्त्र ना जानते हों ,...लेकिन उनके साथ अमानवीय अत्याचार करने को गुलामी के नए आयाम कायम करते प्रधानमन्त्री जरूरी बताते हैं ,... ...एक बात और भी है ,..क्या जुगाड़बाजी में माहिर कांग्रेस सिर्फ अग्निवेश को ही प्लांट कर सकती है ,...टीम के और लोग भी दलाली कर सकते हैं ,.... सबसे बड़ा सवाल इस आन्दोलन को सफल बनाने में टीम अन्ना के बाद सबसे बड़ा योगदान भारत सरकार और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का है ,.....क्या कांग्रेसी इतने बेवकूफ हैं ,...उनके पास इंटेलिजेंस सूचनाये जरूर रही होगी कि यदि अन्ना जी के साथ जबरदस्ती हुई तो जनता भड़क जायेगी ,...फिर भी उन्होंने एसा ही किया ?? ...खैर,.. मैं अलसुबह अपने आराध्य से प्रार्थना करता हूँ कि मेरी मामूली शंकाएं निर्मूल हों और अन्नाजी तथा उनके सहयोगी देश को नयी रौशनी दे सकें ,....मैं खुद भी अन्नाजी का घोर प्रशंशक हूँ ,..इस आन्दोलन के बहुत पहले से ही ,...उनके मंतव्य पर प्रश्न उठाना मेरी निपट बेवकूफी होगी,...लेकिन टीम क्या कर रही है ? इस पर जागरूक रहना हमारी जिम्मेदारी है ,.....कुछ और भी सवाल हैं ,....सेकुलर शहाबुद्दीन (जो पानी पी पी कर हिंदुत्व को गरियाते हैं ) ,..उनको मंच प्रदान करते हैं ???? .... क्यों किरण बेदी जी शाही इमाम ( उनकी तारीफ के लिए शब्द नहीं हैं ) का आशीर्वाद लेने जाती हैं ????,....हालाँकि ये गलतियाँ भी हो सकती हैं ....... फिर भी मैं मानता हूँ ,..हमें हर कदम अन्ना जी के साथ खड़े रहना चाहिए ,..लेकिन कदम कहाँ पड़ रहा है?..ये समझना भी हमारी जिम्मेदारी है ,.....अजय भाई जी आपसे एक विनती है ,...किसी भी विचार को धारणा के आधार पर एकदम ख़ारिज कर देना उचित नहीं ,..अनीता जी शायद मुझे अपना ख़ास विरोधी मानती होंगी ,..ये तो मेरी प्रतिक्रिया का जबाब भी कम ही देती हैं ( मेरे ब्लॉग पर तो कभी पधारी ही नहीं ),.,..लेकिन कुछ आशंकाए थी तो मैंने प्रतिक्रिया देना उचित समझा ,...मुझे विश्वास है ,..आपका स्नेह मेरे साथ सदैव रहेगा ,....सादर धन्यवाद ... http://santo1979.jagranjunction.com/

के द्वारा: Santosh Kumar Santosh Kumar

अनीता जी आपकी अनूठी शैली ,दृढ वैचारिक प्रखरता व विद्वता से हम सब परिचित है | अपने यहाँ सत्य बोलो मगर प्रिय बोलो , अर्थात अप्रिय सत्य को प्रकट करने की मनाही है | अतिरेक उत्साह या जोश में बहुत विद्वान् व विवेकशील लोगो से अनायास ऐसा कुछ निकल ही जाता है | आदरणीय श्री जार्ज फर्नांडिस जुझारू ,कर्मठ व विनम्र होने के साथ साथ प्रखर वक्ता भी थे | राष्ट्र के रक्षा मंत्री बनने के बाद उन्होने कह दिया की भारत को सबसे बड़ा खतरा चीन से है | कूटनीतिक प्रचलन के लिहाज से यह सत्य होते हुए भी सही नहीं था | तब सफाई में यह कहा गया था कि चुकि मंत्री जी ने जीवन भर विपक्ष कि भूमिका का निर्वहन किया है ,इस लिए यह बात निकल गयी | आप समझदार है | लेखक किसी घटना को अपने दृष्टिकोण से देखता है व विचार प्रकट करता है | यह उसका अधिकार भी है | इस लिए इस पोस्ट से सहमती या असहमति कि राय तो दी जा सकती है अनर्गल प्रलाप ठीक नहीं | आप इस मंच कि बहुत ही सम्मानित ब्लोगर है | आपकी लेखनी सदा सार्थक लेखन करे यही कामना है | शुभकामनाओ सहित

के द्वारा:

अनीता जी,सन्तोष जी, नमस्कार.  उस समय सच मे मै उत्तेजित हो गया था किन्तु अब हँसी भी आ रही है. य़ह लेख किसी भी दृष्टि से गंम्भीर नहीं है और  पॉलिटिकल एक्सप्रेस मे न हो कर इसे हास्य व्यंग में होना चाहिये था. फिर भी यदि आप जैसे लोग भी साहसिक पोस्ट कहते हुए इसे महत्व देते हैं तो अनीता जी और आप से कुछ  बातों को स्पष्ट करना होगा.....   1- इस लेख के पहले अनुच्छेद में ही अनीता जी दिग्भ्रमित हो गयीं. बानगी देखिये...     (वैसे हँसना मना नही है) "अन्ना जी एन्ड कं. कान्ग्रेस के प्रति वफादारी निभा रही थी और मीडिया कांग्रेस की ही नीति को आगे बढ़ा रही थी.... वह भी प्रचार करने में लग गयी कि “जनता जीत गयी”, “जनमत की विजय हुई." दोनो बातें कैसे ?यदि अन्ना और मीडिया कांग्रेस के थे तो उन्हे जनता की जीत का प्रचार न करके  "कांग्रेस की जीत " या "सरकार की जीत" या कांग्रेस और सरकार को धन्यवाद आदि का प्रचार किया जाता. 2.दूसरे अनुच्छेद का आशय 'राहुल बाबा' के लिए सत्ता हस्तांतरण के लिए माहौल बनाना था.    जो कांग्रेस आजादी के बाद हमेशा से नेहरु परिवार के लिए बंधुआ मजदूरों की टोली रही हो   उसे इतने छोटे काम के लिए इतना बड़ा षडयंत्र जबकि स्वयं MMS साहब बाबा को अपना उत्तराधिकारी  कई बार घोषित कर चुके हों. 3.बाबा राम देव छछूंदर का मंत्र जाने बिना ही सांप के बिल में हाथ डालने की गलती कर बैठे.   अन्ना जी ने इस आन्दोलन से पहले अपने गांव,क्षेत्र में स्वयं सेवा द्वारा विकास कार्य किया एवं   प्रदेश में आन्दोलन द्वारा कई मंत्रियों को त्यागपत्र देने पर विवश कर दिया था.   RTI के लिए 10-11 दिनों तक पहले ही सफल आन्दोलन कर चुके थे.  13 दिनो तक बिना अन्न के भी अन्ना की शारीरिक शक्ति इतनी थी कि उन्हे किसी सहारे की  आवश्यकता न हुई वहीं दो दिनों मे ही योग गुरु की हालत देखने लायक हो गयी थी.  एक जेल के डर से भागता है दूसरा जेल को ही अपना तपोस्थल बना देता है.  एक राजनैतिक महात्वाकांक्षा पाले, बिना सही तैयारी,बिना दूरदृष्टि एवं बिना आत्मविश्वास के       दुनिया के सबसे बड़े लोक तंत्र के विरुद्ध जंग छेड़ देता है वहीं अन्ना जी एक माह पूर्व सरकार  को समय देते हुए आगाह करते हैं, किरन बेदी,केजरीवाल एवं प्रशांत भूषण आदि जैसे IPS,IAS, कानूनविद की टीम के साथ योजनाबद्ध तरीके से जनमानस मे अपनी बात का प्रचार-प्रसार करने के बाद आदर्श तरीके से सत्याग्रह आन्दोलन का शुभारम्भ करते है.    दोनों के व्यक्तित्व एवं कर्म मे जैसा अन्तर था ,उनके सामने सरकार की हालत मे भी वैसा  ही अन्तर था.     चूहे लिये बिल्ली ने दबंगयी दिखायी थी, बिल्ली वही थी लेकिन अबकी सामने शेर था. 4. चौथे अनुच्छेद के कथन के आधार का भी सर और पैर नहीं मिल रहा है,     कांग्रेस सरकार को बदनाम नही करना चाहती थी लेकिन उसके प्रवक्ता मनीष तिवारी    एवं दिग्विजय सिंह ने कांग्रेस को और कपिल सिब्बल एवं पी.चितम्बरम ने सरकार को बदनाम करने मे    कोई कसर भी नहीं छोड़ी भले वे ऐसा नहीं चाह रहे थे.         पूरे घटना क्रम मे मनमोहन सिंह की छवि पर कोई असर नहीं पड़ा जैसे कठपुतली थे वैसे वैसे आज भी हैं किन्तु राहुल की लम्बी चुप्पी और फिर बचकाने लम्बे भाषण से उनकी वर्षों की मेहनत पर पानी फिर गया. युवा वर्ग में पैठ बनाने की जी तोड़ कोशिश करने वाले राहुल से आज के समय मे युवा वर्ग  सबसे अधिक निराश और क्रोधित है. राहुल ने अपनी संवेदनहीनता एवं अपरिपक्वता का प्रमाण स्वयं  दे दिया.  मनमोहन सिंह यह स्पष्ट करने मे सफल रहे कि वे  प्रधान मंत्री को लोपा. के अधीन लाने के  पक्ष मे थे किन्तु कांग्रेस के दबाव में वे मुकर रहे हैं.      वाह.....!!!! यह कौन सी नीति है कि जिसे पदच्युत करना है उसकी छवि बेहतर बनायी जाय   एवं जिसको पदाशीन करना है उसकी बनी बनायी छवि को भी धूलधुसरित किया जाय. 5. पांचवा अनुच्छेद कुछ सच्चाई प्रस्तुत करता है,पुन: अन्ना जी एवं उनके सिपाही एक नहीं वरन कई    आन्दोलन करेंगे . बेचारे मनमोहन जी तो अभी ही (भी नहीं) बकरा है जो किश्तों में कई बार बलि    चढ़ते हैं ,उनकी आवाज एवं आत्मा की बलि चढ़ते हम देख ही रहे हैं.  लेकिन विश्वास करें जिस छण से वो राजनीति से मुक्ति पा लेंगे उसी छण से वो पुन: डा0  मनमोहन सिंह बन जायेंगे.       (मेरी इस प्रतिक्रिया पर अनीता जी के लेख के सन्दर्भ मे आप सबसे टिप्पणी अपेक्षित है.     अग्रिम धन्यवाद !!!!!)

के द्वारा: ajaysingh ajaysingh

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.आगे आगे देखो होता है क्या ? पोस्टेड ओन: 22 Aug, 2011 Junction Forum, पॉलिटिकल एक्सप्रेस में Follow My Blog Rss Feed अन्ना की आंधी आने से पहले ही “मेडम ” इलाज के बहाने नौ दो ग्यारह हो गई ,साथ ही उन्होंने “युवराज” के मुह पर पट्टी बांध दी और दिखावे के लिए पूरा पलड़ा सरदार जी के सर पर लाद दिया ,ताकि देश की जनता समझे सारा निर्णय सरदार जी ही ले रहे है जबकि वास्तविकता से देश की जनता भली भांति वाकिफ है कि सरदार जी ने जब से पदभार संभाला है बेचारे अपनी इच्छा से पानी तक नहीं पीते. अब इसमें देश कि जनता को कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए यदि अन्ना कि इस आंधी से सर्कार कि कुर्सी डोली झट से मैडम अपनी उपस्थिति दर्ज करते हुए सरदार जी को निक्कम्मा साबित करते हुए ” युवराज ‘ को गद्दी पर बैठा दे , क्योकि अब युवराज को९ भी लगने लगा है कि गद्दी पर बैठना तो उसका जन्मसिध अधिकार है . Rate this Article: (1 votes, average: 5.00 out of 5)

के द्वारा: Suraj Agrawal Suraj Agrawal

अनीता जी आपने अपने लेख के माध्यम से मुझे अपना विचार प्रस्तुत करने का अवसर प्रदान किया इसके लिए आपका बहुत बहुत आभार ,,,अभी कुछ बातें आपके लेख के ऊपर --- इससे हवस के पुजारियों को जरूर सशक्त मैसेज मिलेगा कि अब स्त्रियां अत्याचार बर्दाश्त करने के मूड में नहीं हैं.(क्या यह सभी पुरुष जाती के ऊपर प्रहार है ?) अगर हाँ तो शायद आपने अभी तक न ही रिश्तों को मह्शूश क्या है और न ही उन्हें (जिया) है--रिश्तों का निर्वहन एक अलग विषय है ,,परन्तु रिश्ते को जीना एक अलग विषय वहां रिश्ते में पति पत्नी (स्त्री पुरुष ) का अस्तित्व खत्म हो जाता है केवल और केवल मित्रवत भाव बन जाता है,,और यही एक पति पत्नी के रिश्ते की सार्थकता है (जहां दोनों ही एक दूसरे को ह्रदय से मह्शूश करते हैं परन्तु इसके लिए दोनों के पास ह्रदय का होना आवश्यक है ) I'm not talking about the physical heart,, I'm talking about his heart, which God can be experienced ,But this emotion, is against the Western concept ( इसे (कान्ट इत्यादि ) के चश्मे से नही देखा जा सकता (It may be feeling in my heart without any prejudice to if the person is an empty heart) ( जिन्हें बस पशु के समान एक खूंटे में बंधकर सारी जिन्दगी मार खाते रहने के अलावा अन्य बातें निरर्थक लगती हैं उन्हें आजाद जीवन और उसके विविध पहलू कैसे लुभा सकते हैं.) यहाँ भी आपने पति पत्नी के ही रिश्ते पर प्रहार किया है ( एक खूंटे में बंधकर)(If you want to send a message to society, the woman had Keep in sex with many men ) परन्तु यह महिलाओं ही नही अपितु पुरुषों के लिए भी अत्याधिक हानिकारक है आप एक ऐसे मनोभाव को खत्म करना चाहती हैं जिसके माध्यम से ईश्वर तक की भी प्राप्ति होती जिसके धागे में एक परिवार बंधा होता है न ही वहां कोइ दास होता है और न ही वहां कोइ स्वामी सभी एक दूसरे के पूरक होते हैं (It is not a physical relationship ) इसे जिसने (यहाँ मे पुरुष एवं स्त्री दोनों की बात कर रहाहूँ ) जिसने जिया है उसे वही समझ सकता है (जिस तरह ईश्वर की प्राप्ति तर्कों के माध्यम से नही होती (पता नही आप ईश्वरवादी हैं या नही या फिर पाश्चात्य जगत की ईश्वर के प्रति अवधारणा पर विश्वाश रखने वाली हैं (वह तो सिर्फ भोग्या है और पुरुष के एंटरटेनमेंट के लिए बनी है.----------अगर आपके शब्दों में यह सही है तो फिर ''' Western society and the existence of male prostitution & also in Indian society is there than elsewhere?) आपकी इस सोच से कितने लोग सहमत होंगे ( ''What woman does not experience the joy of the intercourse ? Yes it is possible Some exceptions in the man and the same way also in women ,,,(आपने अपने पिछले लेख कपड़ों की स्वतंत्रता की बात की तो यह मानदंड पुरुषों के ऊपर भी लागू होते हैं (क्या आप चाहती हैं स्त्री एवम पुरुष दोनों ही अनावृत्त होकर स्वच्छन्दता से भ्रमण करें चलिए मे आपके इस प्रकृति वाद को मान भी लेता हूँ परन्तु इससे एक और भ्रान्ति उत्पन्न हो जाती है प्राकृतिक सौन्दर्य अवलोकन/रसास्वादन किस दृष्टी से न्याय संगत नही है (यहाँ भी मै स्त्री पुरुष दोनों की ही बात कर रहा हूँ---परन्तु हो सकता है आपकी दृष्टि में पुरुष सुन्दर न होते हों ''तो यह आपकी भावना है समाज की नही'' (क्या कभी किसी नदी ने सागर से यह कहा की वह उसका शोषण कर रहा है यहाँ भी दोनों एक दूसरे के पूरक हैं इसलिए अंतर्विरोधों का उठना अस्वाभाविक है ) तो क्या आपकी दृष्टि में स्त्री पुरुष एक दूसरे के पूरक नही हैं,,(माता पिता) यह केवल शब्द नही एक भावना है जिसके लिए उस जीवन को जीना पड़ता है (यहाँ भी मै पाश्चात्य अवधारणा की बात नही कर रहा जो केवल भौतिकतावादी है ) पति पत्नी यहाँ मौन की भी भाषा समझते हैं ,,(आज तक दुनियां में सारी कुर्बानियां स्त्रियों ने दी हैं.-----------------(Pay attention this words) आपकी तरह ही एक महिला ब्लॉगर ने मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के विषय में भी( स्त्री शोषण) का आरोप मढ़ा था ,,ध्यान दीजिए किसी विषय का अध्ययन करना एक अलग विषय है और उसे समझना एक अलग विषय ,,अतः स्वस्थ मष्तिष्क से बिना पूर्णतः विचार किए किसी निष्कर्ष पर पंहुचना अत्याधिक हानिकारक होता है स्वयं के लिए भी और समाज के लिए भी ,,(आपके इस कथन से कितने लोग सहमत होंगे ? चलिए आपके शब्दों में कुर्बानियों की ही बात करते हैं ---------स्वतंत्रता आन्दोलन में भी न जाने कितने लोगों ने अपनी आहुतियाँ दीं तो क्या वो सभी दास हुए ? आपनी मातृभूमी की सीमा पर आज भी न जाने कितने सैनिक शहीद हो जाते हैं तो क्या वह दास हुए ? देश के आंतरिक मामलों को सम्भालने (ताकि आप सुरक्छित वातावरण में रह सकें --और उन्ही की वजह से आप लिख भी पा रही हैं ) में न जाने कितने पोलिस के जवान अपनी जान न्योछावर कर देते हैं तो क्या वह सभी दास हुए ? ऐसे हजारों उद्धरण मिल जायेंगे आपको ..................... ध्यान दीजिएगा त्याग अनेकों प्रकार के होते हैं उसे भौतिकतावादी चश्मे से नही देखा जा सकता ,, समाज में वैसे भी अलगाववादी शक्तियाँ बहुत हैं कम से कम सम्पूरक को एक दूसरे के विरुद्ध खड़ा करने का प्रयत्न न करें | अगर करना ही है तो कुछ सार्थक करने का प्रयाश करें ताकि देश, समाज ,मानवता का कुछ भला हो सके (न की आपके मष्तिष्क में कल्पित उस कुंठित स्त्री का रूप जिसे आपने बड़े यत्न से सम्भालकर रक्खा है ) (महिला का उसका वाजिब हक़ दिलवाने मैं अपनी आवाज बुलंद कीजिये न की उसे एक दूसरे से अलग करने मैं ) एक मरी मछली से सारा तालाब प्रदूषित नही होता सडांध कुछ समय के लिए होती है तदुपरांत वह पुनः निर्मल जलाशय हो जाता है | मैं इस अपनी टिप्पणी के लिए उन तमाम मर्यादित पाठकों से क्छ्मा प्रार्थी हूँ,, परन्तु इस तरह के लेखन के कारण मुझे बाध्य होकर ऐसे तर्कों को विवश होकर रखना पढ़ा जिसे पढ़ कर बहुत मर्यादित ब्लॉगर( मेरी दृष्टि में ब्लॉगर महिला या पुरुष न होकर केवल एक ब्लॉगर होता है ) शर्मिन्दगी का अनुभव करेंगे ,, और अंत मैं अनीता जी मै सदैव स्वस्थ तार्किक बंह्स का स्वागत करता हूँ ---तसलीमा नसरीन ने भी समाज की कुरीतियों के विरुद्ध आवाज और लेखनी बुलंद की थी न की पुरुष के विरुद्ध .......प्रकृति के विरुद्ध युद्ध में सदैव बलवान से बलवान भी पराजित हो जाता है इतिहास इस का प्रमाण है ...और आपका लेखन भी मुझे कुछ ऐसे संकेत दे रहा है (मुझे आपसे सहानुभूति है ,,आप इसे अन्यथा नही लेंगी''सहानुभूति अपनत्व का प्रमाण होती है इसे अन्यान्य अर्थों में लेकर ह्रदय में आक्रोश न उत्पन्न होने दें ) ..........................................जय भारत

के द्वारा:

मेडमजी मधर टेरेसा के जीवन के अंतिम सालो मे जो पोप थे, वो पोप आज जीवित है तो उसे आप ये लेख भेज दिजीए । आपको जरुर सीधी राह दिखायेन्गे । मै एक प्रसंग बताता हु । मधर टेरेसा जब जिन्दा थी तबकी बात है । एक बडा समारोह टी.वी. मे लाईव बताया था । एक बडे होल मे पोप खडे है । पोप से मिलने दुनिया भर के लोग लाईन मे खडे थे । एक एक कर के सब पोप से मिलके निकल जाते थे । मधर की बारी आई तो मधर सीधे ही पोप के पैरो मे पड गई । पोप को बडा झटका लगा, उन्होने मधर को अपने हाथोसे खडा किया । पोप कुछ बोले लेकिन क्या बोले वो सुनाई नही दिया । लेकिन उन के चेहरा ही बहुत कुछ बताता था । वो झुंझला उठे थे ईस लिए नही की पैर छुना गलत है, बल्की ईस लिए की मधर जैसी व्यक्ति भारत से आई है, भारत के संस्कार ले के उसे मिलने आई है । मधर उमरमे भी बडी है, मेरी मा समान है । अगर मा ही बेटे का पैर छुए तो कैसे चलेगा । लाईन लंबी थी मा-बेटे का संवाद २०-२५ से ज्यादा नही चला । पोप कोई ऐरा गैरा होता नही । करोडो मे अच्छा आदमी ढुन्ढ के उसे नियुक किया जाता है । जब वो भारतिय संस्कारो का मान करना जानते है तो आप जैसे लोगो को भी सोचना चाहिए । आप पोप को मानते हो या स्थानिय राजनीति के साथ जुडे हुए चर्च के फाधर को ?

के द्वारा: bharodiya bharodiya

मेड्मजी अजय कुमारने क्या गलत कहा । आपकी रानी कुछ देशो को आजाद करना पडा वो सेह नही सकती है । ईस लिए अब पूरी दुनिया को एक छत्र के निचे ला कर पूरी दुनिय पर राज करना चाहती है । वो चाहती है की दुनिया के सब देशो की सरहदे मिटाने से पेहले कुछ साफ सफाई हो जये । ६ अरब की आबदी ज्यादा है, २ अरबका नाश करवाना है । अणु बोम्ब से हो सकता है लेकिन उसका बुरा प्रभाव उनकी नयी दुनिया पर पड सकता है । ईससे तो अच्छा है लोगो को ही आपसमे लडाकर मरवाया जये । आतंकवाद आपकी रानी का हथियार है । अमरिका और दुनिया को उल्लु बनाया जाता है, हम आतंकवाद विरुध्ध की लडाई मे आपके साथ है । लेकिन सब जानते है आतंकवादी हथियार अपने घरोमे नही बनाते उसे युरोप सप्लाई करता है । आदमी को तोडने के लिये उसकी जीवन प्रणाली को तोड दो । उसको अकेला कर दो, अपने समाज से, अपने कुटुंबसे । शादी की प्रथा ही तोड दो । आपकी रानी को नयी दुनिया मे ऐसे लोगो की जरुरत है जीसकी हैसियत मजदूरोसे अधिक ना हो । उसे मध्यम वर्ग नही दो हीवर्ग चाहिए, मजदूर और पुलिस । उसके इस मिशन मे आप जैसे लोगो को प्लान्ट किया जाता है । कुछ लोग अपनेआप प्लान्ट हो जाते है । आप लोगोका मिशन सफल होगा लेकिन अभी १०० साल की राह देखो । हिन्दु, मुस्लिम और दुसरे धर्म के लोग अभी जिन्दा है । पेहले उसे खतम करो फीर नयी दुनिया को बसाने की कोशीश करो । ये भी याद रख्खो दूसरो को खतम करते समय दूसरो के साथ साथ आपके लोग भी खतम होन्गे । उस वक्त ईसा मसीह को भी अफसोस होगा की मैने ये क्या कर दिया धर्म बना के ।

के द्वारा: bharodiya bharodiya

के द्वारा:

प्रिय अनीता दीदी प्रणाम , आपके ब्लॉग में मै पहली बार आया हूँ बहुत ही सुन्दर और परिपूर्ण आलेख प्रिय दीदी सदियों से नारी की येही दशा है चाहे वो उच्चा बर्ग हो या निम्न हमेशा से नारी भोग और प्रदर्शन की बस्तु की तरह देखा जाता रहा है आप आज कही भी जाओ चाहे वो कोई कोचिंग संसथान ही क्यों न हो वहा पे आपको रेसेप्सेनिस्ट कोई नारी ही मिलेगी क्यों और कोई पद उनके लिए नहीं है ?हमारे समाज की निति तो देखिये एक तरफ देवी की तरह नारी को पूजना और दूसरी तरफ उसका इस तरह उपयोग करना परन्तु फिर भी दीदी मेरा मानना है समाज मै सभी पुरुस एक से नहीं है सहरी समाज के ही कारन आज गाँव के समाज की तस्वीर बदल रही है मै आपको एक बात बता दू की गांवो में सहरो की अपेक्षा मर्यादा बिहीन होती जा रही है वहा पति पत्नी में भाब्नात्मक बंधन नहीं देह लालसा को सर्वोपरि देखा जाता है औरत अनेको रस्ते कायम करती है और पुरुस भी और जबतक हम भाब्नात्मक बंधन से पूर्ण नहीं होंगे ऐसी दसा होती रहेंगी प्रिय दीदी मैंने अगर कुछ गलत कह दिया हो तो माफ़ करना आपना ख्याल रखना ,धन्यवाद सुभेच्चाओ सहित आपका बिनीत सुप्रिय

के द्वारा: supriyo supriyo

अनीता जी सादर प्रणाम, बहुत अच्छे विचार है आपके स्त्रियों के लिए किन्तु कही कुछ विचारों पर मैं कुछ टिप्पणी करना चाहूँगा. वस्त्रो को लेकर आप अपनी जगह सही है की स्त्री को कभी भी कही भी अपनी मर्जी से कोई भी वस्त्र पहनने की स्वतंर्ता होनी चाहिए किन्तु स्त्री को भी इस बात का अवश्य ध्यान में रखना चाहिए की वह जिस समाज में रहती है वहा के लोगो का मानसिक स्तर किस स्तर का है, क्या वह स्त्री को उन छोटे कपड़ो में देखने के आदी है. और वह उन्हें देखकर किस प्रकार की अक्सर प्रतिक्रियाए करते है. समाज में किसी भी पुरानी मान्यताओं और विचारधाराओ को बदलने में समय लगता है और आज की स्त्री इन सब बातो पर विचार न करके मात्र अपने अहंकार पूर्ती के लिए इस जिद में अड़ने लगती है की हमें छोटे वस्त्र पहनने की आजादी होनी चाहिए. और उन्हें आजादी मिलती भी है तब नतीजा यह होता है की पश्चिम समाज की विचारधारा और पूर्वी विचारधाराओ में असामनता होने के कारण यहाँ के पुरुष उन्हें देखकर उत्तेजना महसूस करने लगते है और स्व अभिमान की हानि को भी बर्दाश नहीं कर पाते और जिसका दुस्परिनाम सबसे अधिक महिलाओं को ही भुगतना पड़ता है. read more articles http://singh.jagranjunction.com/

के द्वारा: Amar Singh Amar Singh

अनीता जी, आपके ब्लॉग को पढ़कर कुछ भी ऐसा नहीं लगा कि आप सम्पूर्ण नारी जाति या कम से कम हिन्दुस्तान की ही नारियों का प्रतिनिधित्व करती हों| पुरुषवादी मर्दों को छोड़ भी दिया जाय तो कोई भी स्त्री आपसे सहमत नहीं दिखती| हलाकि ये उनकी नासमझी हो सकती है| आपकी कडवाहट को मैं अन्यथा नहीं लेता क्योंकि आपकी राय भी जरूर कटु अनुभवों का परिणाम है 'निश्चय ही आपको बार बार मर्दों ने या तो छला है या फिर कोई भी मर्द आपके अनुसार आज तक नहीं चला है'| यानी आपका ब्लॉग नितांत व्यक्तिगत अनुभवों पर आधारित है और आपने उन कडवे अनुभवों के बारे में अपने किरदार को बिलकुल छिपा कर रखा है| आखिर आपकी वो कौन सी मांग थी जो बार-बार मर्दों ने ठुकरा दी पाठकों को इसका भी तो पता होना चाहिए| आखिर वह कौन सी वजह थी कि आप 'अकेली जिन्दगी की दास्ताँ बन गईं?' कृपया मर्दों से नफरत को पालने वाले एपिसोड में अपना रोल भी स्पष्ट कीजिये| आपने स्लट-वाक् का सर्वे तो कर लिया लेकिन एक चीज़ भूल गयीं| यदि जिम्मेदारी मर्दों पर थोपनी ही थी तो कमसे कम औरतों की राय मर्दों के बारे में भी ठीक से लेनी चाहिए थी| एक सर्वे का खुलासा मैं यहीं कर देता हूँ| ९५% लड़कियों का मानना है कि उन्हें पिता उनकी माँ से बेहतर समझते हैं| और ९२% आधुनिक लड़कियों की राय है कि उन्हें अपनी सहेलियों से ज्यादा अपने ब्यॉय फ्रेंड पर यकीन है| ९७% महिलाओं का मानना है कि उनके पति उनके लिए सबसे अच्छे दोस्त और सहायक है| ९०% महिलाओं को अपने पुत्रो पर यकीन है कि वे बुढापे में उनकी सेवा करेंगे और ५% का मानना है कि परिवेश जिस तरह से बदल रहा है हो सकता है लड़का किसी और प्रभाव में आकर उन्हें वृद्ध आश्रम भेज दे| सिर्फ १० प्रतिशत महिलाओं की राय थी कि उनकी पुत्रियाँ उनकी देखभाल करेंगी (इन महिलाओं के कोई बेटा नहीं है)| अपनी जिन्दगी की कडवाहट को सार्वभौम नियम के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश न करें सत्य सिर्फ उतना नहीं जो आपने महसूस किया सत्य को तलाश करने के लिए अपने दर्द से उबरना जरूरी है| पहले आप उस दर्द पर विजय पाइए जो मर्दों से आपको मिले हैं फिर आपके लेखन में सिर्फ सनसनीखेज शब्द नहीं कुछ तथ्य भी अपने आप जुड़ने लगेंगे| शुभम-मंगलम!

के द्वारा: chaatak chaatak

अनीता जी मुझे लगता है आपने मेरी पिछली टिपण्णी को ठीक से नहीं पढ़ा जो मैंने आपके ब्लॉग बदचलन औरतों का स्ल्ट वाक पर लिखा था कृपया आप मेरी दोनों टिप्पणियों को मिलकर पढ़े तो शायद आप समझ पाएं की मैं वास्तव में क्या कहना चाहता हूँ ? एक बार महात्मा बुद्ध के प्रिय शिष्य आनंद ने उनसे कहा था कि भगवन जब बौद्ध धर्म अपने चरम पर है तो क्यों न इसमें महिलाओं को भी शामिल कर लिया जाए तो बुद्ध ने कहा था कि हे आनंद कहते तो तुम सही हो लेकिन जहाँ भी महिलाएं शामिल हो जाती है वहां चारित्रिक पतन ही होता है.ये अलग बात है कि बाद में बौद्ध सम्प्रदाय में महिलाएं भी शामिल हो गयी है. इसका नतीजा यही है कि आज भारत में बौद्ध अल्पसंख्यक हो गए हैं........ क्या आप ऐसी लड़कियों के बारे में अनजान हैं जो अच्छे नम्बरों के लिए शिक्षक के साथ,प्रमोशन के लिए बॉस के साथ यौन सम्बन्ध बनाती हैं? अगर राजनीति में हैं तो पार्टी में उच्च स्थान के लिए .......................... उनके बारे में आप क्या कहना चाहेंगी? अगर आप ये कहती हैं कि सभी लड़कियां एक जैसी नहीं होती, तो क्या सभी पुरुष एक जैसे होते हैं? अगर ऐसा होता तो शायद मैं अपनी बहनों को संकट का सामना करने के लिए लड़ने भिड़ने में सक्षम कभी ना बनाता. क्योकि मैं जानता हूँ कि जीवन का कोई भरोसा नहीं है अभी है, अभी थोड़ी देर बाद नहीं होगा. तो मैं यही चाहता हूँ कि अगर कभी मुझे कुछ हो जाए तो मेरे माँ बाप को लड़के की कमी ना महसूस होने पाए. मैं तो स्वयं यही चाहता हूँ कि इस समाज की हर लड़की हर संकट का सामना करने को तैयार रहे लेकिन बदचलन बनके कभी नहीं क्योंकि ये न तो पुरुष के लिए ठीक है ना ही महिलाओं के लिए और ना ही आने वाली पीढ़ी के लिए.

के द्वारा: ajaykumar2623 ajaykumar2623

अनीता जी, ये एक आश्चर्य का विषय है की ज्यादातर सभी ने (चाहे वो महिला ब्लोगर हो या पुरुष ) आपके विचारों का विरोध ही किया है और सभी ने आपको मामले तह तक जाने का आग्रह किया है..... आपने मुझे भी ये नेक सलाह दी और मैं उस पर अमल कर रहा हूँ......(मैं मामले की तह में घुसने की कोशिश कर रहा हूँ कुछ अटक गया तो फिर यहाँ आ गया आपसे मार्गदर्शन के लिए) आपने मुझे बौद्धिक भी कहा और समझदार भी (आपकी ये पंक्तियाँ में अपनी श्रीमतीजी को अवश्य पढ़ाऊंगा ) और फिर भी आपने अपने नजरिये को एकतरफा आयाम दिया हुआ है....... अरे जब हमें समझदार माना ही था तो हमारी टिप्पड़ियों को पढ़ते समय पूर्वाग्रह का चश्मा उतारकर पढ़िए...... आपको पता लगेगा की पुरुष बुरे नहीं होते ...... (कम से कम में तो नहीं.... आपने भी माना है) और महिलाओं का उस तरह से उत्पीडन नहीं हो रहा है जैसे आप अपने लेखों में व्यक्त करती हैं http://munish.jagranjunction.com/2011/08/01/%e0%a4%b8%e0%a4%a8-2050-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%a4-%e0%a4%94%e0%a4%b0-2050-%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%81-%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a7%e0%a4%be%e0%a4%a8/

के द्वारा: munish munish

अनीता जी नारी शक्ति स्वरूपा है,जननी है,पुरुष के अस्तित्व का कारण है ,मैं ऐसे पुरुषो की सख्त निंदा करता हूँ जो नारी को अपने पैरों की जूती बना के रखते हैं.लेकिन मैं इस प्रकार के प्रदर्शनों के भी सख्त खिलाफ हूँ क्योंकि स्त्री या पुरुष किसी को भी अय्याशी करने की छूट नहीं मिलनी चाहिए .वरना समाज का संतुलन बिगड़ जाएगा. परिवार की अच्छी देखभाल औरत से अच्छा कोई नहीं कर सकता चाहे वो माँ के रूप में हो,पत्नी के रूप में हो या फिर पत्नी या बहिन के रूप में. आज अगर माँ बाप दोनों काम करते है और बच्चा घर में अकेला है,या होस्टल में पड़ा है बचपन से ही तो वो बड़ा हो के अपने माँ बाप की क्या ख़ाक इज्ज़त करेगा. हो सकता है अभी आपकी उम्र कम हो लेकिन जरा सोचकर देखिये जब आप बूढी हो जायेंगी और आपका बच्चा आपसे बर्तन धुलवायेगा झाड़ू लगवाएगा और आपके साथ नौकरों जैसा बर्ताव करेगा.तब आप क्या करेंगी.कौन साथ देगा आपका.आपका पति ही ना. जिस साथ आपने इस स्ल्ट वाक के चक्कर में जवानी में कभी नहीं दिया. उस वक़्त आपको एहसास होगा कि आपने क्या खो दिया है.अपने स्वार्थ के चक्कर में. इसलिए इस सबसे कुछ हासिल नहीं होगा क्योंकि बचपन जवानी बुढ़ापा और मौत सबके लिए सच है. जीवन के अंतिम दौर में आपके बच्चे को आपके किसी दर्द का एहसास नहीं होगा क्योंकि जवानी में आपने कभी उसके दर्द को नहीं समझा. जब उसे अपनी माँ की ज़रुरत थी तो उसे आया या हास्टल का वार्डन मिला. बुखार से तपते एक बच्चे के सर पर पानी की पट्टियाँ जब माँ अपने हाथ से करती है तो बच्चे को कितना सुकून मिलता है ये बात शायद आपको कभी नहीं समझ में आएगी वैसे जो मैंने लिखा है इसका नज़ारा आपने कही ना कहीं तो देखा ही होगा और अगर नहीं देख पायी हैं तो आने वाले १०-१५ सालों में देख जाएगा. फिर करते रहिएगा स्ल्ट वाक. अजय कुमार इलाहाबाद 8090919542

के द्वारा: ajaykumar2623 ajaykumar2623

आ० अनीता जी भारतीय समाज में स्त्री स्वतंत्र नहीं हो सकती ...दरअसल स्त्री की स्वतंत्रता को व्यापक अर्थों में देखना होगा ...जब तक परिवार जैसी संस्था का अस्तित्व रहेगा ..तब तक पहिले पिता-भाई फिर बच्चो पर आश्रित स्त्री स्वतंत्रता का अर्थ कैसे समझेगी ....हां , उसे पड़ लिखकर अपने पैरो पर खड़ा होना ही पड़ेगा तभी उसमे आत्मसम्मान जागृत होगा और अपने अधिकारों के प्रति सजग हो सकेगी ... किन्तु साबुन के विज्ञापन से लेकर शेविंग क्रीम के विज्ञापन तक स्त्री देह का शोषण किया जाता है ,टीवी और फिल्मों में तो हद दर्जे तक नारी वस्त्र हरण किया जा रहा है पर देश के नारी संगठन चुप रहते है ....... आ० अनीता जी आपने विस्तृत विश्लेषण किया है ...सही मायनों में नारी मुक्ति अथवा स्वतंत्र ,आत्मसम्मान से जीने वाली नारी को पुरुष शासित समाज में स्वयं ही पूरी शक्ति से खड़ा होना पड़ेगा क्योंकि सदा से इस देश में नारी पूज्य है ....अभी तक सिर्फ शास्त्रों में .... एक प्रभावी आलेख के लिए बधाई .....आपके द्वारा उठाये गए विषय पर व्यापक विचार विमर्श की ज़रूरत है ...

के द्वारा:

क्या मिला उसे इसका फल? हॉ, प्रताड़ना, पीड़ा, दर्द और हमेशा के लिए बंदिनी का जीवन…….जिसमें उसकी मनमर्जी का कोई अर्थ नहीं, उसकी सलाहों का कोई अर्थ नहीं, उसके अस्तित्व का कोई मतलब नहीं, वह तो सिर्फ भोग्या है लेकिन शायद यही स्त्री की महानता है कि उसे क्षमा करना आता है. आतातायी व हिंसक मर्द को कितनी आसानी से माफ कर उसके हित के लिए चिंता करने वाला स्त्री का स्वभाव गुणगान करने योग्य है परंतु यही वृत्ति उसकी दासता के लिए राह भी खोलती है. अनीता जी आपकी ओजस्वी लेखनी से बहा वैचारिक प्रवाह हमेसा ही बहुत प्रभावशाली रहा है | पर अपने बाउंसर फेकने के बाद आप सरपट दौड़ जाती है सामने वाले ने छक्का मारा या आउट हो गया आपको देखना ही नहीं , कमेन्ट का जबाब न देना आपकी रचना धर्मिता के अनुरूप नहीं है | हमारे धार्मिक व सामाजिक क्रियाकलापों में सदा नारी को सम्मान दिया गया है | अब जो कमिया है ,उन्हें नारी को शिक्षित कर , जागृत कर दूर किया जा सकता है | न की पुरुषो के खिलाफ भड़का कर |

के द्वारा:

आदरणीय अनिताजी, मैं ईश्वर से प्रार्थना करूंगा की वो आपकी प्रार्थना जल्द से जल्द पूरी करे..... वैसे आपके स्लाट वाक के समर्थन से मेरे अन्दर भी सभी बुराइयों का विरोध करने का नया तरीका सूझा है....... जैसे रिश्वत का विरोध करना है तो रिश्वत लीजिये..... भ्रष्टाचार का विरोध करना है तो भ्रष्टाचार कीजिये...... दहेज़ का विरोध करना है तो दहेज़ लीजिये...... सती प्रथा का विरोध करना है तो स्वयं सती हो जाइए...... ( जैसे की स्लाट वाक में विरोध प्रदर्शन होता है....) आगे आप स्वयं ही समझ गयीं होंगी.......... हाँ एक और बात आपने अपने पिछले ब्लॉग में मेरी टिप्पड़ी का जवाब देते हुए मेरे विचार जानना चाहा था तो मैंने कुछ विचार उसी टिप्पड़ी के निचे लिख दिए हैं आशा है आप सहमत होंगी.....

के द्वारा:

पिता : घर का अस्तित्व "माँ" घर का मंगल होती है तो पिता घर का "अस्तित्व" होता है, परन्तु इस अस्तित्व को क्या कभी हमनें सच में पूरी तरह समझा है ? पिता का अत्यधिक महत्व होने के बावजूद उनके बारे में अधिक बोला / लिखा नहीं जाता, क्यों ? कोई भी अध्यापक माँ के बारे में अधिक समय बोलता रहता है, संत-महात्माओं ने माँ का महत्व अधिक बखान किया है, देवी-देवताओं में भी "माँ" का गुणगान भरा पडा़ है, हमेशा अच्छी बातों को माँ की उपमा दी जाती है, पिता के बारे में कुछ खास नहीं बोला जाता । कुछ लेखकों ने बाप का चित्रण किया भी है तो गुस्सैल, व्यसनी, मार-पीट करने वाला इत्यादि । समाज में एक-दो प्रतिशत बाप वैसे होंगे भी, लेकिन अच्छे पिताओं के बारे में क्यों अधिक नहीं लिखा जाता, क्यों हमेशा पुरुष को भावनाशून्य या पत्थरदिल समझा जाता है ? माँ के पास आँसू हैं तो पिता के पास संयम । माँ तो रो-धो कर तनावमुक्त हो जाती है, लेकिन सांत्वना हमेशा पिता ही देता है, और यह नहीं भूलना चाहिये कि रोने वाले से अधिक तनाव सांत्वना / समझाईश देने वाले को होता है । दमकती ज्योति की तारीफ़ हर कोई करता है, लेकिन माथे पर तेल रखे देर तक गरम रहने वाले दीपक को कोई श्रेय नहीं दिया जाता । रोज का खाना बनाने वाली माँ हमें याद रहती है, लेकिन जीवन भर के खाने की व्यवस्था करने वाला बाप हम भूल जाते हैं । माँ रोती है, बाप नहीं रो सकता, खुद का पिता मर जाये फ़िर भी नहीं रो सकता, क्योंकि छोटे भाईयों को संभालना है, माँ की मृत्यु हो जाये भी वह नहीं रोता क्योंकि बहनों को सहारा देना होता है, पत्नी हमेशा के लिये साथ छोड जाये फ़िर भी नहीं रो सकता, क्योंकि बच्चों को सांत्वना देनी होती है । जीजाबाई ने शिवाजी निर्माण किया ऐसा कहा जाता है, लेकिन उसी समय शहाजी राजा की विकट स्थितियाँ नहीं भूलना चाहिये, देवकी-यशोदा की तारीफ़ करना चाहिये, लेकिन बाढ में सिर पर टोकरा उठाये वासुदेव को नहीं भूलना चाहिये... राम भले ही कौशल्या का पुत्र हो लेकिन उनके वियोग में तड़प कर जान देने वाले दशरथ ही थे । पिता की एडी़ घिसी हुई चप्पल देखकर उनका प्रेम समझ मे आता है, उनकी छेदों वाली बनियान देखकर हमें महसूस होता है कि हमारे हिस्से के भाग्य के छेद उन्होंने ले लिये हैं... लड़की को गाऊन ला देंगे, बेटे को ट्रैक सूट ला देंगे, लेकिन खुद पुरानी पैंट पहनते रहेंगे । बेटा कटिंग पर पचास रुपये खर्च कर डालता है और बेटी ब्यूटी पार्लर में, लेकिन दाढी़ की क्रीम खत्म होने पर एकाध बार नहाने के साबुन से ही दाढी बनाने वाला पिता बहुतों ने देखा होगा... बाप बीमार नहीं पडता, बीमार हो भी जाये तो तुरन्त अस्पताल नहीं जाते, डॉक्टर ने एकाध महीने का आराम बता दिया तो उसके माथे की सिलवटें गहरी हो जाती हैं, क्योंकि लड़की की शादी करनी है, बेटे की शिक्षा अभी अधूरी है... आय ना होने के बावजूद बेटे-बेटी को मेडिकल / इंजीनियरिंग में प्रवेश करवाता है.. कैसे भी "ऎड्जस्ट" करके बेटे को हर महीने पैसे भिजवाता है.. (वही बेटा पैसा आने पर दोस्तों को पार्टी देता है) । पिता घर का अस्तित्व होता है, क्योंकि जिस घर में पिता होता है उस घर पर कोई बुरी नजर नहीं डालता, वह भले ही कुछ ना करता हो या ना करने के काबिल हो, लेकिन "कर्तापुरुष" के पद पर आसीन तो होता ही है और घर की मर्यादा का खयाल रखता है.. किसी भी परीक्षा के परिणाम आने पर माँ हमें प्रिय लगती है, क्योंकि वह तारीफ़ करती है, पुचकारती है, हमारा गुणगान करती है, लेकिन चुपचाप जाकर मिठाई का पैकेट लाने वाला पिता अक्सर बैकग्राऊँड में चला जाता है... पहली-पहली बार माँ बनने पर स्त्री की खूब मिजाजपुर्सी होती है, खातिरदारी की जाती है (स्वाभाविक भी है..आखिर उसने कष्ट उठाये हैं), लेकिन अस्पताल के बरामदे में बेचैनी से घूमने वाला, ब्लड ग्रुप की मैचिंग के लिये अस्वस्थ, दवाईयों के लिये भागदौड करने वाले बेचारे बाप को सभी नजरअंदाज कर देते हैं... ठोकर लगे या हल्का सा जलने पर "ओ..माँ" शब्द ही बाहर निकलता है, लेकिन बिलकुल पास से एक ट्रक गुजर जाये तो "बाप..रे" ही मुँह से निकलता है । जाहिर है कि छोटी मुसीबतों के लिये माँ और बडे़ संकटों के लिये बाप याद आता है...। शादी-ब्याह आदि मंगल प्रसंगों पर सभी जाते हैं लेकिन मय्यत में बाप को ही जाना पड़ता है.. जवान बेटा रात को देर से घर आता है तो बाप ही दरवाजा खोलता है, बेटे की नौकरी के लिये ऐरे-गैरों के आगे गिड़गिडा़ता, घिघियाता, बेटी के विवाह के लिये पत्रिका लिये दर-दर घूमता हुआ, घर की बात बाहर ना आने पाये इसके लिये मानसिक तनाव सहता हुआ.. बाप.. सच में कितना महान होता है ना ! (यह एक मराठी रचना का अनुवाद है) Suresh chiplunkar blog se sabhar.

के द्वारा:

के द्वारा: Anita Paul Anita Paul

अनिताजी, स्त्री और पुरुष के रिश्तों में दाता और ग्राही, स्वामी और सेवक की थ्योरी नहीं लगाई जा सकती ...... दोनों एक दुसरे के पूरक हैं और समकक्ष हैं यही प्राकर्तिक सत्य है, और दाता और ग्राही की थ्योरी इन दोनों पर अप्रकर्तिक है. वास्तव में देखा जाए तो स्त्री और पुरुष को प्रकर्ति ने भी पूरी तरह समान नहीं बनाया और उनमें भेद किया. जैसे स्त्रीयां प्राकर्तिक रूप से कोमल होती हैं और पुरुष को मजबूत, स्त्री को सुन्दर बनाया तो पुरुष को कुरूप, स्त्री को जननी बनाया, जिसे जाया भी कहते हैं यानि स्वयं प्रकृति जैसे प्रथ्वी.....लेकिन पुरुष को उस अधिकार से वंचित रखा लेकिन उसकी भी भूमिका निश्चित की जैसे बिना बीज के प्रथ्वी स्वयं पौधे पैदा नहीं कर सकती इसी तरह स्त्री भी स्वयं अकेले प्रकृति निर्माण का कार्य नहीं कर सकती और पुरुष को इस कार्य में सहयोग देना पड़ता है.... क्योंकि स्त्री जननी है इसलिए उससे बेहतर संस्कार भला कौन दे सकता है इसलिए प्रथ्वी के समान ही लालन पालन का अधिकार स्त्री को मिला, इसीलिए उसे गृहलक्ष्मी भी कहा गया, स्त्री को स्वभाव से चंचल प्रकृति का भी माना गया है और स्त्री को लक्ष्मी मानने का एक कारण यह भी है..... ! स्त्री पर गृह कार्य का भार इसीलिए डाला गया क्योंकि वही इस कार्य को बेहतर रूप में कर सकती थी और अपने अच्छे गुणों (जो की प्राकृतिक रूप से स्त्री के अन्दर हैं) से एक स्वस्थ समाज की स्थापना कर सकती थी....... जो की पुरुषों के लिए मुश्किल था वो केवल एक परिवार को संरक्षण दे सकता है जैसे आकाश धरती का संरक्षण करता है......पुरुष स्वाभाव से कठोर होते हैं इसीलिए उन्हें शायद ये कार्य सौंपा होगा........ आज के दौर में स्त्रीयों ने इस व्यवस्था को नारियों पर अत्याचार बताया शोषण बताया.... और अपने घर को छोड़ कर बाहर काम करने और पुरुषों के साथ कंधे से कन्धा मिलकर चलने को अधिक महत्त्व दिया ........ परिणाम आपके सामने है. अब न तो वो संस्कारित समाज बचा जिसकी निर्माता स्वयं स्त्री थीं और न ही स्त्रीयों के लिए वो मान सम्मान ....... जो स्त्री पुरुषों से आगे रहकर गृह पालन में सामाजिक निर्माण में, और राष्ट्रनिर्माण का कार्य अकेले करती थी वो पुरुषों से कन्धा मिलाकर चलने के चक्कर में, कहीं पीछे छोड़ दिया........ स्त्रीयों ने अपने को क्यों कर हेय समझा इसके कुछ कारण और भी हैं..... जिसका एक कारण है नारी के स्वभावतः गुण जो प्राकर्तिक रूप से ही उस के अन्दर विद्यमान है.... जैसे, इर्ष्या, क्रोध, लोभ (आभूषण के लिए) इन्ही गुणों के कारण स्त्रीयों को घर के अन्दर रहने के लिए कहा गया है और पुरुष को इन्हीं गुणों के कारण स्त्री को नियंत्रण में रखने की बात कही गयी थी...... हमारी संस्कृति ने इन्ही सब स्त्री पुरुषों के गुणों को देखते हुए समाज की रचना की...... परन्तु पाश्चात्य संस्कृति की चकाचौंध ने जहां पुरुष को प्रभावित किया वहीँ स्त्रीयों को बहुत ज्यादा अपने प्रभाव में ले लिया ............... और उन्हें अपने संस्कार अपने पर बंधन लगने लगे........! उन्होंने घर से बाहर कदम निकाला और......... बच्चों को संस्कारित करने का कार्य बंद....... एक स्वस्थ समाज का निर्माण बंद..... जिन आध्यात्मिक उचाईयों को भारत ने कभी छूया था आज उसकी कल्पना तक की जा सकती...... इसके लिए में सारा दोषारोपण स्त्रीयों पर नहीं कर रहा हूँ........ क्योंकि व्यवस्थाओं के चलते और विदेशी आक्रमणों के चलते स्त्रीयों पर कुछ अत्याचार भी हुए परन्तु...... जिस तरह के अत्याचारों की चर्चा आप कर रही हैं वो भारतीय संस्कृति में कहीं नहीं थे........ वो सब बाहर से आये....... और अब जिन प्रताडनाओं.... बलात्कारों...... शोषण की आप बात कर रहीं हैं वो सब पश्चिम के अन्धानुकरण के कारण है........ अब क्योंकि प्रकर्ति के नियमों से छेड़छाड़ की जा रही है तो भुगतना तो हमें ही पड़ेगा..... और समाज का पतन भी सहना पड़ेगा

के द्वारा: munish munish

के द्वारा: Sanjay Sanjay

अनीता जी, इस बार का आपका तेवर कुछ ज़्यादा ही कड़ा है । लेकिन आप अपने मक़सद में कामयाब रही हैं, विद्वान ब्लागर्स की लम्बी-लम्बी प्रतिक्रियाएं यही साबित कर रही हैं । शान्त तालाब में ढेला उछाले बिना बात बनती भी तो नहीं ! अन्यथा आप भी समझ सकती हैं कि महिलाओं को तो ईश्वर ने प्रकृति में ही कोमलता और शालीनता बख्शी है, फ़िर कनाट प्लेस में खुद को तमाशा बनाने पर उतारू चन्द उच्छृंखलता की पुजारिणियां क्या ये दावा कर पाएंगी कि वही स्त्री समाज का सही और वास्तविक प्रतिनिधित्व करती हैं ? जो देश नारी स्वतन्त्रता की झंडाबरदारी करते आए हैं, अन्तत: उन्हें भी अपनी बालाओं को नसीहत देने पर यदि बाध्य होना पड़ा है, तो मैं तो इसे भारतीय संस्कारों की विजय के रूप में देख रहा हूं । एक न एक दिन तो यह होना ही था । शाश्वत रूप में नारी को प्रकृति के समकक्ष का दर्ज़ा प्राप्त है । प्रकृति और पुरुष के संयोग से यदि जीव की उत्पत्ति हुई है, तो उसके कुछ कालजयी सूत्र रहे हैं, जिनसे छेड़छाड़ का परिणाम आज का तथाकथित आधुनिक समाज भुगत-भुगत कर अब बेज़ार हो चुका है । खुद नारी को ही त्राहिमाम सन्देश भेज कर 'शान्त देवी शान्त' की गुहार लगा रहा है । अपने आप को प्राकृतिक स्वरूप और परिधान के दायरे में रख कर क्या भारत की प्रथम नागरिक श्रीमती प्रतिभा पाटिल किसी 'बोल्ड एन्ड ब्यूटीफ़ुल' से कम हैं ? या वे आकर्षण का केंद्र बनने के अयोग्य हैं ? इसी प्रकार कैसा लगेगा यदि फ़िल्मों की बजाय शाहरुख और सलमान अपना सुगठित शरीर वस्त्रविहीन कर सड़कों पर घूमने लगें ? क्या आप उन्हें सामान्य मानसिकता वाले पुरुष की श्रेणी में रख पाएंगी ? दलीलें देना एक बात है, परन्तु अन्तरात्मा की आवाज़ को सुन पाना निहायत ही विलोमार्थी प्रैक्टिस है मैडम जी ! जब हम पुरुषों का अंगप्रदर्शन स्वीकार नहीं कर सकते, तो फ़िर उसी अंदाज़ में स्वयं को प्रस्तुत करना नारी की किस स्वतंत्रता और स्वावलम्बन की परिधि में माना जाना चाहिये, ज़रा आप ही बताएं । धन्यवाद ।

के द्वारा:

अनीता जी आपसे ज्यादा कुछ न कहके मैं बस इतना ही कहूँगा की कुदरत के साथ खिलवाड़ किसी के लिए भी ठीक नहीं है चाहे वो स्त्री हो या पुरुष.एड्स जैसी बीमारिया इसका साक्षात उदाहरण है। क्या आपको मालूम है महिलाओं को जब भी स्वतंत्र छोड़ा गया है उनका सिर्फ शोषण ही हुआ है. वैदिक काल में सती अनुसुइया,गार्गी आदि तमाम विदुषी स्त्रियाँ हुई थी जो बड़े बड़े ऋषियों के साथ राज दरबार में बैठ कर शास्त्रार्थ किया करती थीं.लेकिन कालांतर में कही न कही उनका यौन शोषण ही हुआ है . जिसका खामियाजा उन्होंने भुगता है.कई तरह के एमएमएस स्कैंडल्स बात के गवाह हैं. शायद इसी सब को ध्यान में रख कर मध्य काल में जब इस्लाम का उदय हुआ तो महिलाओं को परदे के पीछे रखा गया ताकि उनपर किसी की बुरी नज़र ना पड़ने पाए. ये अलग बात है की इस्लाम के कुछ सिद्धांतो का लोगों ने अपने स्वार्थों के लिए भी इस्तेमाल किया है. कहा जाता है की इतिहास स्वयं को दोहराता है शायद उसी की वजह से पश्चिमी सभ्यता का अनुकरण करते हुए महिलाओं को पुनः सशक्त किया जा रहा और जिसके कुछ गंभीर परिणाम अक्सर सामने आते ही रहते हैं जिनमें यौन शोषण प्रमुख है यदि ऐसा न होता तो सरकार को The Protection of Women Against Sexual Harassment at Work Place Bill, 2010 पास करने की कोई ज़रुरत न पड़ती. रही बात बाल विवाह की तो पहले लड़कियां और लड़के जवान होते ही अपने जीवनसाथी के साथ हो जाते थे जिससे लड़के और लडकियों दोनों के चरित्रहीन होने की संभावना कम से कम होती थी. सरकार ने बाल विवाह पर रोक तो लगा दिया है लेकिन वो रोक कितनी कारगर साबित हो रही क्या ये किसी ने सोचा है. लड़कियां कालेज पढने जाती है वहां के शिक्षकों के साथ यौन सम्बन्ध सिर्फ और सिर्फ अच्छे नम्बरों के लिए, कार्य स्थल पर प्रमोशन पाने के लिए स्थापित कर लेती हैं . क्या ये बाल विवाह पर रोक का परिणाम नहीं कहा जा सकता इससे तो कही अच्छा होता की उस लड़की की शादी करा दी जाती कम से कम उसके पति पति को एक कुंवारी लड़की तो मिलती.खैर,यही हाल लडको का भी है उनका भी एक से पेट थोड़े न भरता है एक एक लड़के के पास कई कई गर्ल फ्रेंड होती है. बाल विवाह के होने से कम से कम ये सब तो न होता.अभी कुछ दिन पहले राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष ने कहा था आज के शिक्षित युवाओं को पत्नी के रूप में कुंवारी लड़की की उम्मीद नहीं रखनी चाहिए. अगर ऐसा ही है तो क्यों न हर युवा एक वेश्या से विवाह कर ले कम से कम उसके दिल में ये उलझन तो नहीं रहेगी की कही उसकी वो पत्नी जिसे वो इतना प्यार करता है चरित्रहीन ना हो और इस तरह से आज का यूवा एक समाज सुधार का भी काम कर पायेगा. रही बात इतिहास दोहराने की तो जब मनुष्य आदि मानव का जीवन बिता रहा था तब वो वस्त्र विहीन था,आज के समाज में लड़कियां कैपरी जींस बिकनी पहन रही हैं हो सकता है की निकट भविष्य में ये फिर से आदि मानव की तरह नंगे ही रहने लगे. ये बात भी स्वीकारने योग्य है की कई घरों में महिलाओं का उत्पीडन किया जाता है, उन्हें हेय दृष्टि से देखा जाता है ये सारी सुविधाएं जैसे की घरेलू हिंसा अधिनियम आदि ऐसी महिलायों को दिया जाना चाहिये ना की अपने शौक पूरे करने वाली महिलाओं को क्योंकि आज के शहरी समाज में कई ऐसी महिलाएं है जो पति के आफिस जाते ही अपने किसी आशिक को घर में बुला के मौज मस्ती करती हैं चाहे उनके बच्चे कितने ही बड़े क्यों ना हों.इस श्रेणी की महिलाओं में कुछ डाक्टरों की पत्नियाँ,कुछ नेता प्रकार की महिलाएं आदि शामिल हैं. क्या वो कभी ये बात सोच पाती है की उनके बारे में सब कुछ जानता हुआ पति उन्हें कभी कुछ क्यों नहीं कहता क्योंकि वो जानता है किसी से अपनी पत्नी की बात कहने पर उसका मजाक ही बनेगा और कुछ हासिल नहीं होगा. फिर वक़्त के साथ वो पति शराब में डूबने लग जाता है तो वही पत्नियाँ उनपे शराबी होने का आरोप लगाने से भी नहीं चूकती. मेरे हिसाब से जो काम जिसके लिए बना है वो वही काम करे तो ज्यादा अच्छा है वरना असंतुलन तो पैदा होगा ही. पति अगर घर से बाहर का काम देखता है, घर के लिए पैसे जुटाता है तो पत्नी को भी घर चलाने में अपना पूरा योगदान देना चाहिए. लेकिन आज की लड़कियों को कैरियर की ज्यादा चिंता होती है. यहाँ तक कि शादी के बाद भी वो काम करना चाहती हैं ताकि कुछ पैसे कमा के घर की अर्थव्यवस्था सुदृढ़ करे. लेकिन वो ये भूल जाती हैं कि इसमें वो अपने बच्चों का, अपने पति का,अपने ससुरालवालों का कितना बड़ा नुक्सान करती हैं जो पति दिन भर आफिस में काम करता है शाम को घर आने पर अगर उसे पत्नी की एक मीठी मुस्कान भी न मिले तो कैसा लगेगा. एक छोटे से बच्चे को जिसके पापा -मम्मी दोनों ड्यूटी पर जाते हैं वो दिन भर घर में क्या करेगा.सिर्फ टी वी पर अश्लील कार्यक्रम ही तो देखेगा जिसमे हिंसा, सेक्स आदि प्रमुखता से दिखाए जाते हैं. बड़ा होकर वो बच्चा अपने माँ बाप की क्या ख़ाक इज्ज़त करेगा. बच्चो के दिशा निर्देशन का काम माँ से बेहतर कोई नहीं कर सकता शायद इसीलिए औरत को शक्ति,विद्या की देवी के रूप में स्वीकार गया है. लेकिन आज की नारी को ये बात कौन समझाए. सबसे मज़े की बात ये है अगर कोई पुरुष महिलाओं के कपडे पहन के बाज़ार में घुमे तो लोग उसका उपहास करते हैं तो वही लोग पुरुषो के कपडे पहन कर घूमने वाली महिलाओं को घूर घूर कर नयन सुख क्यों लेते हैं.उपहास की पात्र तो वो भी है न…………

के द्वारा: ajaykumar2623 ajaykumar2623

मुनीष जी, आप से ऐसी उम्मीद नहीं थी कि आप बात की तह तक गए बिना ही अपनी भड़ास इस कदर निकालेंगे कि वास्तविक मुद्दा कहीं और खो जाएगा. आप जैसा चिंतनशील व्यक्तित्व एकांगी होगा इसकी मुझे बिलकुल भी आशा नहीं थी. खैर, मुझे ही बात समझानी होगी. मैं यहॉ विजेन्द्र जी को दिए गए जवाब को पेस्ट कर रही हूं आप नजर डाल लीजिएगा: बात उतनी सरल नहीं जितना आप कह रहे हैं. यहॉ बात केवल कपड़े पहनने के निर्देश देने तक सीमित नहीं है बल्कि इसके पीछे आदेश देने और उसके पालन की अपेक्षा का है. बात स्वामी और सेवक, स्वामी और दास के अप्राकृतिक संबंधों की है जिसमें पुरुष दाता की भूमिका में आ जाता है और स्त्री को ग्राही की संज्ञा देना चाहता है जबकि प्राकृतिक रूप से ऐसा नहीं होता. जब भी आप दाता की संज्ञा स्वयं को देते हैं तो खुद ही अपने आप को परमोच्च पद पर आसीन कर लेते हैं और स्त्री को निम्नतम स्थिति में ला खड़ा करते हैं. मैं इसी बात का विरोध करना चाहती हूं क्यूंकि इसी दाता और ग्राही की स्थिति से भ्रम की दशा उपस्थित होती है. आपसे जवाब की आशा में अपनी टिप्पणी समाप्त कर रही हूं.

के द्वारा: Anita Paul Anita Paul

प्रिय राजकमल जी, आपने अपनी चिरपरिचित शैली व्यंग्यात्मक शैली का प्रयोग कर आनंदित किया जिसके लिए आपका आभार. किंतु इस कनीज को भी कुछ कहने का मौका दें तो आपकी महती कृपा होगी. आपने अपने लेखन से स्त्री जाति के प्रति अपनी दुर्भावना को सहसा प्रकट कर ही दी और ये साबित करने में कोई कोर कसर नहीं बाकी रखी कि आप स्त्रीको दासी के अलावा अन्य किसी रूप में नहीं देखना चाहते. खैर, पुरुष जाति के नुमाइंदों से अधिक आशा भी कैसे की जा सकती है? वे निरंतर व्यंग्य, भर्त्सना, संत्रास, निंदा, आलोचना, प्रताड़ना और बल प्रयोग द्वारा नारी की नियति तय करने में ही अपनी वीरता समझते हैं. उनके कथित पुरुषत्व को इससे बल मिलता है. नारी पर दैनिन्दिन अत्याचार करके उनकी नपुंसक धमनियों में रक्त संचार तीव्र होता है. आपका क्या दोष? आप भी उसी परंपरा के एक सीधे-सादे अनुयायी है. उम्मीद है आपको बात बुरी नहीं लगी होगी. हे व्यंग्योस्ताद, सार्थक संवाद को आगे बढ़ाने की कोशिश करेंगे तो शायद मेरी बातें भी आपको समझ में आ सकें और साथ ही अन्य आपके समविचार वालों को भी.

के द्वारा: Anita Paul Anita Paul

प्रिय विजेंद्र जी, बात उतनी सरल नहीं जितना आप कह रहे हैं. यहॉ बात केवल कपड़े पहनने के निर्देश देने तक सीमित नहीं है बल्कि इसके पीछे आदेश देने और उसके पालन की अपेक्षा का है. बात स्वामी और सेवक, स्वामी और दास के अप्राकृतिक संबंधों की है जिसमें पुरुष दाता की भूमिका में आ जाता है और स्त्री को ग्राही की संज्ञा देना चाहता है जबकि प्राकृतिक रूप से ऐसा नहीं होता. जब भी आप दाता की संज्ञा स्वयं को देते हैं तो खुद ही अपने आप को परमोच्च पद पर आसीन कर लेते हैं और स्त्री को निम्नतम स्थिति में ला खड़ा करते हैं. मैं इसी बात का विरोध करना चाहती हूं क्यूंकि इसी दाता और ग्राही की स्थिति से भ्रम की दशा उपस्थित होती है. टिप्पणी के लिए बहुत धन्यवाद.

के द्वारा: Anita Paul Anita Paul

बहुत दिन बाद आया...सोचता था कुछ सार्थक परिवर्तन होगा किन्तु जैसे का तैसा ही पाया.....आजकल उन्मुक्त यौनाचार को सदाचार बनाने की मुहीम सी चल पड़ी है|अधिकारों में कर्तव्यों का तो कोई पुट ही नहीं है....बस जिधर देखिये उधर पाशविक अधिकारों की ही बात है|ऑस्ट्रेलिया में किसी वेश्या ने अंतर्वस्त्रों पर देवी महालक्ष्मी का चित्र अंकित कराया ओर रैम्प पर अपने मन का सारा विकार उड़ेल दिया|आश्चर्य नहीं होगा यदि उसे शांति का नोबल पुरस्कार मिल जाय|मैंने तो हमेशा स्त्री पुरुष को एक ही गाड़ी का दो पहिया ही माना है|खैर मेरे मानने से क्या होता है?सब कुछ तो व्यक्तिगत ही है|सादर वन्देमातरम|मैं थोडा कड़ा लिखता हूँ, फिर भी क्षमाप्रार्थी नहीं हूँ||

के द्वारा: atharvavedamanoj atharvavedamanoj

अनिताजी, मैं मुद्दे को भटका नहीं रहा हूँ बल्कि आपकी कुछ हद तक भटकी हुई सोच को मुद्दा दिखा रहा हूँ...... आप ने एकतरफा दृष्टिकोण रखते हुए इस लेख को लिखा है जैसे बच्चों को गाय के ऊपर निबंध लिखना हो वैसे ही आपने सोचा चलो पुरुषों के विरोध में लिखना है और लिख दिया. और देखिये स्वयं ही शीर्षक भी दया तो "बदचलन औरतों का स्ल्ट वाक" . क्या आपको लगता है की बदचलन लिखना ठीक है, ये एक नारी की नारी के प्रति सोच हो सकती पुरुषों की तो नहीं.....! व्यक्तिगत तौर पर आपकी हो सकती है मेरी नहीं........ ! तो इसका अर्थ ये न हुआ की स्त्रीयां स्वयं अन्य स्त्रीयों को सामाजिक मानसिक तौर पर प्रताड़ित कर रही हैं.......! किसको कैसे कपडे पहनने हैं ये कोई मुद्दा नहीं है इससे किसी की स्वतंत्रता प्रभावित नहीं होती.....! आपको नारियों के शोषण के ही मुद्दे उठाने हैं तो उन महिलाओं का उठाओ जिन महिला मजदूरों को मजदूरी नहीं मिलती या पुरुषों के अपेक्षा कम मिलती है, जो कम उम्र में विधवा होकर सामाजिक बंदिशों को सहने के लिए मजबूर हैं और जो स्वयं महिलाओं ने ही लगाईं हैं...... शादी के लिए लड़कियों की नुमाइश होती है उसके विरोध में बोलिए, ग्रामीण महिलाओं के विषय में कुछ हो जाए.......... ये आपने कहाँ देख लिया की सारे पुरुष महिलाओं पर अत्याचार पर आमादा हैं और उनका बलात्कार कर रहे हैं.........! यकीन मानिए अनीता जी दुनिया बहुत अच्छी है और पुरुष भी उसी दुनिया के हिस्से हैं वो ऐसे नहीं जैसा आप लिख रहीं हैं सोच रही हैं........ ! और रही नारी स्वतंत्रता की बात तो हमारे देश में नारी कभी गुलाम नहीं रही और यदि कुछ भेदभाव रहे भी हैं तो उन्हें समय समय पर सुधरने की कोशिश भी हुई और स्वयं नारियों ने आगे बढ़कर इस मुद्दे को उठाया पर, कपड़ों के ऊपर तो शायद ये पहला मामला बनता है अब यदि आज स्त्रीयों को कपडे पहनने से अपनी आजादी बाधित होती नज़र आती है तो निश्चित ही दोष उन स्त्रियों का है जो आधुनिकता के नाम पर कपडे उतारने की बात करती हैं और पुरुषों पर दोष लगाती हैं........ !

के द्वारा:

अनीता जी चरणवंदना ! उन मनहूस पुरुषों को बीच बाज़ार एक लाइन में खड़े करके गोली मार देनी चाहिए जोकि महिलाओं खासकर लड़कियों को ढके छुपे रहने की गलत सलत सलाह देते है ...आप बधाई की ही नहीं बल्कि मेरी नजर में तो किसी एवार्ड की भी हकदार है जिन्होंने की हम शोहदो के हक में अपनी आवाज बुलंद की है ..... आपको ढेरों प्रणाम -लेकिन मज़बूरी है की आपने अपने पांवों को मैला होने के डर से अपने चेहरे की ही तरह छुपा रखा है , वरना अपनी यह हसरत जरूर पूरी करता ..... हम दिलजले जोकि हर समय अपनी आँखे सेकने की जुगाड में लगे रहते है को उस समय भारी नमोशी का सामना करना पड़ता है जबकि लड़किया सर्दिया तो सर्दिया गर्मियों में भी अपना मुँह ढाप कर चलती है ..... शुक्र है की आपने अपनी आवाज बुलंद की -आपके आवाहन पर अगर हमारे पटिआला शहर की कुछेक लड़कियों ने भी अमल कर लिया तो हमारी तो लाइफ बन जायेगी ..... आपको यह ग़लतफ़हमी है की पुरुष नारी को विजित करना चाहते है .... कम से कम इस मंच पर मैं तो आपकी दासता कबूलता हूँ , क्योंकि आप इस मंच की साम्राज्ञी है .... यह अलग बात है की आप क्योंकि इस मंच पर नियमित अंतराल पर अपने बेहद बीजी होने के कारण नहीं आ पाती इसलिए आपको इस बात का ना तो इल्म है और ना ही भान .... हे देवी आप केवल इस मंच पर तो कभी कभार आ भी जाती है लेकिन मेरे ब्लॉग पर तो आप कभी भी वरदान (कमेन्ट ) देने कभी भी नहीं पधारी .... मैंने यह सब बाते आपको दुखी जान कर हंसाने के लिए नहीं लिखी है .... लेकिन फिर भी अगर आपको हंसी आ ही जाए तो मन्द -२ मुस्काइएगा , नाकि ठहाके लगाते हुए अट्टहास कीजियेगा , वरना लोग कहीं यह ना समझ ले की कहीं आप ? .... चोरों का राजा राजकमल शर्मा (बेशर्म )

के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

अनीता जी नमस्कार .........बहुत शानदार लेख लिखा आपने .....किन्तु इससे मै भी आहात हुए बिना नहीं रह सका, इसमें कोई दो राय वाली बात नहीं कि जब भी कभी युवाओं में सौंदर्य की बात होती है तो वो नारी सौंदर्य पर आकर ठहर जाती है नारी प्रकृति कि शानदार कलाकृति है लेकिन कोई भी भारतीय नारी जब साड़ी या सलवार कमीज में जितनी सुन्दर लगती है वो ..अन्य कपडे पहन कर नहीं लगती .....हो सकता है ये मेरी निजी राय हो.......क्यूंकि सबका नजरिया अलग होता है.अब बात करे बलात्कार कि तो अनीता जी कहना चाहूँगा कि इस देश में बलात्कार के 60 % से 70 % तक के मामले झूठे होते है.....वास्तविक बलात्कार के मामले वो होते हैं जिनमे लड़कियों कि उम्र 15 साल या कम होती है ....हालांकि हमारे संविधान में लिखा है कि 18 साल तक कि लड़कियों द्वारा किया गया सहमति पूर्वक सम्भोग भी अपराध कि श्रेणी में आता है और १८ साल से ज्यादा उम्र कि लड़कियों में 90 % तक लडकियां सहमती या अन्य लालच में आकर सम्भोग करती है और जब घरवालों का दबाव होता है तो वो घटना अपराध कही जाती है ......... लड़कियों को छोटे कपडे पहनने वाली बात पर कहना चाहूँगा कि .........नारी तभी सुन्दर है जब पूरे ढके कपडे पहने...........ये बात में किसी पुरुष प्रधान समाज का सदस्य होने के नाते नहीं कह रहा बल्कि अपनी इस बात के पीछे एक तथ्य भी रखना चाहूँगा...किसी भी शहर के किसी बाज़ार में कोई पागल महिला नग्न अवस्था में हों तो कोई भी पुरुष उसकी तरफ देखेगा भी नहीं चाहे वो पागल नारी कितनी भी सुन्दर हो ........माना कि आज इस देश में बलात्कार कि घटनाएं बाद रही है तो इन घटनाओं के पीछे सिर्फ नापाक इरादों वाले पुरुषों का ही नहीं वरन उन नारियों का भी उतना ही योगदान है जो अंग प्रदर्शन किये बिना रह नहीं सकती, नारी भी उतनी ही स्वतंत्र है जितने पुरुष लेकिन "अती सर्वत्र वर्जते" .मेरी बात से किसी को ठेस पहुंचे तो में माफ़ी चाहता हूँ

के द्वारा: vijendrasingh vijendrasingh

मुनिष जी..आप अपने इस व्यंग्यात्मक लहज़े में मुद्दे को भटका रहें हैं. यहां बात किसी पाषाण काल से संबंधित नहीं हैं. यहां आज के जमाने की बात हो रही हैं. ऐसा नहीं हैं कि महिलाओं को उनका दायरा नहीं पता या फिर समाज में उन्हें रहने का ढ़ंग नहीं आता. महिलाओं की सामाजिक स्थिति बुरी नहीं हैं. उसे बुरा बनाया गया हैं. और आप इस बात से इनकार नहीं कर सकते के इसके पीछे सबसे बड़ा योगदान पुरुषों का ही हैं. उन्हें कभी भी महिलाओं की स्वतंत्रता रास नहीं आती. अत: उसे दबाने के लिए वह हमेशा नए-नए हथकंड़े अपनाते रहे हैं. जिस प्रकार उनहें समाज में रहने का समान अधिकार है वैसे महिलओं को भी हैं. और महिलाएं प्राकृतिक रूप से स्वतंत्र हैं. उनकी इस स्वतंत्रता को सम्मानीय नज़र से देखा जाना चाहिए.

के द्वारा: Tamanna Tamanna

नारी तु नारायणी, और नारायण तो इश्वर हैं गलती की कोई संभावना नहीं......... अब जब मैंने अनीता जी का लेख पढ़ा तो अपने को बहुत हीन समझा और गड्ढे में गिरा हुआ महसूस किया...... बताइये समाज के सारे पुरुष बलात्कार कर रहे हैं और मैं इस सामाजिक कार्य मैं सहयोग नहीं कर सका....... और मुझे उस समय तो बहुत ज्यादा हीन भावना महसूस हुई जब मैंने अपने को मानसिक तौर पर बलात्कार करने के अयोग्य पाया. अनीता जी का विश्लेषण सही है क्योंकि वो स्त्री हैं नारायण की स्वरुप गलत तो हो ही नहीं सकती....... फिर मैंने लेख को दोबारा पढ़ा तो लगा जब समाज के सारे पुरुष बलात्कार में व्यस्त हैं तो मेरे लिए कोई बची भी है या नहीं......... फिर लेख पढ़ा तो पाया इस नराधम पुरुष ने इस नारी को सभ्य समाज के नाम पर विभिन्न कड़ियों जकड लिया किसी को माँ, बहन और भार्या बना दिया बताइये नारी तो वैसे भी सुन्दरता की खान है और बताइये उनको कपडे पहना दिए..... सौंदर्य तो दिखाने के लिए होता है तो ये उलटे सीधे कपड़ों से नारी के सौंदर्य को in दुष्ट पुरुषों ने अपनी भद्दी मूछ दिखाने के चक्कर में ढक दिया है......जानवर सभ्यता इस सबसे बहुत अच्छी है...... न माँ न बहन न बेटी न पत्नी सब स्वतंत्र और कपड़ों का झंझट ही नहीं.......... अनीता जी ठीक ही लिखती हैं.......इसलिए मैं इनकी बात का सम्मान करते हुए सभी पुरुषों से आवाहन करता हूँ की वो नारी को नारी समझना छोड़ दें और "पुरा पाषाण काल " के समय के हिसाब से उन्हें पूरी तरह स्वतंत्र रहने दें........ये सभी का नैसगिर्क अधिकार है......उसमें हस्तक्षेप न करैं

के द्वारा:

अनीता जी शायद आपने जवाब पढ़ा नहीं ठीक से मै कही से भी आपके लेख की तारीफ नहीं कर रहा ..हु .बल्कि मै यह कह रहा हु की आपके पूर्वाग्रह आपके विचारो पर इतने अधिक हावी है .. की आप केवल अपनी बात को ही सत्य मान रही है और यकीन करे आपकी इस बात से महिलाये ही सहमत नहीं होंगी ..क्योकि ये उनकी प्रकृति के अनुरूप नहीं है .न ही समाज में एक मानक है ...दुसरे पक्ष से आपने आँखे बंद कर ली है .. नारी शशक्तिकरण का मै बहुत समर्थन करता हु और मेरे अधिकांश मित्रो में लडकिया है और वे सभी आधुनिक विचारो वाली ..और समाज में अच्छे पदों पर है ..और इन विषयो पर उनसे चर्चाये भी होती है पर स्वतंत्रता के नाम पर जिस विचार को आप बढ़ावा दे रही है उनसे वे भी सहमत नहीं है .. आपको समाज की कितनी जानकारी है ?.आपको पता होना चाहिए की किसी भी घर में जब बेटी बड़ी होती है तो उसके कपडे पिता या भाई तय नहीं करता बल्कि माँ और स्वयं वह लड़की ही अपने शरीर के अनुरूप कपडे पहनती है ..उसे कोई कहता नहीं है .. ये मानक है ..आधुनिक शहरों में कुछ ऐसे प्रमाण मिलेंगे जहा आधुनिकता के नंगेपन में महिलाये अपने को बाजारू बना देने में संकोच नहीं करती .. और ऐसा पुरुष भी करते है ..वहा समाज आगे आता है और वह सीमा बताता है क्योकि समाज केवल बाजार नहीं है ....और हर लड़की आधुनिकता के नाम पर मुन्नी और शीला नहीं बनना चाहती है .... बलात्कार के शिकार तो मासूम लड़के भी होते है .. तो क्या कहेंगी आप ... बलात्कारी केवल मानसिक रूप से विकलांग व्यक्ति होता है और हर पुरुष बलात्कारी नहीं है ... दुश्चरित्र पुरुष भी होते है महिलाये भी होती है .. और इसके लिए समाज दोनों पर प्रतिबन्ध लगाता है ... किसी को पुजता नहीं है ... आपको जानकारी शायद हो नारी शशक्तिकरण के नाम पर जो कानून बने है उनमे से 30 -40 प्रतिशत केस फर्जी पाए गए है ... समाज को केवल शोषण और शोषित के चश्मे से न देखे एकमात्र सत्य यही होता तो समाज कबका नष्ट हो जाता .. शायद मेरी भाषा कठोर है मै माफ़ी चाहता हु क्योकि मै यही जानता हु की जो गलत विचार सामने आये उसका पूरी शक्ति से विरोध करो ...आपसे निवेदन है अन्यथा न ले पर एक पक्षीय विचार को आप शंशोधित करे ..

के द्वारा:

अनीता जी ज्यादा कहने से अर्थ का अनर्थ होने की सम्भावना रहती है. वो ही शायद मेरे साथ हुआ. मेरे कहने में सिर्फ ३ बातें थी. १- जरूरत से ज्यादा स्वतंत्रता समाज के संघटनात्मक स्वरुप को बिगाड़ सकती है इसीलिए वर्जनाएं रक्खी गयी है जिनका आदर आवश्यक है. २-नर और नारी दोनों ही सामान हैं अतः नियम दोनों पर लागु होते हैं. ३- यदि किसी का ये मानना है की समाज पुरुषवादी है तो माँ, बहन, बेटी और पत्नी को समाज में प्रदत्त उच्चय स्थान क्यों प्राप्त है? अनीता जी नारी को कोई नेमत नहीं बक्सी है बल्कि स्वत सम्मान प्राप्त है ......माँ को माँ कह कर कोई भीख नहीं दी जाती बल्कि अपने सम्पूर्ण अस्तित्व का समर्पण किया जाता है.

के द्वारा:

अनीता जी तथा शुक्ल जी आप दोनों को मेरा नमस्कार स्वीकार हो, आपकी लेखनी से निकली समाज की आवाज को पढने का सुअवसर प्राप्त हुआ, धन्यवाद . एक बहुत ही गंभीर प्रश्न है क्या कभी आपने गावों की तस्वीर पर गौर किया है? आपको जानकर आश्चर्य होगा की वहा होने वाले १०० में से ९० बलात्कार के मामले फर्जी होते हैं जो अपने दुश्मनी या रंजिस निकलने के लिए करवाए जाते हैं . अब अगर ऐसे मामलों में आरोपी को नपुंसक बना दिया जायेगा तो आप सोंच सकते हैं उसका अंजाम क्या होगा. हालाँकि जिस निरपराध व्यक्ति को बलात्कार जैसे गंभीर अपराध का आरोपी बना दिया जाता है उसकी मनःस्थिति तो वह व्यक्ति ही समझ सकता है जिस पर आरोप लगाया गया है कभी आपने सोंचा है की उस पर क्या बीतती है पल भर में वह गुनाहगार बन जाता है उसे उस गुनाह की सजा मिलती है जो उसने किया ही नहीं लम्बी क़ानूनी लड़ाई के बाद अगर वह निर्दोस साबित भी होता है तो उसके पास क्या बचता है बदनामी, ? भारत का कानून कहता ही की भले ही १०० गुनाहगार छुट जाएँ पर एक वेगुनाह न फसने पाए पर होता क्या है ? जरा इस पर भी विचार करियेगा आपको उन वेगुनाहों की कसम जो इस न किये हुए जुर्म की सजा भोग रहे हैं जो काफी समय से जेल में हैं और उनके विरोधी जिन्होंने उन्हें फसाया है खुसी खुसी कानून का मखौल उड़ा रहे हैं . आज गावों में हर खुराफाती औरत किसी भी झगडे में सीधे बलात्कार के मामले में फ़साने के धमकी देती हैं . आपको सच देखना हैं तो गावों की तस्वीर देखिये . हाँ जो सच में गुनाहगार हैं उनके खिलाफ कम ही कार्यवाही हो पाती है जैसे की अनीता जी ने उस अध्यापक के बारे में बताया पर नाम नहीं लिए अछे परिवार की लड़कियां अपने खिलाफ हुए जुर्म की शिकायत करने का सहस बदनामी होने के डर से कम ही कर पाती है. सोंचने लायक बात यह भी है की यदि कोई माहिला किसी पर बलात्कार का झूंठा आरोप लगाती हैं ऐसे स्थिति में उसे क्या सजा दी जाएगी ? क्या यह सजा बलात्कार के दोसी पाए गए पुरुस के बराबर होगी ?

के द्वारा:

अनीता जी , सुन्दर, तर्कपूर्ण लेख लेकिन कुछ कम जानकारी के साथ / मैं आपको कुछ बातो का ध्यान दिलाना चाहता हूँ - * भारतीय संस्कृति में नारी को पूज्यनीय माना गया है * निःसंदेह समाज में महिलाओं पर अत्याचार बहुत हो रहा है और इसके लिए पुरुषों की मानसिकता अधिक जिम्मेदार है लेकिन आप को याद रखना चाहिए कि समाज केवल पुरुषो से नहीं बनता है / *शायद कुछ पुरुषों में अहम् ज्यादा हो लेकिन सदैव नहीं, हर जगह पर महिलाओं को सम्मान प्राप्त है फिर वो चाहे घर हो ,दफ्तर हो या सार्वजनिक स्थल हो / *कम कपडे पहनने के आपके अधिकार को हम चुनौती नहीं दे सकते हैं लेकिन क्या देह प्रदर्शन यौन उत्तेजना का कारण नहीं है ? * क्या आशक्ति अपराध का कारण नहीं बन सकता ? *दहेज़ उत्पीडन जैसे घोर अपराधों में महिलाओं की भागीदारी बराबर (या ज्यादा) नहीं होती है ? * क्या अपने आप को सम्पूर्ण रचना मानकर आप तानाशाही प्रवत्ति नहीं दिखा रही है ? *क्या दौलत ,सत्ता ,ताकत का मद स्त्रिओं पर नहीं चढ़ता? *क्या स्त्री पीड़ित पुरुषो की संख्या कम है ? सत्य तो यह है कि पुरुष और स्त्री एक दुसरे कि पूरक है / कृपया उनमें रिपु भाव ना जगाएं ,अपवाद तो हर जगह होते है / अपराधों को कम करने की जिम्मेदारी सबकी है केवल पुरूषों को सूली पर चढ़ा देने से अपराध कम नहीं हो सकते है , इसके लिए नैतिक शिक्षा की आवश्यकता सबको है / मै ज्यादा पढ़ा लिखा नहीं हूँ, यदि मेरी कोई बात आपको अच्छी न लगे तो क्षमा कीजिये , स्वस्थ बहस आवश्यक है /

के द्वारा:

तमन्ना जी मै आपसे बिलकुल सहमंत हु की नारी को किसी के दिशानिर्देश की जरूरत नहीं. वो विचार शील है. पर आप जो बात कर रही है वो बचकानी है की हम तो वो ही करेंगे जो तुम मना करोगे. मत भूलिए की आज नारी इस कदर जो आज़ादी मिली है उसमे पुरुष समाज सुधारको का बहुत बड़ा हाथ है. दूसरी बात व्यवस्था सभ्य समाज की है और वो भी इसलिए की समाज और सभ्यता दोनों ही बनी रहें.......आप इसे तोडती है तो शौक से तोड़ें.पर जब भी समाज और सभ्यताएं टूटी है तो नविन निर्माण शक्ति के आधार पर ही हुआ है. इतिहास इस बात का गवाह है. और तब स्त्री सिर्फ संपत्ति मानी गयी है. और ये नियम प्रकृति का है जिसमे सुधार करके सभ्य समाज बना. शेरो के pride और बंदरो के सामाजिक नियम इसी प्रकार हैं. नारी माँ का स्वरुप है. बहन और बेटी के रूप में मान्य का दर्जा लेते है भार्या के रूप में पूरे घर को जोड़ कर रखती है और पुरुष की सबसे बड़ी संपत्ति जो की उसके बच्चे है, की जिम्मेदारी लेती है........ये सब स्थान पुरुष ने ही उसे दिए है. अतः समस्त पुरुषों को इसमे न खीचें. और अंत में मै मारिया जैसी नारियो पर भी आपके विचार जानने को उत्सुक हूँ.

के द्वारा: anoop pandey anoop pandey

अनीता जी ..अगर आपके लेख ब्रह्मास्त्र होते तो आप इस सृष्टि से पुरुषो को ही समाप्त कर देती .. आपके हर लेख में आपके पूर्वाग्रह स्पष्ट हो ही जाते है ... आपको एक बुरा अनुभव जीवन में हुआ ... फिर आपने दुनिया भर के पुरुषो को ये सर्टिफिकेट दे दिया की उन्हें बस नारी को भोगने की ही चीज समझा है ... मै आपको सभ्यता या संस्कृति के बारे में नहीं कहूँगा क्योकि ये शब्द आप और आपके जैसे कुछ आधुनिक विचारको के लिए अर्थहीन है ., . अनूप और राज ने तो इसपे विस्तार से लिख दिया है पर मै एक बात ही कहना चाहूँगा .. इंसान को उसके जंगलीपन से निकालकर एक सभ्य समाज बनाने में वस्त्रो की बहुत बड़ी भूमिका रही है .वस्त्रो से इंसान ने पहले नारी को ढका उसकी वजह ये है की नारी और मानव को पुरुष और प्रकृति का स्वरुप माना गया है और मुझे नहीं लगता की प्रकृति को अगर उसके वस्त्र (नदी पेड़ पौधे, पर्वत झील , जंगल ..इत्यादि ) से हीन कर दे तो उसकी कोई सुन्दरता या उपयोगिता रहेगी तब शायद प्रकृति आपको भी बेकार लगे... वस्त्र केवल तन ढकने का माध्यम नहीं है इसके पीछे एक दर्शन है ... नारी मुक्ति का मतलब उसे कपड़ो से मुक्त करके सड़क पर वाक कराना नहीं है .. .. स्त्री और पुरुष में उतना ही फर्क है जितना जमीन और आसमान में आप उनकी विशिष्टता को किनारे करके वैसे ही कर रही है जैसे कोई सेब के पेड़ से जबरदस्ती आम पाने की चाह रखे .... किसी ने कह दिया की कपडे ठीक से पहन लो तो इसका प्रतिवाद करने के लिए ये कतई जरुरी नहीं है की बचे खुचे कपडे भी उतार कर सड़क पर निकल जाओ ....इस नंगेपन को नारी मुक्ति का आधार बनाने का प्रचार बाजार करता है और हम उसी बाजार को प्रमोट कर रहे है . लेख को सनसनीखेज बनाकर रखने में आप माहिर है ..पर आपको ये जानकारी होनी चाहिए की फ़्रेच बाथ हमारे देश में नही होती यहाँ पुरुषो तक के लिए नियम है की एकदम निर्वस्त्र होकर स्नान करना वर्जित है .. उन्हें भी महिलाओं के स्थलों में खुले शारीर जाना मना है . कुछ मानक नियम है .. आप इसे जंजीर कह सकती है .. फिर भी अगर कोई सड़क पर नंगे निकलना चाहे तो उसे रोक नहीं है ....पर इसे नारी मुक्ति से न जोड़े .शेष तो राज जी ने लिख ही दिया है .

के द्वारा:

अमेरिका के विचारों से प्रभावित यह लेख वहीँ के बोधिक अनुसरण का नतीजा कहने के लिए में माफ़ी मांगना चाहूँगा | परन्तु सेक्स को आगे रखकर चलने वाला यह समाज आज तक एक स्त्री को भी प्रेसिडेंट नहीं बना पाया | हमारे ही मुल्क में ही नहीं आस पास के दक्षिण एशिया के श्रीलंका , बंगला देश , पाकिस्तान सभी में राजनीती के शिखर पर महिलाऐं शाषण करती आयीं हैं और भारत में राजनितिक तौर पर नहीं भ्रष्टाचार में भी नीरा रादिया सरीखे लोग कदम ताल कर रहें है ये स्लट वाक जैसे शब्द खुद अश्लीलता को जन्म देते हैं | देह का सरे आम प्रदर्शन प्राकृतिक रूप से सेक्स की भावनाओं को विपरीत लिंग में पैदा करेगा व वह उसी उद्दीपन से उसी व्यव्हार को करेगा भी | एक बार दसवीं क्लास की घटना मुझे याद है जब गणित के टीचर बाथरूम में छिपकर सिगरेट पी रहे थे और बच्चों को भी यह तथ्य मालूम था इस पर हिंदी के टीचर ने कहा की जब सबको पता तो सबके सामने क्यों नहीं पीते इस पर गणित वाले शिक्षक ने जबाब दिया कि पता होने को पति पत्नी के सम्बन्ध सबको पता होते हैं पर सबके सामने लोकाचरण के कारन नहीं करते | यही बात हमरे समाज के ताने बाने में है पर पाश्चात्य दिमाग पर इतना हाबी है कि केवल महिला देह प्रदर्शन को उसकी शक्ति उसकी स्वाधीनता का पैमाना मान लेता है | सेक्स प्रदर्शन कभी अपनी स्वतंत्रता का मानक बनाने वाली स्त्री सोच को यह भी ध्यान रखना होगा कि यह समाज को अपराध कि तरफ तो नहीं ले जा रहा | यह युवा स्त्री कि खुद को स्वतंत्र होने कि ख्वाइश को कभी कभार अपनी इसी ज़माने की माडर्न माई से पूछ लेना उचित रहेगा सरेआम घुमने फिरने के लिए कितने अंगों की कितना खोलना ढकना होगा और इसका पूरा सरोकार पहनने वाले की अपनी पसंद (हनक) होगी या देश काल समाज का भी ख्याल होगा | मैं इस ब्लॉग पर हर महिला को सम्मान व बराबरी की नज़र से देखते हुए विचार रख रहा हूँ व किसी तल्खी के लिए माफ़ी चाहता हूँ | अनीता जी इसे अन्यथा न लें \ विचार भिन्नता व उस पर बहस आवश्यक है पर निजी तौर पर इसे न लिया यह भी जरुरी है | आपकी पोत पर अधिक से अधिक कमेन्ट आयें ऐसी कामना हैं

के द्वारा: RaJ RaJ

अनीता जी , आपने बहुत सशक्त भाषा शैली द्वारा - " बदचलन औरतों का स्लट वाक (SlutWalk) ! " लेख लिखा है. " पुरुष जन्म से ही अहमी होतें हैं और इसी अहंकार के कारन मुख्यत: स्त्रियों को ही अपना 'शिकार' बनातें हैं ; क्योंकि वे शायद शारीरिक देह-द्रष्टि से खूबसूरत व नाज़ुक होतीं हैं . आखिर महिलाएं क्यों ना पहनें अपनी पसंद के कपड़े ? इस पर मैं ये कहना चाहूंगी - महिलाये / लड़कियां क्या छोटे या तन -दिखाने वाले ही कपड़े पहनना पसंद करेंगी ? और वो भी जनता के सामने ? क्यों ? क्या दिखाना चाहतीं हैं? अथवा पुरुष को निमंत्रण देतीं हैं ? या उनके अहम् को ठेस पहुँचाना चाहतीं हैं? या उनको एक अपराध करने पर मजबूर करतीं हैं ? जबकि उनको पता है की शारीरिक रूप से वो कोमल हैं ; फिर क्यों ? पढने -लिखने का ये मतलब तो नहीं -कपड़े पहनना ही कम कर दो . फिर कुछ हो तो -अपना जीवन बर्बाद कर ..... मेरी समझ से जब तक स्त्री दिमागी तौर से यानि बौद्हिक रूप से स्वयं को समाज में स्थापित नहीं करेगी ; अपने पतन वाले अथवा सौंदर्य - दिखावा -देह उजागर वाले क्रिया कलाप खास तौर पे पब्लिक प्लेसेस में -बंद नहीं करेगी तब-तक पुरुष स्त्रियों पर हावी होता रहेगा ; उसको गुलाम बनाये रखेगा . मीनाक्षी श्रीवास्तव

के द्वारा: meenakshi meenakshi

अगर केवल पूरे कपड़े पहनने भर से पुरुषों की इस प्रवृत्ति पर विराम लगाया जा सकता तो मुझे लगता हैं कि उन मासूम लड़कियों के साथ, जिन्होंने अभी तक दुनियां को समझना भी शुरू नहीं किया, कभी बलात्कार जैसा घिनौना कृत्य ना घटित होता. ऐसी भी कई निर्दोष लड़कियां हैं जो बचपन में ही अपने किसी परिचित की हवस का शिकार हो जाती हैं. ऐसे में केवल कम कपड़ों को ही पुरुषों की घृणित मानसिकता का कारण नहीं माना जा सकता. महिलाओं के प्रति पुरुषों का मौलिक नजरीया ही गिरा हुआ हैं, वह उसे सम्मान की दृष्टि से देखना पसंद नहीं करते. पुरुषों को तो शायद इस बात का अंदाजा भी नहीं हैं की बलात्कार जैसा अमानवीय कृत्य किसी महिला को किस हद तक तोड़ सकता हैं. अपने झुठे अहं के सामने वे किसी भी महिला के आत्म-सम्मान को कुछ नहीं समझतें, 

के द्वारा: Tamanna Tamanna

समाज की उपेक्षा और संत्रास समाज की अपनी कमी है. यदि समाज बलात्कारी को कड़ी सजा भर से संतुष्ट है और पीडिता की उपेक्षा करता है उसका अपमान करता है तो ऐसे समाजों को महत्व नहीं मिलाना चाहिए. यदि हमारी न्याय व्यवस्था अपांग है तो हमे उसे सुधारना है. पुलिस को सुधारना है न की हमारी समस्या का हल क्रूरतम दंड है. अपराधियों का मनोबल इस लिए बढ़ता है क्योंकि उनके बच निकलने की संभावना ज्यादा है. अपराधी वर्तमान के दंड प्रावधानों से भी डरते और अपराध नहीं होते पर हमारी न्याय व्यवस्था और अपराध की जाँच करने वाली पुलिस अक्षम है. जीवन अनमोल है क्यों की 'जिंदगी ना मिलेगी दोबारा' इसलिए अपराधी को सुधरने का मौका दें. सायद पुलिसे और न्याय व्यवस्था सही होती और अपराधी को अपने पकडे जाने का दर होता तो वह अपराधी ऐसा कम नहीं करते. 

के द्वारा:

के द्वारा: Anita Paul Anita Paul

श्रद्धेया अनीता जी, नीचे मैंने जो कटाक्षपूर्ण टिप्पणियां लिखी हैं, वे प्रथम दृष्टया आपको थोड़ी भद्दी लगी होंगी । मेरे ब्लाग पर कोई लिखता, तो मुझे भी ऐसा ही लगता । लेकिन विश्वास कीजिये, ये नज़दीक आ रहे होली के त्यौहार के कारण शुद्ध परिहास की भावनाओं से लिखा गया है, न कि आपके मन को ठेस पहुंचाकर अपने अहं की तुष्टि के लिये । यदि मेरी टिप्पणियों से आपको सचमुच दुख हुआ हो, तो मैं इस स्थान पर तहे दिल से खेद प्रकट करना चाहूंगा । जहां तक आपके छोटे लेकिन प्रभावोत्पादक ब्लाग की बात है, वह हमेशा की तरह आपकी साफ़सुथरी लेखन शैली का एक बेहतरीन प्रस्तुतिकरण है । इस आलेख में आपके विचार बिल्कुल निरपेक्ष हैं, अत: किसी के द्वारा भी दुराग्रहग्रस्त होकर प्रतिक्रिया व्यक्त करने का तो कोई सवाल ही पैदा नहीं होता । हम चूंकि पुराने ब्लागर साथी हैं, अत: उम्मीद है कि मुझे समझने की कोशिश करेंगी, और अन्यथा नहीं लेंगी । धन्यवाद ।

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अनीताजी, ये तो सच है की बजरंगी भी प्रेम के मोहपाश में फंसे हैं. परन्तु अपनी प्रेमिका से नहीं बल्कि अपने राष्ट्र से अपनी संस्कृति के प्यार के मोहपाश में फंसे हैं. गलत है की वो प्यार करने वाले ऐसे युवाओं का विरोध करते हैं जो प्यार को सड़क पर दिखाते हैं, जिन्होंने प्यार का बाज़ार बना रखा है उन्हें उनका बहिष्कार नहीं करना चाहिए. बल्कि हर नगर में एक सम्मलेन करके उन्हें वहां बुलाना चाहिए और आज के प्रेमी युवाओं को प्राथमिक प्रेम के तौर पर राष्ट्र वंदना सिखानी चाहिए, संस्कृति सिखलानी चाहिए. परन्तु हैं तो बजरंगी तोड़ फोड़ से ज्यादा कुछ आता नहीं वास्तव में उन्हें कृष्ण बनना पड़ेगा जिन्होंने प्रेम करना भी सिखाया और प्रदर्शन का तरीका भी, और प्राथमिकता भी कहाँ किस की प्राथमिकता है. पर बेचारे बजरंगी..... पहलवान बुद्धि है. राजनितिक थोड़े ही न हैं.

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प्रेमी जोड़े के खुले आम प्रेमालाप करने से , आलिंगनबद्ध होने से खौलने वाला खून बजरंगी हो या न हो पर राष्ट्रवादी भारतीय जरुर होगा........ जिसे आप इन उदाहरनो से प्रेम की संज्ञा दे रही हैं ......... अगर आपकी नजर में वही प्रेम है ........... तो ऐसे प्रेमी आपको उत्सुक मिलेंगे......... गर्ल्स कॉलेज के सामने ........ ये लड़कियों के पीछे इधर उधर फिरते हुए........ अगर इनका विरोध करना आपको अनुचित लगता है ........ तो हर लेख मे आपका मर्दों के विरुद्ध लिखना कहा तक उचित है......... वो मर्द जिनके साथ आपको बुरे अनुभव हैं वो भी इसी श्रेणी के प्रेमी रहे होंगे...... जिनहे प्रेम एकांत मे ........ पार्कों मे ....... होटलों के कमरों मे........ पुरानी इमारतों मे ... पसंद हो......... किसी को दोष देने से पूर्व अपनी नजर को हर और घूमाना अनिवार्य है........ .

के द्वारा: Piyush Pant, Haldwani Piyush Pant, Haldwani

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अनीता जी बीच में तो आना ही पड़ेगा क्योकि आपके पूर्वाग्रह कभी कभी आपके विचारो पर उतने ही हावी हो जाते है जैसे कोंग्रेस पार्टी पे हिन्दू आतंकवाद ..आपने जीवन में एक बुरा अनुभव किया है जिसकारण आपके विचार ऐसे बन गए है .. पर क्या आपको अपने परिवार में कभी ये महसूस नहीं हुआ की आपके पिता ने कई बार बच्चो और पत्नी और परिवार के लिए अपने सुख को किनारे कर दिया हो... परिवार में अगर नारी त्याग करती है तो पुरुष भी करता है और उतना ही करता है कई बार तो उससे भी बढ़कर ... हमने तो अक्सर ये महसूस किया है की हमारे पिता ने कई बार परिवार के सुख के लिए अपने सुख की परवाह नहीं की ... पत्नी और बच्चो की हर इच्छा को यथाशक्ति पूरा किया है..... और लगभग हर परिवार में ये ही मानक है .... आपकी ये बात एकदम सही है की विवाह के बाद स्त्री के जीवन में बहुत बड़े परिवर्तन आते है और वह उनसे सामंजस्य बिठा लेती है इसकी वजह आप उसके त्याग से बढ़कर उसकी प्रकृति में क्यों नहीं देखती .. पुरुष और प्रकृति में भेद है दोनों एक दुसरे के पूरक है उनके अलग अलग कार्य है शक्तिया है .. आप जो शोषक और भोग्य की परिभाषा दे रही है वह मानक नहीं है वह केवल कुछ ऐसे अपवाद है जो खतरनाक है और उनका विरोध हम सभी करते है .... आदरणीय शाही जी का एक परिपक्व वक्तव्य है जिससे हम सभी सहमत होंगे ....."".सांसारिक चक्र पूरा करने के लिये स्त्री-पुरुष दोनों की समान भूमिका होती है, किसी भी एक को लांछित नहीं किया जा सकता ।""

के द्वारा: NIKHIL PANDEY NIKHIL PANDEY

अनीता जी, आपने बीच में आने को ही मना कर दिया है, फ़िर भी आना तो पड़ेगा ही, वरना आप इल्ज़ाम लगा देंगी कि देखो, मैं कहती थी न, कि पुरुष अपना फ़र्ज़ नहीं निभा पाते । आपने सारा कुछ तो ठीक ही लिखा है । नारी को प्रकृति प्रदत्त कोमलता, ममता, सहनशीलता, परमार्थशीलता, सभी कुछ प्राप्त है । ईश्वर ने उसे इन गुणों से नवाज़ा ही इसीलिये है कि पुरुष की कठोरता और नारी की कोमलता के समन्वय के तहत प्रकृति-चक्र का संतुलन बरक़रार रहे, और सबकुछ व्यवस्थित चलता रहे । सामंजस्य स्थापित रहने के लिये दोनों गुण आवश्यक हैं । बेटी की विदाई के समय यदि पिता भी मां के कंधे से कंधा जोड़कर विलाप में मग्न हो जाय, तो बहुत सारे दूसरे कर्त्तव्य धरे के धरे रह जाएंगे । यह मामूली उदाहरण मात्र बात को समझने के लिये है । दिक्कत तब होती है, जब स्त्री अपने स्वाभाविक गुणों से इतर किसी दूसरे स्वरूप का साक्षात्कार कराती है, जैसा कि खुद आपने अपने इससे पूर्व के लेख में उल्लेखित किया था । नारी के उस प्रकार के स्वरूप से सामाजिक ताने-बाने को ही चुनौतियां मिलनी शुरू हो जाती हैं । इसी प्रकार पुरुष भी जब अपने कर्त्तव्यनिष्ठ स्वरूप से इतर जाने का प्रयास करता है, तो सामाजिक भर्त्सना का पात्र बन ही जाता है । फ़िर कहां दोनों पहियों में से मात्र एक को दोषारोपित करने की स्थिति आती है? यदि स्त्री पुरुष के प्रेम प्रपंच में पड़कर पथभ्रष्ट होती है, तो पुरुषों के भी झांसे में आकर स्वयं को बर्बाद कर लेने के ढेरों उदाहरण देखने को मिल जाते हैं । सांसारिक चक्र पूरा करने के लिये स्त्री-पुरुष दोनों की समान भूमिका होती है, किसी भी एक को लांछित नहीं किया जा सकता । और कुछ अपनी सुनाइये, आप खुद भी तो अपने आलेखों के साथ ही नमूदार होती हैं, और कुछ देर की चर्चा के बाद ग़ायब हो जाती हैं । कृपया बुरा न मानें, यूं ही दोस्ताना शिक़ायत कर रहा हूं । पहले आपकी उपस्थिति का आभास मिलता रहता था । अब मिलने मिलाने के सिलसिले आपने काफ़ी कम कर दिये हैं । कहीं इसके पीछे हमारे प्रति खुदग़र्ज़, बेदर्द, जालिम और बेग़ैरत होने का पूर्वाग्रह तो नहीं है? यदि ऐसा है, तो ग़ुस्सा थूक दीजिये, और एकबार फ़िर सबके बीच अपनी उपस्थिति को स्थायित्व प्रदान करने की कृपा कीजिये । प्यार बांटती हुई आप कुछ और सुन्दर दिखती हैं । साधुवाद ।

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के द्वारा: Anita Paul Anita Paul

अनीता जी दहेज़ उत्पीडन के 40 प्रतिशत से ज्यादा केस फर्जी है...हरिजन उत्पीडन के भी 50 % केस फर्जी है.... क़ानून बनाने से न तो महिलाए शाशाक्त हो जाएँगी न अपराध रुकेंगे.... कानून बनाने से पहले उनकी व्यावहारिकता और उचित कार्यान्वयन का ध्यान देना चाहिए उनकी गहन पड़ताल होनी चाहिए..... आपकी इस बात से मै सहमत हु की बिना कर्तव्य के अधिकार कई बार हमारे लिए खतरनाक हो जाते हैं. ..खैर ऐसी महिलाए कम है अभी गनीमत है.... लेकिन नारी मुक्ति की क्रांतिकारी बाढ़ जल्द ही ऐसे दिन दिखायेगी की बाकी भी अपनी स्वतंत्रता के लिए ऐसे तरीके अपनाएंगी और फिर बेचारे पुरुषो का तो भगवान् ही मालिक है....खैर ये व्यंग था... .. एक जरुरी विषय पर आपका ये सार्थक लेख है इसके लिए मै आपको बधाई देना चाहता हु

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अनीता जी, आपसे इस आभासी दुनिया में जानपहचान होने के बाद पहली बार आपके प्रति मेरे मन में असीम श्रद्धा उमड़ रही है । मैंने आपके अलग-अलग रूप देखे, परन्तु मन में हमेशा आपकी तस्वीर के प्रति एक नकारात्मक भाव होने के कारण कुछ पूर्वाग्रहग्रस्त नकारात्मक भाव ही उदित होते रहे हैं । अपने इस पूर्वाग्रह के लिये मैं आपसे तहेदिल से क्षमाप्रार्थी हूं । आपके इस आलेख से जो आपका नया रूप बाहर झांक रहा है, वो एक अलग प्रकार की न्यायप्रिय महिला का है, जो सामाजिक बुराई के मामले में स्त्री-पुरुष दोनों के बारे में समान और निरपेक्ष भाव रखती है । शायद आपके सभी लेखों में ऐसे ही भाव रहे हों, परन्तु कदाचित मेरे पूर्वाग्रहग्रस्त होने के कारण कभी आपके ऐसे भाव मुझे दिखे नहीं । आपने ठीक ही कहा है, दोहरे चरित्र वाली कुलटा और दुष्चरित्र औरतें परिवारों को बर्बाद कर के छोड़ती हैं, और अंत में खुद भी उनका जीवन नर्क़ ही बनता है, ऐसा नहीं है कि उस सीधे-सादे पति को कलंकित कर उस दूसरे लड़के के साथ फ़्लर्ट करने वाली वह लायक बहू उस लड़के के साथ शादी कर सुखी जीवन व्यतीत कर लेगी । क्योंकि फ़्लर्ट करते रहना भी एक चारित्रिक कमज़ोरी है, जो दूसरी शादी के बाद भी क़ायम रहेगी । आपके विचारों को जानने के बाद वह उक्ति याद आती है - 'पूजा चित्र की नहीं, चरित्र की होनी चाहिये' । साधुवाद ।

के द्वारा:

के द्वारा:

अनीता जी, आज तक के आपके सारे लेखों में इस लेख को मैं सर्वूत्तम कहूँगा| स्त्रियों की वास्तविक पीड़ा और उसका निदान इस लेख से बेहतर अभी तक मेरी नज़र में नहीं आया है| आपकी इस संतुलित और बेबाक राय का श्रोत मैं बड़ी आसानी से देख रहा हूँ| आपके विचार किसी आर्मचेयर फिलासफर के विचार नहीं बल्कि हकीकत की जमीन पर विपरीत गर्म हवाओं के बीच संघर्ष कर रही एक ऐसी स्त्री के विचार हैं जिसे पता है कि उसे कहाँ कहाँ आहत किया जाता है और इससे बचने के लिए किन उपायों की आवश्यकता होगी| "सुर्ख रू होता है इन्सां ठोकरें खाने के बाद, रंग लाती है हिना पत्थर पे पिस जाने के बाद" इस पोस्ट में हिना के जख्म नहीं उसका सुर्ख रंग साफ़ दिख रहा है| लेखन को इसी प्रकार जारी रख्ने| शुभकामनाएं (दर्द के अनुभवों पर बधाई नहीं दूंगा, बस कामना है कि कोई और दर्द आपके जीवन में ना आये) ५/५

के द्वारा: chaatak chaatak

प्रिय बहन तुम्हारी /आपकी बात /लेख से मे पूर्णतया सहमत हूँ (स्त्री-पुरुष की समानता के पक्षधरों की बात भी काफी हास्यास्पद लगती है. जब ईश्वर ने स्त्री-पुरुष का विभेद पहले ही पैदा कर रखा है तो आप कौन होते हैं उसे समान करने वाले. और समानता की सारी बातें एक झूठ और प्रपंच के सिवा और कुछ नहीं लगतीं. नैसर्गिक भेद को आप अप्राकृतिक तरीके से कैसे बदल पाएंगे? ) लेकिन सम्मान भी हम करते हैं कभी सोचना इस विषय में ,,संगठनों की बात तो छोड़ ही दो अधिकाँश संगठन केवल अपने स्वार्थ पूर्ति के लिए ही खड़े किये जाते हैं /सम्मान अगर दिल में न होता तो आज जिस स्थिति की तुमने /आपने चर्चा की है उसका प्रतिशत कितना है तुम स्वयं ही जानती होगी ,,.....जय भारत

के द्वारा:

अनीता जी, वन्देमातरम, मैंने एक बार पहले भी कहा था और आज भी कहता हूँ की यदि आत्म प्रकाशन से आपको कुछ संबल प्रदान हो तो निःसंदेह आत्म-प्रकाशन करें| मनोवैज्ञानिक रूप से तात्कालिक कोई राय नहीं बने जा सकती| यदि आपके साथ इस तरह का कुछ निकृष्ट घटा है तो निःसंदेह उसकी स्मृति जीवन पर्यंत रहेगी|आप कुछ मित्र बनायें...अपनी आप बीती अन्य महिला मित्रों के साथ शेयर करें..अपने आपको हमेशा व्यस्त रखे...शायद आपकी व्यथा कुछ कम हो...नियमित रूप से प्राणायाम और ध्यान तो एक वरदान ही होगा..पूर्व की स्मृतियों को भूलने का प्रयास करें| कभी कभी तो परिवार में भी इस तरह की घटनाएँ घटती हैं और उसमे पर्यावरण और प्रोक्सिमिटी जैसे बहुत से कारक जिम्मेदार होते हैं...आशा ही नहीं अपितु पूर्ण विश्वास है की आप फिर से जीवन को सहजता के साथ लेकर नित नए संघर्षों के लिए सर्वदा तैयार रहेंगी...जय भारत,जय भारती

के द्वारा: atharvavedamanoj atharvavedamanoj

प्रिय अनिताजी, नमस्कार बहुत खेद, दुःख , शर्म एवं क्रोध आता है ऐसे दुष्कर्मियों पर, लेकिन ऐसे लोग हर जगह होते हैं जरूरत है उन्हें पहचान कर सजा दिलाई जाये. मैं अब और कुछ नहीं कह सकता क्यूंकि आपकी मनःस्थिति क्या है वो सिर्फ सोच सकते हैं, समझना शायद संभव नहीं तो सिर्फ समझने का प्रयास कर सकते हैं| और ये दुनिया बहुत हसीन है, हर तरह के लोग आपको मिलेंगे यहाँ पर, राम भी यहीं है और रावण भी यही हैं. जरूरत है उन्हें पहचानने की ये अच्छा हुआ की भगवन की कृपा से आप बच गयी परन्तु आपने फिर कोई और कदम आगे क्यूँ नहीं उठाया? मेरी आपसे पूरी सहानुभूति है एवं आपके सुन्दर एवं उज्जवल भविष्य की सुभकामना देता हूँ. धन्यवाद जय श्री राम

के द्वारा: Abhishek Awasthi Abhishek Awasthi

बहन अनीता पाल जी आपकी बात को पड़कर बहुत ही दुःख हुआ | मेरा मन भी शायाद मनोज जी की बात कुछ हद तक मानता है की एक तमाचा खींच कर देना चाहिए था ऐसे लोगों के बेशर्म गाल पर सारी इशारेबाजी ही हवा हो जाती| परन्तु क्या बात यहाँ ख़तम हो जायगी | हालत ऐसे है की यहाँ तो हर कदम पर कुछ न कुछ होगा | आप किस किस को तमाचा मारेगे | समस्या इतनी छोटी नहीं | जब रात दिन FTV और अन्य चेनल नारी का सिर्फ विकृत रूप ही पेश करेगे , तो हमारे युवा क्या करे | संस्कार विहीन अंग्रेजी शिक्षा , चारो तरफ से मीडिया का गलत विचारो को महिमामंडित करता षड़यंत्र , लचर और अंग्रेजो के ज़माने के कानून और ऊपर से सभी हदे पार करता भ्रष्टाचार - कहा तक और कब तक बचोगे | |करे भी तो क्या करे | दूसरी अफ़सोस की बात की हमने विदेशो से उनकी सिर्फ गलत बाते सीख ली | कुछ पूर्वे वर्ष सिंगापुर में रहता था | वहा भी कुछ ऐसा ही एक वाकया हुआ था |जहा पर हमारे स्टाफ के एक लड़के ने किसी पड्रोस में रहेने वाली युवती को कुछ कह दिया था, फिर क्या था जैसे आसमान फट पड़ा | उस युवती ने पुलिस में फ़ोन कर दिया |और पुलिस ने आकार उस लड़के और वहा पर सभी लडको को बहुत मारा | व् उसके बाद युवती से पहचान कराइ व् उस युवक को पड़कर कर ले गये व् दुबारा उसको बहुत मारा .आज कई वर्ष बाद भी उसके शरीर पर निशान है | फर्क इतना है की हमारे देश में यह संस्कारो में सिखाया जाता था और विदेश में उनहोंने सख्त काननों से प्राप्त किया है | मकसद है की किसी की क्या मजाल जो किसी भी युवती व् महिला को आंख उठाकर भी देखे | कुछ कहना तो बहुत दूर की बात | और हम तो ना घर न घाट के | न अपने संस्कार न ही अपना सख्त कानून | किसी की क्या मजाल जो किसी भी युवती व् महिला को आंख उठाकर भी देखे | कुछ कहना तो बहुत दूर की बात | लेकिन अनीता जी , आप हिम्मत न हारे , हम जरूर बद्लेगे | भाई मनीष सिंह जी ने इसी ब्लॉग पर कविता लिखी थी | उसको जरूर पड़े

के द्वारा: अरुण अग्रवाल अरुण अग्रवाल

नंदा दीप जलाना होगा| अंध तमस फिर से मंडराया, मेधा पर संकट है छाया| फटी जेब और हाँथ है खाली, बोलो कैसे मने दिवाली ? कोई देव नहीं आएगा, अब खुद ही तुल जाना होगा| नंदा दीप जलाना होगा|| केहरी के गह्वर में गर्जन, अरि-ललकार सुनी कितने जन? भेंड, भेड़िया बनकर आया, जिसका खाया,उसका गाया| मात्स्य-न्याय फिर से प्रचलन में, यह दुश्चक्र मिटाना होगा| नंदा-दीप जलाना होगा| नयनों से भी नहीं दीखता, जो हँसता था आज चीखता| घरियालों के नेत्र ताकते, कई शतक हम रहे झांकते| रक्त हुआ ठंडा या बंजर भूमि, नहीं, गरमाना होगा| नंदा दीप जलाना होगा ||..................................मनोज कुमार सिंह ''मयंक'' अनीता जी, आपको और आपके सारे परिवार को ज्योति पर्व दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं || वन्देमातरम

के द्वारा: atharvavedamanoj atharvavedamanoj

अनीता जी नमस्कार, आपके साथ जो कुछ हुआ, उसे सभ्य समाज में कोई भी उिचत नहीं ठहरा सकता,  लेिकन क्या यह एक मछली के मरने से पूरा तालाब बदबूदार होने की बात से अलग है। अगर आप एक घटना के सहारे पूरे पूरे पुरुष समाज के प्रित धारणा बना लें, तो यह ऐसी ही बात होगी िक जैसे िभंडरावाले के नाम पर पूरा िसख समाज और लादेन के नाम पर पूरा मुसि्लम समाज आतंकवादी हो गया हो। पुरुष समाज में आपके िपता, भाई व अन्य बंधु बांधव भी हैं, जो आपकी एक हूंक पर पूरे जमाने से लड़ने के िलए तैयार हो जाते हैं। बेहतर हो आप अपनी धारणा को िवस्तृत करने की कृपा करें। अच्छे औरक बुरे हर जगह होते हैं,चाहेवह मिहलाओं के बीच में हों या पुरुषों के बीच। 

के द्वारा: maheshsharma maheshsharma

के द्वारा: पियूष पन्त , हल्द्वानी पियूष पन्त , हल्द्वानी

प्रिय अनीता जी, बहुत खेद है की ऐसी घटना घटित हुई| परन्तु मेरा आपसे एक प्रश्न है की क्या उन भेडियो ने वहा बैठी सारी लडकियों के साथ ऐसा अश्लील व्यवहार किया? बहुत सी लडकिया तंग और छोटे कपडे पहन कर क्या दिखाना चाहती है ये वो ज्यादा अच्छी तरह से जानती है, न की दुसरे पशु जो देखते है| हर इन्सान ९५ % घटनाओ के लिए खुद जिम्मेदार होता है, और मै तो खुले आम कहता हूँ की अगर कोई खुद खोल कर कुछ दिखा रहा है तो भाई हुक क्यूँ न देखे, अब उसमे कोई आगे बढ़कर टिप्पणी भी कर देता है.(टिप्पणी बहुत गन्दी हरकत है ) और या उससे भी गिर जाते है| परन्तु शुरुआत देखने दिखने से ही होती है| ऐसा भी क्या आधुनिकतावाद की आप अपने कपड़ो को ही छोटा कर दे और फिर सब को दोष दे की वो भूके भेडिये की तरह देखते है| शायद आपको अभी भी नहीं समझ आया होगा की कौन ज्यादा जिम्मेदार है| धन्यवाद- जय श्री राम

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मेरी प्यारी एवं नटखट बहन सम्बोधन अगर बुरा लगे तो नजरंदाज कर देना,, आज प्रथम बार तुम्हारे /आपके लेख को देखा,,आपके लेख को हृदय से समर्थन देता हूँ ,,समाज में ऐसे लोगों की संख्या बहुतायत है ,परन्तु सभी नही (कभी सोते समय ,पिता, भाई के चेहरे को जेहन में लाना ) (समाज पुरुषवादी है तुम्हारा यह कथन भी सत्य है) लेकिन जिस घटना का तुमने उल्लेख किया है उसे महसूस किया है ,उस दर्द को मै बाँट तो नही सकता ,लेकिन इतना अवश्य कहूँगा कि थोडा सा देखने का नजरिया बदलो ,,अपनी स्मृति को टटोलो जिनके द्वारा ऐसी हरकत या कृत्य को तुमने देखा या महशूश किया उनकी पृष्ठभूमि कैसी थी ,तुम कहोगी मुझे इससे क्या मतलब ,,फिर भी मै केवल इतना ही कहना चाहता हूँ (कीचड़ से कभी कभी ही कमल खिलता है ,अन्यथा सड़ांध ही आती है )...................तुम्हारा/आपका अगर समझो तो स्नेही भाई

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अनीता जी ! सबसे पहले तो मै यही कहना चाहुगा की आपके दिलो दिमाग में मर्दों के प्रति जो एक गलत छाप बन गई है उसको मिटने की कोशिश कीजिये क्योकि आप ने पहले भी लिखा था कि "सभी मर्द एक जैसे होते है"लेकिन वहा पर कई मर्द आपके पक्ष में थे परन्तु अधिकतर विपक्ष में ही सामने आये इससे ये बात तो साबित होती है कि सभी मर्द एक जैसे नही होते है किसी ने कहा है कि अगर आप अच्छा सोचते है तो आप के साथ अच्छा ही होगा तो मेरी ये गुजारिश है आपसे कि आप अच्छा सोचने का प्रयास कीजिये कुछ लोगो कि वजह से उत्पन्न सभी मर्दों के सम्बन्ध में जो गलतफहमिया है उन्हें दूर करे और अगर आप तनहा है और तन्हाई को दूर करना चाहती है तो आप जल्द से जल्द शादी के पवित्र बंधन में बंध जाये ताकि आपको कुछ समस्याओ से तो निजात मिल सके क्योकि जब कोई लड़का किसी लड़की के मांग में सिन्दूर व गले में मंगलसूत्र देखेगा तो खुद बा खुद गंदे कमेंट्स व किसी प्रकार कि बदतमीजी करने से पहले कम से कम दस बार सोचेगा ! आगे आपकी इच्छा आप समझदार है बड़ी है अनुभवी है All the best thanks

के द्वारा: swatantranitin swatantranitin

नमस्कार अनीता जी,आपके साथ हुआ यह निंदनीय हादसा पढ़कर काफी निराशा हुई,साथ में निचे दिए सभी प्र्बुध्जानो के विचारों को भी पढने का मौका मिला...................निचे रोशनी जी,निशा जी और सीमा जी ने इस पर बहुत ही अछि प्रतिक्रिया जाहिर की है जिसमे उन्होंने कहीं इसके लिए महिलाओं के द्वारा लड़ाई लड़ने की बात कही है यहाँ मै आप सब से एक बात पूछना चाहता हूँ की ये लड़ाई किस प्रकार की हो सकती है क्या किसी घटना के बाद या उसी समय प्रतिद्वंदी से मुकाबला या फिर दोषी को सजा दिलाने के लिए संघर्ष....................लेकिन फिर यहाँ एक सवाल खड़ा हो जाता है की आखिर दोषी माना किसे जाय उसे जो इन लड़कियों,ओरतों पर बुरी नज़र रख छेड़ते है या फिर उसे जो ये काम करने के लिए उन बद्द्त्मिज कहे जाने वाले मर्दों को प्रेरित करती है,मुझे लगता है की सबसे पहले इसका ही कोई निष्कर्ष निकाल समाधान करने पर विचार करना ज्यादा कारगर साबित हो सकता है .................निचे आदरणीय दीपक जी,जलाल साहब,अशोक सिंह जी के साथ लगभग सभी विशिस्ट विचारको ने भी स्पस्ट रूप से कही न कहीं ये माना है की ऐसी घटनाओं के लिए जहाँ ये मर्द जिम्मेदार है वहीँ कही न कहीं लड़कियों का ड्रेस अप व उनका आचरण भी जिम्मेदार है,ऐसे में यह नहीं कहा जा सकता है की सभी लडकिया ऐसा करती है लेकिन वो कहावत तो आपने सुना ही होगा की \"गेहूं के साथ घुन भी पिस्ता है\"...........................बाकि इसी सम्बंधित मैंने कुछ दिनों पहले एक लेख(कहानी स्वरूप) जो \"पहले चलना तो सीखो बहन की तरह\" को पोस्ट किया था,जो www.draj.jagranjunction.com पर देखा जा सकता है,अगर आपकी नजर इस पर पड़े तो आभारी रहूँगा,और साथ ही यह भी कहना चाहूँगा की मैंने यहाँ पर किसी एक समाज को जिम्मेदार नहीं ठहराया है बल्कि एक सुझाव स्वरूप जो मै समझता हूँ को दिया है,अगर कोई बात किसी को बुरा लगे तो झमाप्रर्थी हूँ, धन्यवाद!

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अनीता जी, मै जलाल जी की बातो से शत-प्रतिशत सहमत हूं साथ ही अशोक जी ने भी ठीक ही कहा है कि - इसके अलावा कुछ हद तक लड़कियों का खुलापन वाला ड्रेस कोड भी ऐसी भावनाओं को उद्वेलित करता है। आज के जमाने में 80 प्रतिशत लडकियों को दुप्‍पटा तक ओढने का सलिका नही आता दुप्‍पटा जिसे पहले हम आंचल कहते थे उसे आज के जमाने में लड़कियों ने मात्र एक गले में डालने वाला मफलर का रूप दे दिया है। और यही सबकुछ पुरूषों की पाश्‍वीकता को जगाता है। अब इस बात को दुसरे नजरिये से सोचे तो आज के आधुनिक युग में इस नई पिढी के युवाओं मे संस्‍कारों का आभाव है आज पैसे एवं रूतबे ने उन्‍ाके अंदर से डर को खत्‍म कर दिया है और वह शणिक उन्‍माद के लिए कुछ भी करने से नहीं डरते न ही उस के परिणामों की उन्‍हें परवाह है। शाही जी ने भी ठीक ही कहा है यह एक ऐसा मंच है जिस पर आप अपने मन के विचार प्रकट कर सकती है दिल के बोझ को हल्‍का कर सकती है।

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प्रिय अनीता जी, पुरुष और स्त्री दोनों एक दुसरे के उलट हैं. यही शुरू से है. करीब करीब हर पुरुष के अन्दर ऐसे ही ख़यालात रहते हैं. कम से कम 100 में से 95 का तो बिलकुल. और यह ख्याल सोच समझ कर नहीं आते बस देखते ही आ जाते हैं. शायद यह मर्द की प्रवृति ही है. और यह आज से नहीं सदियों या कहें तो सहस्त्राब्दियों से चली आ रही हैं. और जब तक एक पुरुष, स्त्री के तरफ आकर्षित होता रहेगा तब तक ऐसा ही होता रहेगा. यह ज़बरदस्ती आदि काल से है और सिर्फ मानवों में ही नहीं जानवरों में भी ऐसा ही है. हाँ जब पुरुष, स्त्री के तरफ आकर्षित नहीं होगा तो ऐसी कोई हरकत कभी नहीं होगी. मतलब सृष्टि को ज़ारी रखने के लिए यह आकर्षण ज़रूरी है और यह कुदरत का ही दिया हुआ है. इसे किसी पुरुष ने खुद से पाला नहीं है. पुरुष रूप में जन्म लेगा तो वोह ऐसा कर सकता है अगर पूरी तरह है तो. हाँ बात रही छेड़ छाड़ की तो गलत ज़रूर है. इसीलिए हम समाज में रहते हैं ताकि सभी को एक दुसरे की मदद मिले और शिस्टाचार सीखे. मानव और जानवरों में यही तो फर्क है. लेकिन आज कल जिस तरह लड़के और लड़कियां घूम रही हैं खुल कर, वोह भी ज़िम्मेदार है इन सबके लिए. लोग चिल्ला चिल्ला कर कह रहे हैं की सब को अपनी तरह जीने का हक है. अपने विचार व्यक्त करने की आजादी है. लेकिन वोह यह भूल जाते हैं की इससे भी बुराइयाँ बढ़ रही है. कुछ चीज़ें काबू में रहें तो ज्यादा अच्छा है. अगर लड़के भी इसी तरह की मांग कर बैठे की उन्हें अपने विचार व्यक्त करने की आजादी दी जाए तो शायद सभी लड़कियों को लड़के छेड़ते हुए नज़ारे आयेंगे. यह उनकी सोची समझी बात नहीं होगी. क्यूंकि यह उनकी दिली चाहत है. यही लड़कों की फितरत है. कहते हैं दिल में जो विचार हो उसे प्रकट करो, मन में जो हो उसे करो, ऐसा नहीं करने को milta है तो मनुष्य कुंठित हो जाता है. लेकिन मन की उन बातों को अगर पूरा किया जाये तो अच्छा नहीं होगा. इसलिए काबू में रहना और कुछ चीज़ें नहीं पूरी होना भी ज़रूरी है. इसलिए लड़कियों को भी सोच समझ कर chalna chahiye. ताकि लड़कों को badmashi का mauka na मिले. Dono ही तरफ parhez karenge tabhi सब कुछ theek रहेगा. यह saari baaten ajeeb lag sakti हैं. लेकिन यही sach है. इसी के लिए ........ khai baatein तो bahut हैं. कुछ bura lage तो बस इसे meri niji rai समझ कर mere maathe madh den main हो sake तो कुछ jawab doonga. phir milenge.

के द्वारा:

अनीता जी, नमस्कार, आपके साथ जो भी घटि हुआ है, यह कोई अनहोनी नहीं है। और न ही कोई पहली विरली घटना है। इसके लिए कामुकता की भावना को नैसागिर्क प्रभु प्रदत्त मानने वाला समाज दोषी है। इसके अलावा कुछ हद तक लड़कियों का खुलापन वाला ड्रेस कोड भी ऐसी भावनाओं को उद्वेलित करता है। दिल्ली तो इस तरह की हरकतों के लिए पूरी तरह से बदनाम है। यह उस देश की राजधानी है, जिसका अतीत का इतिहास काफी गौरवपूर्ण रहा है। वैसे एक शाश्वत सच यह भी है कि स्त्री के प्रति मर्द का कामुक आकर्षण धरती के जन्म से ही रहा है। पहले तो लोग उठाकर ले जाते थे। लेकिन अब वह पहले जैसा दौर तो नहीं रहा है। परंतु ऐसी ओछी हरकतों को नजरअंदाज करना भी ऐसी घटनाओं को बढ़ावा देना ही है। एक लड़की अकेले मर्द का सामना नहीं कर सकती है, जहां पर दो से चार या अधिक हो वहां पर तो कल्पना कुछ सोचना भी नामुमकिन है। अनीता जी, मैं आपके ददर्द को अच्छी तरह से समझ सकता हूं। पर सिवाए शब्द बाण के कुछ भी नहीं कर सकता हूं। जब मैं आपको यह प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहा था, तो उसी समय मेरे कायर्ालय से चंद कदम की दूरी पर एक चौराहा है, जहां पर आटो में जहां रही एक लड़की को कुछ नकाब पोश युवक जोकि कार मं सवार थे, आटो को ओवरटेक करके, एक लड़की को जबरन घसीटकर अपहृत करके ले जा रहे थे। लेकिन कुछ लोगों की हिम्मत ने उस लड़की को उनके चंगुल से छुड़वाया। एक पकड़ा गया तीन भागने में कामयाब रहे। आपके साथ तो कुछ भी नहीं हुआ..जो छोटी गरीब घरों की लड़कियां घरों में काम करती है, और गली गली जाकर कूड़ां बीनती है, उनसे पूछों कामुक भेड़ियों द्वारा मासूम की नरम गोश्त को नोंचे जाने का दर्द। जिन लोगों ने आपको गलत इशारा किया और उक्त स्थान से आप सुरक्षित बाहर आ गई, इसके आप ईश्वर का आभार व्यक्त करे। और वर्तमान में ऐसे लोग किसी शरीफ वर्ग की श्रेणी में गिने जाते है। यह शाइनिंग इडिंया है का भारत है और हम सब लोग हिंदुस्तानी है। जय हिंद.......अशोक

के द्वारा:

अनीता जी आपके साहस की तारीफ़ करनी होगी । ऐसे वाक़यात अक्सर औरतों द्वारा छुपा लिये जाते हैं, जिसके कारण शोहदों की हिम्मत और बढ़ती है । खासकर आप जैसी अकेली रहने वाली औरतों पर इन बाजों की विशेष दृष्टि होती है । बस ज़रा मौका मिला कि भद्दे इशारे शुरू कर देते हैं । इनका इलाज़ बस यही है कि वहीं उतारे सैंडल और पूरी पूजा कर दी जाय । लेकिन खैर, शरीफ़ औरतों को कुछ भी करने के पहले बहुत कुछ सोचना पड़ता है । हमारे देश के शालीन संस्कार जो आप अबलाओं का रास्ता रोकते रहते हैं, सारा कुसूर उन बुज़दिल संस्कारों का है । संतोष का विषय है कि आपके पास अपना जी हल्का करने के लिये इतना बेहतरीन मंच है, जो अपना दुख बांट लेती हैं । साधुवाद ।

के द्वारा: आर. एन. शाही आर. एन. शाही

अनीता जी धर्म पर मेरे ज्ञान चक्षु खोलने के लिए आभार .. जिस मानव धर्म का ज्ञान आप बाट रही है उसकी समझ मानव में इसी धार्मिक आन्दोलनों के विकास के क्रम का परिणाम है. जंगलो में रहने वाला मानव मानवीय धर्म नहीं समझता था.. एक मानव दुसरे को मित्र नहीं बल्कि अपने अस्तित्व के लिए खतरा समझता था..क्योकि अपने स्वरुप और शक्ति का ज्ञान उसे नहीं था .. समाज की शक्ति का ज्ञान अहि था.. धर्म के अनुशाशन ने ही उसकी सामाजिकता का विकास करके उसे संगठित और सामाजिक प्राणी बनाया एक एक क्रम में हुआ .... हर मानव निर्मित धर्म का आधार वही मानवीय धर्म है .. आप अगर भाषण की जगह अध्ययन करेंगी तो आपकी समझ में आ जायेगा की विश्व का कोई भी धर्म हो उसमे कही भी किसी भी तरह के अमानवीयता के लिए जगह नहीं दी गई है ... बल्कि हर धर्म ने मानव के बिखराव उसकी जंगली सोच और एक जंतु के व्यवहार में परिवर्तन लाकर एक सभ्य समाज के निर्माण के लिए अनुशाशन की ही शिक्षा दी है . इसलिए आप और ऐसे कई ज्ञानी आजकल के एक कल्पित मानव धर्म की बात करने लगे है क्योकि धार्मिक अनुशाशन और धार्मिक समाज में सुरक्षित मानव की जगह आपलोगों को हर तरह से स्वतंत्र मानव का रूप ज्यादा पसंद है.. इसलिए धर्मो को कोसना आसान लगता है .. और आपकी जानकारी के लिए बता दू की हर धर्म मानवीय धर्म ही है... धर्म शब्द कभी अमानवीय हो ही नहीं सकता .. हा धर्म का दुरुपयोग करने वालो ने ही उसमे अमानवीयता ला दी है ... लेकिन महोदया .. अगर भारत के सन्दर्भ में हम बात करे तो भारत की पहचान उन चंद कट्टर लोगो से नहीं होती जो छद्म हिन्दू या छदम मुसलमान है .. और आग फैलाते है बल्कि भारत की पहचान ६ लाख गावो में रहने वाले करोणों हिन्दू और मुसलमान आत्माओं से है जो अपने धर्म के दिखाए रास्ते पर इमानदारी से चल रहे है....... भाषण से पहले अपने समाज का अध्ययन कर लेना चाहिए .. आपके समाज की रीढ़ इन्ही धार्मिक परम्पराओ पर हजारो वर्षो से अडिग है .. जिन धर्मो को आप कोस रही है .. ये विचारो का दोगलापन है .... .... न की धर्म का ..... आपने जो शीर्षक दिया है आपका लेख वह बात ही नहीं करता आपको इंसानों के दोगलेपन पर बात करनी चाहिए आपने उन महान धर्म प्रवर्तकों ,महान आत्माओ ,ऋषि मुनियों और स्वयं विभिन्न मानव निर्मित धर्मो पर ही दोष मढ़ दिया...... अगर ध्यान देंगी तो समझ जाएँगी की सभी धर्म एक से ही है .. हमारा धर्म तुम्हारा धर्म की भावना इंसानी प्रवृत्ति है वह नहीं बदल सकती .. हमारा - तुम्हारा का भाव हम सभी में होता है और रहेगा... मानवीय मन बहुत चंचल होता है ... इसलिए धर्म का विधान किया गया ताकि वह अनुशाशन में बंधा रहे .. इसपर चर्चा करेंगे तो यह दर्शन का विषय हो जायेगा.. बस इतना ही अधिक ज्ञान नहीं है यदि मुझसे कोई गलती हो गई हो तो अज्ञानी जान कर क्षमा करे ....

के द्वारा: NIKHIL PANDEY NIKHIL PANDEY

निखिल जी, शुक्रिया, लेकिन आपके विचारों से ये साफ लग रहा है कि धर्म के बारे में अभी आपकी समझ कम है और ये शायद आपकी अपरिपक्वता के कारण है. सबसे पहली बात कि अभी आपने मेरे लिखे "धर्म" शब्द का अर्थ नहीं समझा. मैंने कहा है कि इंसानों द्वारा बनाए गए तथाकथित धर्म तो इसका मतलब है कि ऐसे सभी धर्म जिनके कोई ना कोई प्रवर्तक रहे. और ऐसे धर्म यानी संप्रदाय जिस काल में आरंभ में किए गए उस समय भले ही उनका उद्देश्य व्यापक रहा हो पर कालांतर में उन संप्रदायों का नेतृत्व स्वार्थी तत्वों के हाथ में आ गया. और फिर शुरू हो गयी वर्चस्व की लड़ाई. आज पूरी दुनियां से संप्रदायों का वर्चस्व खत्म हो रहा है तो एक नई बात देखने में आ रही है वो है वही पुराना असर लाने की खलबली... वही हड़बड़ाहट और मदांधों की तरह पागलपन. और मैंने इसी तथाकथित धर्म को लेकर अपनी बात कही है ना कि सार्वभौमिक सर्वहितकारी मानवधर्म की.

के द्वारा: Anita Paul Anita Paul

के द्वारा: Anita Paul Anita Paul

विजेन्द्रजी ! भारत के शत प्रतिशत इसाई धर्म परिवर्तन के बाद ही इसाई बने है! ............................केवल एंग्लो इंडियन के समुदाय को छोड़ कर !! मेरा पूरा नाम डैनियल कुमार सिंह है , मेरा नाम, मेरे वर्तमान के साथ कुछ पीढियों पहले के इतिहास को बिना पूछे ही बता देता है !! आप किस कडवी सच्चाई की ओर इंगित कर रहे है ? जो आप शायद झिझक के कारण नहीं कह पाए मैं ही बता देता हूँ चार पीढियों पहले हम ईसाई हुए थे, किन कारणों से मैं नहीं कह सकता और मुझे इससे कोई फर्क भी नहीं पड़ता .................................... अनीता जी के ब्लॉग का विषय था धर्म (कोइ धर्म विशेष नहीं ) और मेरा उत्तर भी धर्म (किसी धर्म विशेष नहीं ) से सम्बंधित था आपने कितनी सहजता से इसे धर्म परिवर्तन से जोड़ दिया .............................................आपका प्रयास सफल रहा ! ...........................................मेरी बधाइयाँ स्वीकार करे !!

के द्वारा: daniel daniel

डेनिअल जी आपके पूरे जवाब को पढ़कर ऐसा लगा की सच्चाई शायद कड़वी होती है आपके निम्न जवाब पर कुछ कहना चाहता हूँ(उत्तर : जो लोग चंद सिक्को व् सुविधाओ के लिए धर्म परिवर्तन कर लेते है उनके बारे में आपके क्या विचार है मैं नहीं जानता मैं तो केवल इतना ही जानता हूँ कि ऐसे लोग धर्म कि समझ ही नहीं रखते ये लोग अपने को हिन्दू कहें या मुसलमान या इसाई क्या फर्क पड़ता है ।)भारत में मुझे लगता है 80 % ईसाई धर्म के लोग धर्म परिवर्तन के बाद ईसाई बने है और इस्लाम धर्म के बारे में मेरी जानकारी अनुसार हिन्दुओं को डरा धमका कर मुसलमान बनाया गया मेरी इस बात के पीछे तथ्य यह है की कश्मीर में गुर्जर समुदाय के लोग ईस्लाम धर्म को मानते है .........ईसाई मिशनरी मध्य प्रदेश के झाबुआ जिले में आदिवासियों को लालच देकर धर्म परिवर्तन करवा रहे है .....आप अपने बारे में भी पता करना आप के पूर्वज या आप भी हिन्दू ही रहे होंगे जो किसी कारन से ईसाई बने ........

के द्वारा: vijendrasingh vijendrasingh

जागरण मंच पर आपके सात लेख सर्वाधिक commented लेख प्रतीत होते है ...................शायद सर्वाधिक पठित भी......................... चंद लेखो द्वारा आपने जो उपलब्धि प्राप्त की है, वह सराहनीय है। अब तक आपको प्रशंसा व् सराहनाये ही मिली है, जो अब आपके लिए सामान्य सी बात रह गई होगी । शायद अब आपको आलोचनाओ की जरुरत है, कुछ कहूँ इससे पहले क्षमा मांगना ज्यादा जरूरी है। मैं स्पष्ट करना चाहता हूँ कि ये पंक्तिया केवल इस लिए लिख रहा हूँ कि वर्तमान समय में धर्म को परिपक्व समझ से देखने की ज़रुरत और बढ़ गई है । आपने अब तक धर्म को जिस नज़र से देखा है, उससे अलग एक नई सोच से धर्म का अन्वेक्षण करने की जरूरत है । १.आपने लिखा है \"धर्म सारी समस्याओं की जड़ है. दुनियां में अब तक के अधिकांश फसाद, आपसी वैमनस्य जितना धर्म के कारण हुए उतना शायद किसी और कारण से नहीं \" मेरा उत्तर : इसका कारण हमारा अहंकार व् स्वार्थ है न कि धर्म । अगली पंक्तियों में स्वयं आपने भी इस तथ्य को स्वीकार किया है \"वर्चस्व की लड़ाई का सबसे खतरनाक रुख साम्प्रदायिक दंगों में सामने आता है. लोग सबसे अधिक पशुवत और सबसे ज्यादा अधार्मिक धर्म को मानने के दौरान ही होते हैं. \" वर्चस्व कि लड़ाई के मूल में\" हमारा अहंकार व् स्वार्थ है न कि धर्म \" इस बात को आप अस्वीकार नहीं कर पाएंगी । २.आपने लिखा है \"इस्लाम और ईसाइयत तो शुरू से तलवार के बल पर ही अपना फैलाव करते रहे हैं. सारे दंगों और फसाद की जड़ ज्यादातर ये ही हैं. \" मेरा उत्तर : इस्लाम और ईसाइयत के बारे में आपकी यह टिप्पड़ी भारत के सन्दर्भ में हो या पूरे विश्व के सच्चाई तो यह है कि राजनीतिक लाभ के लिए शासको ने धर्म का दुरूपयोग किया। लड़ाईयां तो साम्राज्य विस्तार के लिए ही हुई थी, धर्म का तो केवल प्रयोग किया गया था । ३.आपने लिखा है \"ईसाइयत ने अपने फैलाव का एक नया रास्ता खोज निकाला वह है उनका मिशनरी संगठन. लोगों को लालच दे के, उन्हें सहायता का वादा देकर ईसाइयत अपनाने को मजबूर करना और फिर जैसे कुत्तों को रोटी डाली जाती है वैसे ही चन्द सिक्के व सुविधाएं देकर उनका धर्म परिवर्तन करना. \" मेरा उत्तर : जो लोग चंद सिक्को व् सुविधाओ के लिए धर्म परिवर्तन कर लेते है उनके बारे में आपके क्या विचार है मैं नहीं जानता मैं तो केवल इतना ही जानता हूँ कि ऐसे लोग धर्म कि समझ ही नहीं रखते ये लोग अपने को हिन्दू कहें या मुसलमान या इसाई क्या फर्क पड़ता है । ४..आपने लिखा है \"धर्म का प्रसार करना अपने आप में सबसे बड़ा कारोबार है. पूरी दुनियां में एक धर्म विशेष की स्थापना और प्रसार रणनीतिक रूप से सही मानकर किया जाता है. हिंसा को बेचने वाला, हिंसा का व्यापार करने वाला व्यापारी सबसे अधिक धार्मिक होता है. अनेक तरह के जटिल कर्मकांडों का व्यवहार यही धार्मिक व्यापारी करते है. मंदिर-मस्जिद के नाम पे झगड़े चलते रहें इसमें फायदा इसी वर्ग को है. \" मेरा उत्तर : आपने सही कहा है ,हमें समस्या को इसी परिप्रेक्ष में ही देखना चाहिए । ५.आपने लिखा है \"ये दोगलापन है इंसान का. व्यवस्था से ज्यादा महत्व मनुष्य़ और मनुष्यता को देना चाहिए लेकिन होता उल्टा है. यहॉ महत्व व्यवस्था का है और मनुष्य केवल साधन. \" मेरा उत्तर : हमारा अहंकार व् स्वार्थ ही हमें दोगला बनता है इसके लिए धर्म को दोष नहीं देना चाहिए । ...............................................................................................यदि मेरी किसी बात से आपको दुःख पहुंचा हो तो एक बार पुनः क्षमाप्रार्थी हूँ !!

के द्वारा: daniel daniel

अनीता जी मुझे नहीं पता की सभी टिप्पड़ीकारो को इसमें क्या बेबाक और बहादुरी से भरी राय लगी ... जबकि ये लेख मात्र अज्ञानता और धर्म के बारे में आपकी संकुचित समझ का परिणाम है ... धर्म को जानने वाले बहुत चंद लोग है ये अव्यवस्था इसी का परिणाम है ..धर्म को कम समझने वाले उसका दो तरह से उपयोग करते है .... एक तो वे धर्म विरोधी ही हो जाते है ..और दुसरे धर्म के नाम पर अपनी रोटिया सेकने लगते है ....आप धर्म विरोधी बन गई है तो इसमें दोष धर्म का नहीं बल्कि उस माहौल का है जो की धर्म का आश्रय लेकर कुछ मौका परस्त लोगो ने बना दिया है ...... जरुरत धर्म का विरोध करने की नहीं बल्कि धर्म के वास्तविक स्वरुप से लोगो को अवगत कराने की है . अगर आप जैसे बुद्धिजीवी लोग मुट्ठीभर भड़काऊ लोगो की धार्मिक उन्माद को देखकर ऐसे पलायनवादी आचरण करेंगे तो वह तानाबाना टूट जायेगा जो हजारो वर्षो से समाज को एक सूत्र में बंधे हुए है .... क्योकि हर हिन्दू मुसलमान सिख ईसाई दंगाई नहीं है .....वे अनजान है अशिक्षित है इसलिए धर्म के राजनीतिज्ञ उनका प्रयोग कर रहे है ..... और आप जैसे बुद्धिजीवी धर्म को ही कोसे जा रहे है .....

के द्वारा: NIKHIL PANDEY NIKHIL PANDEY

अनीता जी, इस मंच पर मैं आपके तीन विभिन्न रूपों को देख चुका हूँ और तीनो में मुझे एक समानता नज़र आती है वह है स्पष्ट-वादिता यानी किसी की राय क्या होगी लेखन इस बात से बिलकुल अछूता है और यही कारण है कि आपने हर बार सभी को कुछ न कुछ सोचने पर मजबूर किया है | जरूरी यह नहीं कि हम व्यक्ति की राय से इत्तेफाक रखते हैं या नहीं जरूरी यह है कि व्यक्ति अपनी बात को दबा छिपा के डर के या किसी दुर्भावना से प्रेरित होकर तो नहीं लिख रहा है| इस लेख की जितनी भी तारीफ़ की जाय कम है | प्रशंसा करने का मेरा कारण ये नहीं कि आपने कुछ नया या अद्भुत सा लिख दिया है बल्कि यह अद्भुत है कि जिस बात को स्पष्ट कहने की हिम्मत अपने आप को साहसी कहने वाले पुरुषों में भी बहुत कम देखने को मिलता है उस बात को एक स्त्री पूरी तटस्थता के साथ बिना किसी लाग लपेट के व्यक्त करते हुए मानो उदाहरण प्रस्तुत कर रही हो कि सत्य मुखर होकर निर्भय हो बोलो| आपकी राष्ट्र वादी सोच और साहस को मेरी हार्दिक शुभकामनाएं! वन्दे-मातरम!

के द्वारा: chaatak chaatak

"दर्द कभी ना मिटने वाला दर्द फिर भी आस बाकी है कि कभी तो मिटेगा दर्द" ये आपकी टेग लाइन है, लेकिन सच तो ये है की ऐसा कुछ है ही नहीं. आपके अन्दर ठीक वही काबिलियत है, जो लोगों को बांधे रखने में सक्षम है. वैसे ही जैसे की टी.वी. सीरिअल्स पर हम देखते है, देखते-२ लगता है की अब ये होगा, अब ये होगा लेकिन होता नहीं है, और फिर अगली बारी की कड़ी देखने की ललक पैदा करने वाला अंतहीन अंत. इसे बनाने वाले की चाहत इसे यूं ही खींचते रहना ही है. और इसमें केवल उसी की भलाई है. प्रोफाइल में लगी फोटो को चेंज कीजिये, इस फोटो की मासूमियत आपकी विचारधारा को प्रदर्शित नहीं करती. ये टिपण्णी कितनी झूठ है और कितनी सच ये तो आप ही देखिये.

के द्वारा: siddequi siddequi

सोच रहा हूँ , कि इस लेख में क्या लिखा है ?शायद यह कि आप कहना चाहती हैं कि लोग झूठ बोलते हैं / आप ने लिख दिया कि ...\"\" हम सभी अभ्यस्त हो चुके हैं इस तरह की घटनाओं के तभी ऐसी घटनाएं मन पे कोई असर नहीं डालतीं. हमें इस बात का भान भी नहीं होता कि कब मुंह से झूठ निकलता है ......\"\" फिर आप ने अपने बारे में कह दिया कि ...... अनीता तुम्हीं सही हो कम से कम तुम झूठ तो नहीं बोलती. कम से कम जो भी दिल में होता है उसे बेबाकी से सबके सामने कहने की हिम्मत तो रखती हो भले ही कई लोग इसके लिए तुम्हें बुरा कहते हों.... / चलो अब मान लो सब लोग झूठ नही बोलते / मै भी झूठ नही बोलता .. पेशे से वकील हूँ . इसलिए ... मै आप के साथ हूँ .. सच बोलने में .. अब मै आप को एक सच बता देना चाहता हूँ .. कि .. भारतीय संविधान में सच बोलने के लिए कोई प्रावधान ही नही है .. देखिये नां भारत की राष्ट्र भाषा हिंदी है ... पर सुप्रीम कोर्ट और केंद्र सरकार अंग्रेजी में काम करते है ... संविधान कहता है कि भेद -भाव नही किया जाएगा .. पर आरक्षण होता है ...हमको अपना धर्म मानने की आजादी है .. पर हमारे धर्म के अनुसार होने वाले कई रीति रिवाज , पर प्रतिबन्ध भी है ..हमारा संविधान ही ऐसा है .... अरे अरे शायद सच सच बोलते हुए सच बोल गया .. माफ़ करना .. आपका लेख भी सच है .. मै भी सच्चा हूँ ...

के द्वारा:

अनीता जी आप बिलकुल ठीक लिखिती हैं, अब पुरुषों में पुरुषत्व का लक्षण बाकी नहीं बचा है, और सच तो ये है पुरुषत्व प्राचीन काल में भी नहीं था, यदि होता तो ये न लिखते "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता " नारियों से डरते थे इसीलिए ये लिख दिया, नारियों की पूजा में भारतीय मर्दों ने उक्त श्लोक का अनुशरण करने में जरा भी कोर कसार बाकी नहीं छोड़ी है, छाहे वो सोनिया गाँधी हों अथवा मायावती, प्रतिभा पाटिल हों या जय ललिता सबकी पूजा बदस्तूर जारी है, बस नारियों की पूजा में ही मर्दानगी दिखाते हैं वैसे किसी मर्द से चूहा मारने के लिए कह दिया जाए तो मीटिंग करने बैठ जायेंगे. आप सच कहती हैं ये पुरुषत्व में आई कमी के कारण ही देश का ये हाल है वर्ना ......... खैर आपके लेख यदि आपके व्यक्तिगत जीवन से प्रभावित नहीं हैं तो कहीं न कहीं आपसे नारीत्व का भी वर्णन करने में चूक हो गयी है, और यदि आपके व्यक्तिगत जीवन से प्रभावित है तो फिर तो चूक हो ही चुकी है उसके लिए तो इतना ही कहूँगा की आप हरिवंश राय बच्चन जी की वो कविता पढ़ें "जो बीत गयी सो बात गयी " वैसे पुरुषों के विषय में आप का आकलन बिलकुल सही है...........................! चलते चलते "जिन्दगी जिन्दादिली का नाम है मुर्दादिल क्या खाक जिया करते हैं "

के द्वारा:

अनीता जी हो सकता हे नारी apki नज़र में आज भी भोग की वास्तु हो, पर सभी नारियौं पर ये लागु नहीं होता और जहाँ तक सभी मर्दों का सवाल हे तो मेरे पापा भी एक मर्द हे और उन्होंने मुझे अपनी पहचान बनाने और खुद को साबित करने का होसला दिया हे. उनसे मेने सिखा हे की इंसान वो होता हे जो वो खुद को समझाता हे. अप किन परिस्थिति में ये सब बोल रही हे वो में नहीं जानती पर ये जरुर कहूँगी की समाज में नारिया इसलिए शोषित नहीं की उन्हें मर्दों से खतरा हे पर वो शोषित हे क्यूंकि वो खुद की दुश्मन हे. पुरुष प्रधान इसलिए हे क्यूंकि हमने उनकी प्रधानता को स्वीकार किया हे हम औरतें कभी एकजुट हो ही नहीं पिएँ. गलत हम हे खुद को भोग हमने बनाया हे आपके विचार अच्छे हैं उन्हें गलत राह में मत घुमाइए आपका उदेश जो भी हो पर समाज को नारी ke uthan की jarurat हे और उसके लिए नारियौं को ही जुड़ना होगा. और खुद को साबित करना hoga

के द्वारा:

अनीता जी मेरे पेज पर आकर अपनी प्रतिक्रया व्यक्त करने का शुक्रिया |मुझे खेद है की आपको मेरी बात से दुःख पहुंचा , किसी को दुःख पहुंचाना हमारा ध्येय न कभी था न है और न हो सकता है | ये तो अपनी-अपनी सोच है | हर कोइ आपके या मेरे विचारों से सहमत हो ऐसा संभव नहीं | अगर आपने कुछ कहा है तो स्वाभाविक है की अगर ९०% लोग आपका पक्ष लेते हैं तो १०% आपके विचारों से असहम भी हो सकते हैं | आप समझने में भूल कर रही हैं | यहाँ पर बात किसी आज़ादी या गुलामी की नहीं हुई और न ही मैंने कुछ ऐसा कहा है | आप भी जानती हैं की आपने एक विवाद खडा किया जो मुझे क्या बहुतों को बेतुका लगा और हमें उस पर कहने का अधिकार है , सो हमने जो कहा साधिकार कहा कुछ गलत नहीं कहा | अगर आप मुझ जैसी नारी को गुलाम कहती हैं तो मुझे नहीं जानना की आपके लिए आज़ादी के मायने क्या हैं | नारी पर होने वाले अत्याचार या किसी भी ज्यादती का मैं खुलकर विरोध करती हूँ , ये आप मेरे ब्लॉग पर मेरी रचनाएं पढ़कर स्वयम ही समझ जाएँगी और ज कहना है बेबाक कहती हूँ वो भी तर्क सहित , बिना किसी आधार के नहीं और मेरे बारे में आप जानती ही कितना हैं , हमनें आपकी सभी पोस्टें पढी और पढ़कर ही कुछ कहा लेकिन आप मेरे बारे में मुझे बिना जाने कह रही हैं | अगर आपनें मेरी कविता ” जब पुरुष नें कहा तो ….” पढ़ी होती तो शायद आप समझ जातीं की मैं कहना क्या चाहती हूँ | मुझे आपसे हृदय से हमदर्दी है | अगर आप पीड़ित हैं या आपके जीवन में किसी को भी लेकर कटु अनुभव रहे हैं तो अपनी पीड़ा बांटिए और यकीन जानिए हम आपकी पीड़ा सुनेंगे ही नहीं बल्कि आपका दर्द बांटेंगे भी | मैं ये भी समझ सकती हूँ की आपनें जो कहा वो कोइ नफरत की आग में जलता हुआ इंसान ही कह सकता है और नफरत भी यूं ही पैदा नहीं हो जाती उसके कुछ कारण होते हैं | क्या ये साबित करके की पुरुष एक जैसे होते हैं या नहीं या नारिया गुलामी पसंद करती हैं या नहीं ( जो असंभव है ) आपके अन्दर धधकती ज्वाला शांत हो जाएगी , शायद कभी नहीं | दुःख बांटने से कम होता है और मानसिक संतुष्टि भी मिलती है , सो हम फिर भी यही कहेंगे की आप दुखी हैं तो अपना दुःख बांटिए , विवाद खड़े करके अपनी पीड़ा को बढायें नहीं , इससे किसी को भी कुछ हासिल नहीं होगा | दो चार दिन बाद हर कोइ भूल जाएगा और आप लोगों की प्रतिक्रया पढ़-पढ़कर दुखी होती रहेंगी | वैसे भी साहित्य क्षेत्र में यही कहा जाता है की जो आपको बेबाक कह देता है वही एक लेखक का सच्चा मित्र होता है | आप शायद हमें अपना दोस्त न मानें लेकिन हम आपके दुश्मन नहीं हैं , जहां जो उचित लगता है कहते हैं और कहते रहेंगे | नारी आज़ादी की पक्षधर मैं भी हूं लेकिन शायद अभी आप मेरी बातें नहीं समझ पाएंगी | आपके लिए हमारी शुभ-कामनाएं

के द्वारा: seema seema

\"बस भी करो देवी जी अब आप भी \" नारी आप जैसी नहीं होती हैं नारी तवायफ भी होती हैं लेकिन अगर कोई पुरुस तवायफ से शादी कर भी ले तो तवायफ के कोठे वाले ही उसका घर बसने नहीं देते !इसीलिए कहा है \"तवायफ की किस्मत में शोहर नहीं होते \" जन जागरण मंच का मकसद है की \"लोग कानून और कानून से जुड़े हुए केस या मुद्दों या विषयों पर अपने पाक-शुद्ध विचार रखें और जन जागरण के मंच को अपनी आवाज़ से बुलुंद करके संघर्ष के लिए प्रेरित करें \"! आज सब लोग जानतें हैं की भारत का कानून कैसे लिखा गया है और कैसे उसमें संशोधन हुए हैं !आज एक बार फिर से उसी कानून में सशोधन की जरूरत महसूस की जा रही है , और इसी के लिए इस जागरण मंच अभियान की जरूरत महसूस हुई है ! जैसे आज़ादी के लिए कई दलों ने मिलकर जंग का ऐलान किया था, ब्रिटिश सरकार के खिलाफ वैसे ही आज भी गरम दल व् नर्म दल के लोगों की आवश्कता है! कानून से समाज व् लोगों के हितों की रक्षा करने के लिए !आज सभी को पता है भारत देश के कानून ब्रिटिश सरकार के बनाये हुए ही चल रहे हैं लेकिन समाज व् आम इंसान को उनके हिसाब से चलने में परेसानी का सामना करना पड़ रहा है! इस लिए जरूरत है एक बार फिर से चंदर शेखर आज़ाद की ,भगत सिंह की ,लाल / बाल / पाल की , सुभास चंदर बॉस की ! खाप पंचायतें / मीडिया / कानून / इंसान / इंसानियत / सिस्टम / तोर - तरीके ये सब अगर मिलकर काम करें तो कोई बुराई है क्या ? क्यों एक दुसरे की टांग खीचने में लगे हुए हैं ? मेरी आप सभी ब्लॉग लिखने वालों से गुजारिस है अपील है अरदास है की जरा इस मंच को सोसल साईट की तरह इस्तेमाल करना बंद करें और कानून / समाज /इंसानों की मुख्य समस्याओं का निपटारा करने के लिए कोई कोर्ट केस या कोई राजनीतिक फैसला या कोई पंचायती फैसला या कोई इसी से सम्बंधित टिपन्नी करें ताकि आपका साथ दैनिक जागरण को आगे बढ़ने का मार्ग दिखाए ! दैनिक जागरण का कदम सराहनीय है अगर हम और आप अपना लक्ष्य न भूलें ! \"कुछ कहने से ज्यादा कुछ करना जरूरी होता है और कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है\" , क्या आप सब इस जागरण मंच को अपने मनोरंजन का साधन ना बनाने का बलिदान दे सकती हैं ? अगर \"कुछ\" हो तो जवाब जरूर देना ,अगर नहीं हो तो लिखना छोड़ देना कम से कम इस मंच पर !

के द्वारा:

अनीता जी मैंने आपका पिछला ब्लॉग आज पढ़ा और मुझे पढ़कर आपने अपनी दिल की बात और व्यथा को जिन शब्दों के साथ प्रस्तुत किया उसके भावार्थ सभी अपने अपने सोच के दायरे के साथ देखते हैं अगर बात नारी की कमजोरी की की जाये तो आज की हकीकत है कि हमारे समाज (हम जहाँ रहते है तथा हमारे आस पास के लोग)के लोग एक लड़की पर जो उनके घर की नहीं है पर कड़ी नजर रखते हैं और वो कैसे चलती ,कैसे हस्ती हंसती है ,कैसे कपड़े पहनती है किससे बात करती है इन सभी हरकतों पर वो लड़कियों को नम्बर देना शुरू कर देते है ये लड़की अच्छी है ये लड़की बुरी है अगर लड़की ने कोई गलती कर दी तो जीवन भर वो लड़की उनके लिए बुरी हो जाती है और वो उस लड़की को उसी नजर से देखते हैं जैसी उसने गलती की है अब सवाल ये है की क्या कोई लड़की समाज में अकेली रह सकती है तो जवाब देते हुए मेरे शब्दों का संग्रह छोटा पड़ गया है की में क्या जवाब दूँ पर इतना ईमानदारी से कहूँगा की हमारे समाज में एक लड़की को अकेला रहते हुए असंख्य बुरी नजरों का सामना प्रतिदिन करना पड़ेगा,जो उस लड़की को सुई से भी ज्यादा सुभन देगी ,कई तरह की उपाधियों से भी वो लड़की नवाजी जाएगी जो की असहनीय होगा,अंततः आपके सवाल का जवाब यही है कि हमारे बीमार समाज में एक लड़की का अकेली रहना फिलहाल एक आग के दरिये के समान है जिसमे तैरकर ही उस लड़की को अपना जीवन व्यतीत करना है अनीता जी अंत में मैं बस इतना ही कहूँगा कि जागरण जं ने हमें अपने विचारों को व्यक्त करने का जो मंच दिया है अपनी अभिव्यक्ति के अधिकारों का उपयोग करते रहो!

के द्वारा: vijendrasingh vijendrasingh

आप एक नारी हैं और नारी होने के नाते मैं आप का सम्मान भी करती हू .आप के जीवन में बहुत दुःख हैं ये आप की पोस्ट से पता लगता है .ये सच है की एक अकेली महिला का जीवन कठिन होता है पर दुःख किसके जीवन में नहीं होता …………यहाँ आप अपने दुखो को लोगो के साथ शेयर करती हैं .आप मुझको ये बताइए की कोई आप के दुःख को समझ पता है .आप के लेख पर कमेन्ट देख कर लगा की कोई भी आप को समझना नहीं चाहता सब को ये लगता है की आप यहाँ दूसरो की सहानभूति लेने आई है और आप कमेन्ट इस लिए पा रही हैं .मैं आप से पूछना चाहती हु क्या ये सही है ?????क्यों की मुझको ये नहीं लगता की कोई भी नारी ये काम करेगी की अपने दुःख को सार्वजानिक इस लिए करेगी की उस को टॉप ब्लागेर ऑफ़ वीक चुना जाये …….इस लिए मेरी आप से गुजारिश है की आप इन बात का जबाब मुझे जरुर दे क्युकी मेरी नजर में नारी कमजोरी का प्रतिक नहीं है ………………  

के द्वारा:

अनीता जी, समाज के बन्धनो (पढ़े पुरुषो के बनाये हुए नियमो) से विद्रोह करने वाली न तो आप पहली महिला है, न आखिरी. जो भी इन नियमो के खिलाफ गया है, उसको समाज के ताने सुनने ही पड़े है, चाहे वो स्त्री हो या पुरुष. बुरा मत मानियेगा लेकिन आपके ब्लॉग से ऐसा लगता है की या तो आप की कोई पारिवारिक विविशता है जिससे आप नौकरी करने को बाध्य है या आपकी उम्र कुछ ज्यादा हो गयी है और आपको लगता है की अब शादी करने की उम्र नहीं रही. ये भी हो सकता है की आप किसी पुरुष के द्वारा चोट खायी हुई हो या उन कुछ लोगो में से एक हो सकती है जो समाज को बदलने की चाहत रखती हो. हलाकि मेरा मन ये कहता है की आप आखिरी श्रेणी की नहीं हो सकती, क्योकि तब आपको समाज की कोई परवाह नहीं होती. खैर ये आपकी जिंदगी है और आपको अपनी जिंदगी अपने तरीके से जीने ( और बर्बाद करने) का हक़ है. मेरी शुभकामनाये आपके साथ है.

के द्वारा:

आप एक नारी हैं और नारी होने के नाते मैं आप का सम्मान भी करती हू .आप के जीवन में बहुत दुःख हैं ये आप की पोस्ट से पता लगता है .ये सच है की एक अकेली महिला का जीवन कठिन होता है पर दुःख किसके जीवन में नहीं होता ............यहाँ आप अपने दुखो को लोगो के साथ शेयर करती हैं .आप मुझको ये बताइए की कोई आप के दुःख को समझ पता है .आप के लेख पर कमेन्ट देख कर लगा की कोई भी आप को समझना नहीं चाहता सब को ये लगता है की आप यहाँ दूसरो की सहानभूति लेने आई है और आप कमेन्ट इस लिए पा रही हैं .मैं आप से पूछना चाहती हु क्या ये सही है ?????क्यों की मुझको ये नहीं लगता की कोई भी नारी ये काम करेगी की अपने दुःख को सार्वजानिक इस लिए करेगी की उस को टॉप ब्लागेर ऑफ़ वीक चुना जाये .......इस लिए मेरी आप से गुजारिश है की आप इन बात का जबाब मुझे जरुर दे क्युकी मेरी नजर में नारी कमजोरी का प्रतिक नहीं है ..................

के द्वारा:

अनीता जी मुझे लिखते हुए दुःख हो रहा है की एक नारी होकर मैं एक नारी का विरोध कर रही हूँ | आपकी बेतुकी बात पिछली पोस्ट में ( जिसे लेख कहना मूर्खता है ) हमने भी पढी और आपमें अनुभव की कमी जानकर हमने कोइ टिप्पणी नहीं की | मैंने अपने पिछले लेख में इसके बारे में कहा भी था और फिर कुछ सोचकर खुद ही डिलीट कर दिया लेकिन लगता है हमें अपनी पोस्ट दोबारा आपको जवाब देने के लिए लगानी पड़ेगी | आपकी निम्न मानसिकता साफ़ झलकती है की आपका मकसद केवल विवाद खड़े करके लोकप्रियता हासिल करना है , जिसमें आप पहली बार पुरुषों के खिलाफ लिखकर कामयाब भी हुईं और अब आपने औरतों को मोहरा बनाया , भले ही बदनाम हो जाओ लेकिन इसी बहाने आप टॉप ब्लोगर कहलाएंगी ,लेकिन हमेशा ऐसा संभव नहीं | अब बस भी करो अनीता , कब तक दूसरों को बेवकूफ बनाओगी | ईश्वर तुम्हें सदबुद्धि दे

के द्वारा: seema seema

....."किसी ने इतना सा सच कहने का साहस नहीं किया कि अनीता, हॉ हम जानते हैं कि हमारी नस्लें कायर हैं जो सच को स्वीकारने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही हैं. शायद मुझे तसल्ली हो जाती कि चलो कम से कम इतना तो पुरुषत्व का लक्षण बाकी है...." टोपर तो आप अवश्य बन गयी लेकिन दूर-२ तक आपके ठीक होने की आश नहीं दिख रही है. अपने बुरे अनुभवों को ना बांटे तो अच्छा है, क्यों अन्य सकारात्मक सोच वाली महिलाओं का बुरा करने पर तुली हुयी है ? शब्द और लिखने का तरीका तो आपको समझ आया लेकिन ये तय है की उनका आशय आपको समझ नहीं आया और न ही आएगा. तमाम कायरों की सूची में मेरी भी टिपण्णी थी, इसलिए तमाम कायरों की ओर से मै आपको वीरांगना बनने पर बधाई देता हूँ.

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